साधु जीवन कांच के समान है : मुनि पीयूषचंद्र विजय 

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मुबंई 

महानगर के कामाठीपुरा गली नं  8 में चल रही नवपद ओली आराधना के दौरान प्रवचन में गुरू ऋषभचंद्र सूरीजी के शिष्य मुनि पीयूषचंद्र विजय जी म सा ने बताया कि इस पंचम काल में जो इंसान साधु पद की ओर अग्रसर होता है वह प्रशंसनीय महान है ।  जिसकी अनुमोदना हदय से,  दिल से करना  ही चाहिए । क्योंकि यह साधु यानि कि मुनि जीवन बहुत ही  कठिन तम साधना है । नवपद ओली आराधना  के पांचवे दिन  उन्होंने कहा कि मुनि का जीवन  कांच के समान होता है जैसे कांच नाजुक होता है और  हाथ से छूटते ही टुकड़े टुकड़े हो जाते  है । वैसे ही सावधानी मुनि जीवन में भी रखने की होती है । 

 

नही रखने पर अपना खुद का बहुत बड़ा अहित हो सकता है । इसलिए हर पल, हर क्षण जागृत रहना चाहिए । मुनि  उसे कहते है जो अधिक से अधिक समय मौन व्रत में रहे । अनुकूल प्रतिकुल समय में भी जो  समभाव से सहन करते हुए साधना में तल्लीन रहे वो साधु मुनि होते है ।  धर्म आराधना में जो सहयोगी रहे, वो ही सच्चा मुनि, साधु होता है । साधु-मुनि जन  साधन सुविधा मुक्त जीवन निर्वाह करने का प्रयास करते है ।     

 

  जैैैन मुुनि पियूषविजयजी म सा ने उदाहरण देते हुए कहा कि धर्मरूचि अणगार को किसी ने आहार के समय गोचरी में जहरीली सब्जी व्होरा दी । उन्होंने सोचा यह खाने योग्य नही है  । इस सब्जी को नगर के बाहर जाकर मिट्टी में डाल दूं । वे मुनि नगर के बाहर जाकर जैसे ही मिट्टी में एक बूंद डाली ही थी कि इतने मात्र समय में तो  उस की खुशबू से  हजारो चिटिया आ गई । मुनि सोचते है अगर यह सब सब्जी डाल दूँगा तो लाखो निर्दोष  चिटिया बेचारी मारी जायेगी । यह सोचकर  वे मुनि उसी समय फैसला करते हैं कि यह सब्जी मुझे ग्रहण कर लेना चाहिए । मैं मर गया तो कोई बात नही । मगर यह लाखों चिटिया मरे, मुझे  यह मंजूर नहीं । ऐसे साधु इस जिन शासन में हो गये । तभी तो हमारे भगवान महावीर कहते है जिओ ओर जीने दो ।

 

हमे हमारे प्राण देकर भी दूसरो की  हमेशा रक्षा करनी चाहिए । लेकिन आज सब कुछ उल्टा ही हो रहा है । आज का मानव अपने प्राण बचाने के लिए दूसरे के प्राण लेने के लिए भी तैयार हो जाता है । मुनि जीवन लिए बिना किसी का भी कल्याण नही हुआ है । तीर्थंकर भगवान ने भी सबसे पहले तो साधु यानि मुनि जीवन लिया, फिर तीर्थंकर तक की यात्रा की और आगे बढे । ओली का पांचवा दिन सभी के लिए यह प्रेरणा देता है कि  पांच  इंद्रियों को वश में करते हुए पंचम गति जो मोक्ष है, वहां पहुंचने का पुरूषार्थ सभी को करना चाहिए और मुक्ति का वरन करना चाहिए ।

 

किया स्वागत 

मीडिया प्रभारी माणकमल भंडारी ने बताया कि जैन मुनि पियूषविजयजी म सा एवं जैन मुनि पद्मसागर विजय म सा की निश्रा में चल रही ओली आराधना के दौरान दिल्ली से कांतिलाल डामरानी, मेंगलवा, सायला, बदनावर,  इंदौर,  विजयवाडा से सुरेश दाढी, बागरा वालो ने प्रवचन में प्रभावना का लाभ लिया ।  कामाठीपुरा जैन संघ  ट्रस्ट की ओर से सुरेश  दाढी विजयवाड़ा एवं अनिल सराफ इंदौर का स्वागत किया गया ।

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