स्मृति शेष मिलाप कोठारी की अनुपम कृति 'छोटी सी बात'

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राजस्थान पत्रिका समूह के निदेशक एवं जोधपुर में पत्रिका का प्रकाशन शुरू होने के पश्चात् संपादक के रूप में कार्यरत मिलाप जी कोठारी से मेरा अंतरंग सम्पर्क रहा। इसी कारण उनके असामयिक निधन पर आज जयपुर में उनके उठावणा कार्यक्रम में भाग लेकर श्रद्धांजलि अर्पित की। पत्रिका की ओर से इस अवसर पर सभी को मिलाप जी की वर्ष 2002 में पत्रिका में प्रकाशित लेखों के आधार पर प्रकाशित पुस्तक 'छोटी सी बात' भेंट की गई। पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर 'स्वानुभूति' का पाठ एवं इस पुस्तक के 94 आलेखों में आखिरी प्रकाशित आलेख 'मुफ्त इलाज-1' योग पर होने से तथा कल अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस होने के कारण दोनों ही कथ्य यहां प्रस्तुत कर उनके शब्दों को नमन करता हूं। पूरी पुस्तक के सभी आलेख पठनीय ही नहीं मननीय एवं करणीय है। .....पदम मेहता

स्वानुभूति 
समूचे संसार में मनुष्य ने स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए विविध प्रकार के खानपान, आचार-विचार अपनाए होंगे। व्यक्तियों के अनुभवों से सामाजिक परम्परा व धर्म आदि पनपे। भारतीय सन्दर्भ में धर्म के लिए ''धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजा:। कहा जाता है। मेरे मत में इसका अर्थ है अपने शरीर को धारण करना (स्वस्थ रखना) ही धर्म है। इसीलिए चार पुरुषार्थों में प्रथम धर्म पुरुषार्थ है। धर्म और उपासना पद्धति या इष्ट अलगअलग है। इस दृष्टि से धर्म शुद्ध भारतीय दर्शन है, अन्य देशों का नहीं। अत: धर्म और मजहब या रिलीजन एकदम अलग है। कालान्तर में एलोपैथी के चमत्कार से सारी दुनियां चमत्कृत हो गई है। इसी के प्रभाव में मानव के आहार-विहार की अनन्त विविधताएं सिकुड़ गईं और तेजी से सिमटती जा रही हैं। डॉक्टरों ने हमें समझा दिया है कि उनसे ज्यादा शरीर की समझ किसी में नहीं है। इधर एलोपैथी का सर्वव्यापी व सर्वमान्य प्रसार व प्रभाव बढ़ रहा है उधर उतनी ही तेजी से अविकसित व तथाकथित विकसित देशों में भी मनुष्य का स्वस्थ रहना बहुत बड़ी चिन्ता बन चुकी है। यही विडम्बना है। किन्तु हम यह भी नहीं सोचना चाहते कि अन्य सभी जीव-जन्तुओं की तुलना में मनुष्य ही अपने स्वास्थ्य को लेकर इतना परावलम्बी व असहाय क्यों हो गया है? सृष्टि का 'सर्वश्रेष्ठ प्राणी' स्वयं को ही स्वस्थ रखने में ऐसा असमर्थ और दम्भ समूचे जगत् के पर्यावरण को स्वच्छ कर देने का! ऐसे ही कुछ सवालों से जूझते हुए 'छोटी सी बात' शीर्षक से दैनिक 'राजस्थान पत्रिका में एक लेखमाला प्रकाशित हुई। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से जुड़े शोध समाचारों को परम्परा की नजर से तौलने का यह क्रम अन्त में शरीर पर केन्द्रित हो गया। मेरे मत में मनुष्य के शरीर में अभूतपूर्व समता व सामर्थ्य है। किन्तु आज हमें अपने शरीर के लिए ही दिन के चौबीस घण्टों में एक सैकण्ड की भी फुर्सत नहीं है। भूख लगने पर खाने व नींद आने पर सोने जैसी शरीर की स्थूल आवश्यकताओं की पूर्ति भी हम करने को तैयार नहीं है। शरीर से केवल आउटपुट की अपेक्षा रखने वाला शहरी व उच्च वर्ग ही इसलिए आज सर्वाधिक रोगों व मानसिक तनावों का शिकार है। यही वर्ग वर्तमान में ऐलोपैथी का पूर्ण पोषण करता है। उधर योग के साधक भी अलौकिक, आत्म साक्षात्कार, पूर्व जन्म-पुनर्जन्म व मुक्ति मार्ग जैसी चमत्कारी बातों के फेर में कुण्डलिनी जागरण का लोभ संवरण नहीं कर पाते वे भी स्वयं को स्वस्थ रखने में अपनी विद्या का प्रयोग करना हेय मान लेते हैं। ऐसे जटिल परिवेश में अपने शरीर पर भरोसा पैदा करने का यह बहुत छोटा प्रयास है। शरीर को समझना, ब्रह्माण्ड को समझना बराबर है। यथाण्डे तथा पिण्डे या ब्रह्माण्डे। अत: स्थूल व प्राण शरीर, मन व मति को विज्ञान दृष्टि से समझने के लिए मेरे जैसे कितने मनुष्यों के कितने जीवन लगेंगे कहा नहीं जा सकता। न सही। बया जैसे अनेक पक्षी एकदम निरर्थक पड़े तिनकों को एक-एक करके चुनकर ऐसे अद्भुत घोसले बना डालते हैं। हर साल! ऐसे ही हमारा शरीर भी अपने को स्वस्थ रखने के लिए निरर्थक से लगने वाले न जाने क्या-क्या प्रयास व संकेत करता व क्या-क्या कहता है। यही वास्तविक 'बॉडी लैंग्वेज' है। आज तो इस शब्द का ही अनर्थ कर दिया गया है। वास्तविक 'बॉडी लैंग्वेज' से परिचित कराने के लिए पुस्तक के उत्तरार्द्ध में अनेक सुझाव दिए गए हैं। उन पर स्वयं अमल करके पाठक अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करा सकें तभी इस पुस्तक के लेखन-पठन की सार्थकता है। अन्यथा नहीं। पुस्तक के हर अध्याय के अन्त में उस लेख के प्रकाशन की तिथि दी गई है ताकि सन्दर्भ स्पष्ट हो सके। छपे हुए मूल लेखों में अशुद्धियों के अलावा यथास्थान तर्को या परिकल्पनाओं में भी परिवर्तन किया गया है। मिलाप कोठारी 'सुमंद' (गुरू पूर्णिमा, 23 जुलाई 2002)

मुफ्त इलाज-1
रङ्ग विज्ञान में बताया गया था कि अंगूठियां स्वास्थ्य प्राप्ति में सहयोगी मात्र हैं। वास्तविक काम तो हमारे भगवान [हमारे हाथ] ही करते हैं। अंगूठियां भी ''हमारे भगवान" ही धारण करते हैं। यदि गलत तरीके से भगवान को रत्न धारण करवा दिए जाएं तो वे कुपित होकर हमारे ही नाश का कारण भी बन सकते हैं। अत: स्वास्थ्य की दृष्टि से सबसे अच्छा यह है कि बाएं हाथ की किसी भी अंगुली में चान्दी या ताम्बे का छल्ला और दाएं हाथ की उसी अंगुली में सोने या लोहे का छल्ला पहन लिया जाए। सोने- चान्दी या लोहे- ताम्बे का योग सर्वश्रेष्ठ है। कम खर्च में जबर्दस्त लाभ अर्जित किया जा सकता है। जो लोग अंगूठियां नहीं पहनना चाहते या लोहे- ताम्बे पर भी खर्च नहीं करना चाहते वे इनके बिना भी पूर्ण स्वस्थ हो या रह सकते हैं। वे अपनी अंगुलिया गर्दन [गुद्दी] पर व दोनों अंगूठे कण्ठ के दोनों ओर हसली की हडिय़ों के मुंह पर रखकर नाक के निचले भाग से गहरे सांस खींचें और आसानी से जितनी देर रोक सकते हैं रोक लें। इसके बाद सहज तरीके से धीरे- धीरे सांस छोड़ें। नाक के नीचे व ऊपरी होंठ के ऊपर का जो मध्य भाग [नासाग्र मूल] है, मन में उस पर ध्यान लगाकर सांस खींचना- छोडऩा है। इस सम्पूर्ण क्रिया को सोलह बार दोहराएं। इसके बाद अपनी मध्यमा अंगुलियों को दोनों कानों के छेदों पर रखें। मध्यमा के दोनों ओर की अंगुलियां [तर्जनी व अनामिका] कानों के नीचे व ऊपर रखें तथा कनिष्ठा [चिट्टी] अंगुलियों को कनपटी पर रखें।

स्मृति शेष मिलाप कोठारी ......
दोनों अंगूठे नासाग्र मूल पर रखें। पहले की तरह सोलह बार नासाग्र मूल से गहरे सांस लें, रोकें व छोड़े। ये दोनों क्रियाएं सीधे लेटे हुए करने से सर्वश्रेष्ठ परिणाम मिलेंगे। अत: आप सोने से पहले और सुबह बिस्तर छोडऩे से पहले, बिना तकिए के, ये क्रियाएं करें। खाली-भरे पेट से कोई अन्तर नहीं पड़ेगा। स्वास्थ्य लाभ के बाद यथासम्भव खाली पेट करना बेहतर है। सांस लेते समय कौडी को शनै:-शनै: ऊपर उठाएं। प्राणायाम के शुद्ध तरीकों में उपरोक्त दो उदाहरण मात्र हैं, किन्तु ये सभी प्रकार के रोगों के निवारण के लिए पर्याप्त हैं। इससे मानसिक शान्ति, स्वस्थ निद्रा लाभ, हड्डियों व पेट सम्बन्धी सभी विकार दूर होंगे एवं मल-मूत्र का नियमन होगा। चेतना जाग्रत होगी। मन की कुण्ठा या चञ्चलता दूर होंगे। जो लोग इन क्रियाओं के साथ मन्त्र जाप करना चाहें वे आगे बताए मन्त्रों में से कोई भी मन्त्र बन्द मुंह से जीभ या मन ही मन इनका उच्चारण करें।
आत्म लोकाय स्वधा ओम् 
भू मण्डलाय स्वधा ओम्
पृथ्वी लोकाय स्वधा ओम् 
सोम मण्डलाय स्वधा ओम्
सौर मण्डलाय स्वधा ओम्
ध्रुव लोकाय स्वधा ओम् ।
इसके बाद बैठकर दोनों पैर सीधे फैलाएं। दोनों हथेलियों को घुटनों की ढकनी पर व सभी अंगुलियां घुटनों के अन्दर की ओर रखें। अंगूठे घुटनों के बाहर की ओर जहां भी लगते हों वहां रखें। विकल्प रूप में पैरों के तलुवों को जैसे मिले वैसे मिलाएं और हाथों को दोनों घुटनों पर रखें। इस स्थिति में भी मन्त्रोच्चार या ओम् शान्ति, ओम् शान्ति बोलते रहें। कम से कम सोलह बार।। तीसरी क्रिया मल-निवृत्ति के समय या पूर्व की दोनों क्रियाओं [प्राणायाम] के बाद की जा सकती हैं। एक अंगूठे को उसी तरफ के दांतों पर रखकर मुंह बन्द कर लें। चाहें तो मन में ही मन्त्रोच्चारण करें या कम से कम पांच मिनट ऐसे ही रखें। फिर इतने ही समय दूसरे हाथ से दूसरी तरफ के दांतों पर दोहराएं। इससे सभी दन्त, कण्ठ व कर्ण विकार दूर होंगे। टेढ़े-मेढ़े दांत या नाक की बढ़ी हुई हड्डियां सही होंगी। इन सभी क्रियाओं में अंगुली अंगूठों से किसी प्रकार का दबाव डालने या खिंचाव करने की जरूरत नहीं है। आराम से सहज तरीके से करें। उपरोक्त से अभूतपूर्व लाभ होगा। अत: आप इस पुस्तक को केवल पढ़कर सन्तोष नहीं करें, बल्कि इन क्रियाओं पर अमल करें व अपने अनुभव से सूचित करें। इन सुझावों पर यदि अमल नहीं किया जाए तो पुस्तक का पठन ही व्यर्थ सिद्ध होगा। हां धरती- आकाश से जुडऩा न भूलें। (21 अप्रैल 2002)

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