तीन तलाक विधेयक लोकसभा में पास, अब अगली परीक्षा राज्यसभा में

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नई दिल्ली
लोकसभा ने तीन तलाक विधेयक को ध्वनि मत से मंजूरी प्रदान कर दी। विधेयक के पारित होने के दौरान कांग्रेस, जदयू, तृणमूल कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी तथा कुछ अन्य विपक्षी दलों ने सदन से वाकआउट कर दिया। इससे पहले विधेयक पर हुई चर्चा के दौरान लैंगिक न्याय को नरेंद्र मोदी सरकार का मूल तत्व बताते हुए विधि एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि तीन तलाक पर रोक लगाने संबंधी विधेयक सियासत, धर्म, सम्प्रदाय का प्रश्न नहीं है बल्कि यह नारी के सम्मान और नारी-न्याय' का सवाल है और हिन्दुस्तान की बेटियों के अधिकारों की सुरक्षा संबंधी इस पहल का सभी को समर्थन करना चाहिए। रविशंकर प्रसाद ने लोकसभा में 'मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019' को चर्चा एवं पारित करने के लिये पेश किया जिसमें विवाहित मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की संरक्षा करने और उनके पतियों द्वारा तीन बार तलाक बोलकर विवाह तोडऩे को निषेध करने का प्रावधान किया गया है। आरएसपी के एनके प्रेमचंद्रन ने विधेयक को चर्चा एवं पारित करने के लिये पेश किये जाने का विरोध करते हुए इस संबंध में सरकार द्वारा फरवरी में लाये गये अध्यादेश के खिलाफ सांविधिक संकल्प पेश किया। संकल्प पेश करने वालों में अधीर रंजन चौधरी, शशि थरूर, प्रो. सौगत राय, पी के कुन्हालीकुट्टी और असदुद्दीन औवैसी भी शामिल हैं। प्रेमचंद्रन ने कहा कि इस विधेयक को भाजपा सरकार लक्षित एजेंडे के रूप में लाई है। इस बारे में अध्यादेश लाने की इतनी जरूरत क्यों पड़ी। उन्होंने यह भी कहा कि इस बारे में उच्चतम न्यायालय का फैसला 3:2 के आधार पर आया।वहीं, विधि एवं न्याय मंत्री ने कहा कि संविधान के मूल में लैंगिक न्याय है तथा महिलाओं और बच्चों के साथ किसी भी तरह से भेदभाव का निषेध किया गया है। मोदी सरकार के मूल में भी लैंगिक न्याय है। हमारी 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ', 'उज्जवला' जैसी योजनाएं महिलाओं को सशक्त बनाने से जुड़ी हैं। इसी दिशा में पीडि़त महिलाओं की संरक्षा के लिये हम कानून बनाने की पहल कर रहे हैं। प्रसाद ने कहा कि पिछले साल दिसंबर में तीन तलाक विधेयक को लोकसभा ने मंजूरी दी थी। लेकिन यह राज्यसभा में पारित नहीं हो सका। संसद के दोनों सदनों से मंजूरी नहीं मिलने पर सरकार इस संबंध में अध्यादेश लेकर आई थी जो अभी प्रभावी है। विधि एवं न्याय मंत्री ने कहा कि 2017 से अब तक तीन तलाक के 574 मामले विभिन्न स्रोतों से सामने आये हैं। मीडिया में लगातार तीन तलाक के उदाहरण सामने आ रहे हैं। इस विधेयक को सियासी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह इंसाफ से जुड़ा विषय है। इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं है। प्रसाद ने कहा कि 20 इस्लामी देशों ने इस प्रथा को नियंत्रित किया है। हिन्दुस्तान एक धर्मनिरपेक्ष देश है तो वह ऐसा क्यों नहीं कर सकता। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कांग्रेस पर 1986 में मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण से जुड़े विषय पर मुट्ठीभर लोगों के दबाव में धुटने टेकने का आरोप लगाते हुए कहा कि देश आज तक इसकी सजा भुगत रहा है। उन्होंने कहा, ''1986 और अब में फर्क है। तब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। आज नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। हम संवैधानिक अधिकार देने के लिए विधेयक ला रहे हैं, तब संविधान को कुचलने के लिए विधेयक लाया गया था। 1986 में कांग्रेस ने कुछ मुट्ठीभर लोगों के दबाव में घुटने टेक दिये थे और जो पाप किया था, उसकी सजा देश आज तक भुगत रहा है। नकवी ने कहा कि इस देश ने सती प्रथा, बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों को खत्म किया है। तीन तलाक भी उसी तरह की कुप्रथा है, सामाजिक बुराई है। उन्होंने विपक्ष के कुछ सदस्यों की आशंकाओं के मद्देनजर कहा कि तर्क दिये जा रहे हैं कि तीन तलाक देने के मामले में पति तीन साल के लिए जेल चला जाएगा तो परिवार का क्या होगा। नकवी ने कहा कि ऐसा काम ही क्यों करें कि जेल जाना पड़े। ऐसे तो चोरी करने वाले, कत्ल करने वाले अपराधियों के लिए भी कहा जा सकता है। ये तर्क नहीं, कुतर्क हैं और इन कुतर्कों के आधार पर सामाजिक विषयों का समाधान नहीं निकलता। शिवसेना के विनायक राउत ने कहा कि आज यह विधेयक पारित होने के बाद भारत के इतिहास में यह दिन स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा जब हम इस क्रांतिकारी पहल के साक्षी बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने मुस्लिम समुदाय को वोट बैंक माना, इसलिए 72 साल तक मुस्लिम महिलाओं को इस कुप्रथा से निजात नहीं मिली। राउत ने कहा कि हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से यह मांग भी करते हैं कि कश्मीर के संबंध में अनुच्छेद 370 को भी समाप्त करना चाहिए।

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