8953. राज वियां री राह

ऊंडा उदध अपार, थाह न पावै तैरवा।
राजवियां री राह, नर कुण जाणै नारणा।।


जिस तरह अपार गहरे सागर की थाह तैरने वाला नहीं पाता है, उसी प्रकार राजाओं की राह कोई नहीं जानता कि वे किस राह चल पड़े। तात्पर्य यह राजा कब क्या कर बैठे, कोई भी नहीं जानता।
एक दिन एक राजा ने अपने मंत्री से पूछा कि औरत अधिक चतुर होती है या मर्द? मंत्री ने उतर दिया कि पृथ्वीनाथ दोनों ही अपनी अपनी जगह चतुर हैं। लेकिन राजा ने कहा कि मैं एक उतर चाहता हूं। इस पर मंत्री को कोई उतर नहीं सूझा। वह उदास अपने बाप से उदासी का कारण पूछा। कारण जानकर उसने कहा कि मैं राजा को इसका उतर दे दूंगी। मंत्री की लडकी ने जाकर राजा से कहा कि मर्द की अपेक्षा औरत अधिक चतुर होतीहै। राजा नेकहा कि इसे साबित करके दिखलाओ और मंत्री की लडकी को अपने नगर से बिना कुछ दिये निकाल दिया। मंत्री की बेटी चलते चलते एक जंगल में पहुंची और एक वृक्ष की छाया में बैठ गई। पास ही एक जाट, जिसका नामगोदू, था, अपनी बकरी चरा था। उसने जाट को अपने पास बुुलाकर उसका परिचय पूछा। जाट ने कहा कि मैं यहीं जंगल में रहता हूं और नगर में से रोटी मांग कर ले आता हूं। गांव के लड़के मुझे पागल कहकर चिढाते हैं अत मैं उनसे बहुत कतराता हूं।

मंत्री की लडकी ने उसे अपना धर्म का भाई बना लिया और उससे पूछा कि तुम्हारे पास कुछ है भी़ जाट के पास एक रूपया था, जो उसने एक वृक्ष के नीचे गाड़ रखा था। यही उसकी धरोहर थी। बहन के कहने पर वह रूपया निकाल लाया। तब मंत्री की लडकी ने कहा कि गांव में जाओ और खाने पीने की इतनी इतनी चीजें ले आओ। साथ ही एक मखमल का टुकडा एक सुई व कुछ धागा भी उसने मंगवाया। मंत्री की बेटी ने उससे फिर कहा कि आज यदि लडके तुम्हें चिढाएं तो उन्हें कडी आवाज में दुत्कार देना कि मैं पागल नहीं हूं। सारा सौदा ठीक से खरीद कर ले आना। जो पैसे बाकी बचे, वे भी अच्छी तरह गिनकर ले आना। गोदू ने वैसा ही किया। मंत्री की बेटी ने रोटियां बनाई और फिर दोनों ने भोजन किया। गोदू ने आज तक ऐसी रोटी नहीं खाई थी। रोटी खाकर वह बड़ा खुश हुआ और फिर बकरी के पास चला गया। इधर मंत्री की बेटी ने उस मखमल के टुकडे की एक बहुत सुंदर टोपी बनाई। फिर उसने गोदू को बुलाकर कहा कि इसे नगर में जाकर बेच आ। लेकिन तू अपनी ओर से टोपी की कोई कीमत न कहना, अपितु ग्राहक जो दे दे वही ले आना। नगर में एक बनजारा आया हुआ था। उसने नगर के बाहर अपना डेरा लगा रखा था। गोदू टोपी लेकर उसी के पास पहुंचा। बनजारे को टोपी बडी पसंद आई। उसने पच्चीस रूपये में वह टोपी खरीद ली। (क्रमश:)