अनंत चतुदर्शी पर भैरव मंदिर हुआ पूजन

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भैरव मंदिर
भैरव मंदिर

बड़ी संख्या में उमड़े भक्त

बीकानेर। अनंत चतुर्दशी के मौके पर शुक्रवार को श्री कोडमदेसर भैरव मंदिर में विधि-विधान से पूजा अर्चना हुई। मंदिर को फूलों से सजाया गया। भक्तों की उपस्थिति में मंदिर के मुख्य पुजारी ने प्रात बेला में पूजा अर्चना की। आरती के बाद प्रसादी वितरण हुआ। वर्षों पूर्व यह पूजन पंडित छगनलाल चूरा द्वारा किया जाता था। बाद में यह परंपरा राम प्रताप चूरा ने निभाई। आदित्य चूरा ने बताया कि वर्षों से प्रतिमाह शुक्ल चतुर्दशी को भक्तों द्वारा भैरवनाथ का पूजन पुजारी वर्ग के सहयोग से निर्बाध किया जा रहा है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में भक्त मौजूद रहे।

अनंत धागे में 14 गांठें लगाने का है विशेष महत्व

अनंत चतुदर्शी
अनंत चतुदर्शी

पूजन के बाद अनंत धागे में 14 गांठें लगाते हैं, फिर उसे गले या हाथ में धारण करते हैं। भगवान विष्णु के स्वरूप अनंत भगवान ने 14 लोकों की रचना की थी, इसलिए अनंत धागे में 14 गांठ लगाते हैं।

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा

प्राचीन समय में सुमंत नामक ब्राह्मण अपनी दीक्षा और बेटी सुशीला के साथ रहता था। सुशीला जब विवाह योग्य हुई तो उसकी मां का निधन हो गया। इस पर सुमंत ने कर्कशा नामक युवती से विवाह कर लिया। काफी समय बाद उसने अपनी बेअी सुशीला का विवाह कौंडिन्य ऋषि से कर दिया। कर्कशा ने अपने दामाद को ईंट-पत्थर देकर विदा किया।
कौंडिन्य ऋषि सुशीला को लेकर अपने आश्रम जा रहे थे, लेकिन रास्ते में रात हो गई तो एक जगह पर रुक गए। वहां पर कुछ महिलाएं अनंत चतुर्दशी व्रत की पूजा कर रही थीं। सुशीला उनके पास गई तो उन लोगों ने उसे व्रत की विधि और महिमा के बारे में बताया। सुशीला भी 14 गांठों वाला अनंत धागा पहन लिया और कौंडिन्य ऋषि के पास आ गई।
कौंडिन्य ऋषि ने उस धागे को तोड़कर आग में डाल दिया, इससे भगवान अनंत का अपमान हुआ। फलस्वरूप कौंडिन्य ऋषि की सारी संपत्ति नष्ट हो गई और वे दुखी रहने लगे। सुशाला ने इसके लिए अनंम धागे को जलाने को वजह माना। फिर कौंडिन्य ऋषि उस अनंत धागे की प्राप्ति के लिए वन में भटकने लगे। एक दिन वे भूख-प्यास से जमीन पर गिर पड़े, तब भगवान अनंत प्रकट हुए।
उन्होंने कहा कि कौंडिन्य तुमने अपनी गलती का पश्चाताप कर लिया है। घर जाकर अनंत चतुर्दशी का व्रत करो और 14 साल तक इस व्रत को करना। इसके प्रभाव से तुम्हारा जीवन सुखमय हो जाएगा और संपत्ति भी वापस आ जाएगी। कौंडिन्य ऋषि ने वैसा ही किया, जिसके फलस्वरूप वे सुखी जीवन व्यतीत करने लगे।

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