बाडा़बंदी-टू और विधायकों का चौहटा

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कश्मकस इसलिए हो रही है कि जैसे वहां दो धड़े वैसे यहां। ऊहापोह इस बात पर कि इतकू जाएं या उतकू। इधर देखे तो इशारा ‘बाड़ाबंदी-टू की ओर होता दिखाई देता है, उधर देखे तो विधायकों का चौहटा नजर आता है। ये कहे कि आज बाड़ाबंदी पर हो जाए, विधायकों का चौहटा कभी ओर सजा लेंगे। हालत इधर चला मैं उधर चला जैसी। किसे नाराज करे। लिहाजा ‘सीमा रेखा के झगड़े में अंतिम जीत हमारी है। इधर जाएं तो ये नाराज उधर जाएं तो वो। इसलिए दोनों को निपटा देते हैं। शहर में एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।


दो धड़े- बाड़ाबंदी-टू और विधायकों का चौहटा के बारे में पढकर हर जागरूक पाठक जान गए होंगे कि कलम की धार किसकी तरफ जाने वाली है। जागरूक पाठकों का जिक्र करने के अपने कारण। पाठकों का अपना वर्ग है। पाठकों के अपने खांचे है। कई लोग अपना ज्ञान और सामान्य ज्ञान बढाने के लिए पठन-पाठन करते है। कब हुआ। कहां हुआ। किसने किया। क्यूं किया। हर बात की जानकारी। अर्थ शा से लेकर खेल के मैदानों का ज्ञान। विज्ञान से लेकर चिकित्सा विज्ञान का नॉलेज। गणित-सामाजिक ज्ञान और भूगोल के बारे में पूरी जानकारी। इतिहास और आज का पूरा ज्ञान। कई तो आने वाले कल की आहट सुन लेते हैं। उन्हें सरकारी कारकूनों की करतूतों की जानकारी। वे पुलिस की कार्य प्रणाली से अच्छी तरह वाकिफ। वो कानून और कानून की पेचिदगियों के बारे में बखूबी जानते हैं। आधी रात को भरी नींद में से उठाकर किसी भी विषय पे चर्चा-मंथन-बहस कराके देख ल्यो। किसी से उन्नीस साबित होणे वाले नहीं। ऐसे महानुभाव जागरूक लोगों की सूची में शुमार।


कई लोग टाईम पास करने के लिए अखबार पढते है। उनका अध्ययन सुबह से लेकर अपरान्ह तक चलता रहता है। कई बार शाम और रात भी शामिल। कुछ घरों में दो जलतेदीप मंगवाए जाते है। एक दादू-दादी के लिए और दूसरा परिवार के अन्य सदस्यों के लिए। घर के वरिष्ठजन किस्तों में अखबार पढते है। पहले दौर में हैडिंग्स और खास-खास खबरें फिर संपादकीय। उसके बाद पहला पन्ना फिर दूसरा। उसके बाद लेख वगैरहा। हमने एक बात नोट की कि बुजुर्गजन समसामयिक लेखों और करंट विषयों पर ज्यादा फोकस रखते हैं। अखबार थोड़ा पढा और रख दिया, फिर थोड़ा पढा और रख दिया। इस प्रकार यह सिलसिला शाम-रात तक चलता रहता है। इससे उनका समय भी व्यतीत हो जाता है और चारों तरफ की खबर भी रहती है।


कई लोग अपने टेस्ट की खबरों पे ज्यादा ध्यान देते हैं। विद्यार्थी ज्ञानवद्र्घक समाचारों का अध्ययन करते हैं। व्यापारियों की नजर व्यवसायिक समाचारों पर। गोटा उछला-शक्कर फीकी हुई। सोना चमका-चांदी मंदी। खिलाडिय़ों की नजरें किटकिट-हॉकी फुटबॉल व अन्य स्पोर्टस पर। कई लोग मिर्चीबडिय़ां खबरों के शौकीन। वो अपराधों से सनी खबरें पढ के अखबार टैक्सी की सीट के नीचे दबा के रख देते हैं। उन्हें ना गहलोत से मतलब ना सचिन से ना भाजपा से। बाड़ा जैपर में रहे या जैसलमेर में उन्हें कोई फरक पडऩे वाला नहीं।


बात घूम फिर कर वहीं आ गई जहां हम वापस पहुंचना चाहते थे। यूं कहें कि वापस वहीं ले आए तो भी गलत नहीं। बाड़ा तो बाड़ा है। जयपुर में थे तो बाड़े में थे। जैसलमेर में रहेंगे तो बाड़े में रहेंगे। वहां किसी को कैमल सफारी की छूट मिलने वाली नहीं। कोई धोरों में कैम्प फायर करता दिख जाए तो बताइयो। आप भी यही हैं और हम भी यहीं। फिर उन्हें बाहर जाने की जरूरत ही क्या। होटलों में खाना-पीना। होटल में मौज-मस्ती। होटल में स्विमिंग। होटल में लोक गीत-संगीत। होटल में इटेलियन भोजन। होटल में मनोरंजन के सारे साधन। इसके बावजूद वो कहें कि एक स्थान पर रहते-रहते बोर हो गए इसलिए दूसरे बाड़े में चले आए तो हैरत की बात हैं। कल तो कह दोगे कि घर में रहते-रहते बोर हो गए। बाड़ाबंदी चार दिन की चांदनी है, उसके बाद अपने-अपने दड़बों में ही आना है। हम साले मास्क का जुरमाना भर रहे है और वो होटलों में मलगोजे मार रहे है। बाड़ाबंदी वन में मजे-बाड़ाबंदी टू में मजे। भाड़ में जाए मतदाता। भाड़ में जाए जनता।


बात करे विधायकों के चौहटे की, तो इस की शुरूआत भी बॉस ने की। हमने इस बारे में कुछ कहा हो वो बता द्यो। बाड़ा उनका। वो बाड़े को हांकने वाले। बाड़ा जयपुर में हो या जैसलमेर में- कबूल है। मना करने का तो सवाल ही नही उठता। ऐसा होता तो मानेसर में होते। बॉस ने विधायकों का चौहटा लगाया था। उन्होंने कहा- ‘विधानसभा सत्र से पहले विधायकों के भाव 10 से लेकर 25 करोड़ थे अब अनलिमिटेड है।Ó इसके माने ये कि सत्र की तारीख ‘नेड़ी आते-आते भावों में और बढोतरी होगी। बॉस ये भाव कहां से लाए…। विधायकों की बोली कौन लगा रहा है और कहां लग रही है, किसी को पता नहीं। पता नहीं कौन सा भेदिया विधायकों के चौहटे के भाव से उन्हें अवगत कर रहा है।
जो आप देख रहे रहे हैं, वहीं हथाईबाज देख रहे हैं। बाड़ाबंदी वन हो या टू। विधायकों की घोड़ामंडी हो या चौहटा। किसी को नहीं सुहा रहा। आप क्या कहते हैं…!