8742. त्यों चातर की बात में

ज्यों केळै के पात में, पात-पात में पात।
त्यों चातर की बात में, बात-बात में बात।।
जिस प्रकार के केले के पत्ते में पत्ते -पत्ते में पत्ता होता है, उसी प्रकार चतुर मनुष्य की बात में बात-बात में बात होती है। और इन सबको समझना होता है। एक भिखरी घूमता फिरता और दिन भर में बहुत सा धान जमा कर लेता। एक दिन गांव के लोगों ने उससे पूछा कि तुम रोज इतना धान मांगकर क्या करते हो? भिखारी बोला कि मुझे चार सेर धान मिलता है। उसमें से एक सेर धान मैं एक राक्षसी को दे देता हूं, एक सेर किसी को उधार दे देता हूं, एक सेर धान बहते पानी की धारा में बहा देता हूं और एक सेर से मंदिर के देवता को भोग लगाता हूं। लोगों की समझ में उसकी बात नहीं आई। उन्होंने कहा कि बेकार की बात क्यों करता है। अच्छा बता, कहां है वह राक्षसी? कहां है वह मंदिर? भिखारी चुपरहा। गांववालों को जब उतर नहीं मिला तो उन्होंने समझा कि यह भिखारी बड़ा पाखंडी है। वे उस पर बहुत नाराज हुए और उसे पकड़कर राजा के पास ले गए। राजा के पूछने पर भी उसने ये ही जवाब दिए। राजा की समझ में कुछ नहीं आया। उसने कहा कि तुम्हारे कहने का मतलब क्या है? साफ-साफ समझा कर कहा भिखारी बोला कि हे राजा, मेरी स्त्री तो वह राक्षसी है। उसे सिर्फ खाना, पहनना और सोना आता है। वह कुछ काम नहीं करती। राजा ने पूछा कि अच्छा, उधार, तुम किसको देते हों? भिखारी बोला कि उधार में अपने बेटे को देता हूं। अभी वह छोटा है। मैं अपने हाथ पैर चलाकर उसे खिलाता हूं। जब मेरे हाथ पैर थक जाएंगे और वह जवान हो जाएगा तो वह मुझे कमाकर खिलाएगा। इसे मैं उधार देना कहता हूं। राजा ने पूछा कि बहते पानी की धारा में धान फेंकने का क्या मतलब है? भिखारी बोला कि मेरी एक लड़की है। एक सेर धान वह खा जाती है। अभी वह छोटी। जब सयानी होगी और कमाने खाने योग्य बनेगी तो अपने पति के घर चली जाएगी। यह सब जानते हुए उसे खिलाने का मतलब बहते पानी में धान फैंकना नहीं तो और क्या हो सकता है? राजा बड़े ध्यान से भिखारी की बात सुन रहा था। बोला कि अब यह भी बताओं कि किस मंदिर में किस देवता का तुम रोज एक सेर धान का भोग लगाते हो? भिखारी ने कहा कि यह अधम शरीर ही वह मंदिर है और मेरे प्राण उस मंदिर के देवता हैं। यदि मैं रोज इस मंदिर और देवता को भोग न लगाऊं, तो सारा ही खेल बिगड़ जाएगा। राजा भिखारी के जवाब से बहुत खुश हुआ। उसने उससे कहा कि तुम तो बड़े भारी पंडित मालूम पड़ते हो। उसने बहुत दान दक्षिणा देकर उसे विदा किया।