भावे ‘इ आम खट्टे

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किसे पता था कि पांडु की मुफतखोरी बचपन की ओर ले जाएगी। किसे पता था कि बचपन सुनी दूसरी पारी की ढलान में जाकर सच्चाई में बदली दिख जाएगी। किसे पता था कि तब से अंगूर आज आम में बदल जाएंगे। तब लोमड़ी ने कहा था-भावे ‘इ अंगूर खट्टे और आज पुरूषार्थी-लिप्सारहित-सहयोगी उर्फ पुलिस के गबरू जवान के लिए-‘भावे ‘इ आम खट्टे जैसी हालत। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।

हमने बचपन में ‘आम वाले आम दे इंडोर गेम खेला था। आज की नस्ल को इस ‘गेम पे हैरत हो रही होगी। उनके वास्ते इंडोर गेम के माने बेडमिंटन। टेनिस। लॉन टेनिस आदि-इत्यादि। उनके लिए ‘आम वाले आम दे खेल सस्पेंस का विषय। पर हमारी पीढी के लोग उस जमाने के आऊट डोर और इंडोर दोनों गेम्स से अच्छी तरह से वाकीफ। आज किरकिट ने लगभग सारे खेलों को धो डाला। हालांकि फुटबॉल-हॉकी और अन्य कुछ खेलों का क्रेज बरकरार है-मगर ज्यादातर खेल प्रेमियों का वोट किरकिट के बॉक्स में।

आज-कल ना तो बचपन रहा ना बचपना। एक समय था तब स्कूल की छुट्टी के बाद से लेकर बत्तियां लगने तक गली-गुवाड़ी-टोले-मौहल्ले में बच्चों की रौनक रहा करती थी। ना सरदी की चिंता ना गरमी की। बरसात में रौनक और बढ जाया करती थी। उन दिनों झुरनी। मालदडी। संतोलिया। कंचे। काणी गुप्पी। टीलमटीलो। पकड़म पकड़ाई। आईस-पाईस। ठुस्स। मियाजी की घोड़ी और गिल्ली-डंडा आदि खेल आउट डोर गेम्स की श्रेणी में आते थे। युवा लोग फुटबॉल और कबड्डी व वॉलीबॉल में मस्त। बच्चा लोग कपड़े की पोटली बना के उस पर ट्यूब के गेटिस चढा कर उसे गेंद का आकार देकर फुटबॉल खेलने का आनंद उठाते। कई बच्चे सांप सीढी। लूडो। व्यापार। अक्कड़-बक्कड़ और चर-भर खेलते। इन्हें इंडोर खेल की श्रेणी में रखा जाता। लड़कियों के लिए आउटडोर गेम लंगडी टांग और इंडोर खेल में गड्डे टॉप पर। आम वाले आम दे खेल कॉमन।

इसमें बच्चे हथेली को थम्स-अप का आकर देकर हाथ पे हाथ रखते। ऐसा करने वाला बच्चा आम बेचने वाला कहलाता। ग्राहक बने दूसरे बच्चे कहते-‘आम वाले आम दे। इस पर आम वाला कहता-‘आम हैं सरकार के। फिर बच्चे कहते-‘हम भी हैं सरकार के। एक आम ले लो। ‘यह तो खट्टा है। दूसरा ले लो। यह भी खट्टा है। इस प्रकार मीठें आम को भी खट्टा बताने का क्रम चलता रहता। एंड में जाकर ग्राहक बच्चे चिल्लाते-सभी आम मीठे हैं। पर यहां तो मीठे आम भी खट्टेतूड़ साबित हो गए।

बात करें भावे ‘इ आम खट्टे तो इस पर लोमड़ी वाली कहानी का मुलम्मा चढाया गया है। अंगूर की जगह आम और लोमड़ी की जगह पुलिस का हट्टा-कट्टा जवान। ऊंचाई पर लटके अंगूर के गुच्छे लपकने में बार-बार असफल रहने पर लोमड़ी कहती हैं-‘ छोड़ो मगर, कौन खाए खट्टे अंगूर। और वह गुच्छा तोडऩे में सफल हो जाती तो अंगूर मीठे और गुच्छा पंजों में नहीं आया तो अंगूर खट्टे। इस पर कहावत घड़ीज गई- भावे ‘इ अंगूर खट्टे। यहां आम भले ही मिसरी की तरह मीठे रहे होंगे मगर आगे चल कर अमचूर से भी ज्यादा खट्टे महसूस हुए।

कई लोगों को हैरत हो रही होगी कि आज आम-आओ-आमा.. का रट्टा क्यूं मारा जा रहा है। तो भईया ऐसा करना गुनाह तो नहीं। हम ‘अ से अनार के सुर बहाएं या ‘आ से आम के। कौन क्या बिगाड़ लेगा। हम आम की चर्चा करें या कैरी की या नींबू की। हम संसद में हंगामा तो मचा नही रहे या कि कागज फाड़ के तो उछाल नही रहे। ऐसा करने वालों पर भी फिलहाल कोई कार्रवाई नही हुई हम तो आम.. आम.. आम.. आम.. कर रहे हंै।

हुआ यूं कि जोधपुर पुलिस नियंत्रण कक्ष की चेतक गाड़ी के चालक व अंदर बिराजे हैड कांस्टेबल द्वारा ठेले वाले से बिना पैसे आम लेने का वीडियो सोशल मीडिया पे जबरदस्त रूप से वायरल हो गया। कई पुलिस वाले मुफतखोरी को अपना अधिकार समझते हैं। फोकट में खाना। फोकट में पीना। फोकट में कोई वस्तु ले लेना। ऐसे खाऊ-पीऊ-चरू के कारण पूरा कुनबा बदनाम। लोग इसीलिए पुलिस वालों को अच्छी नजर से नही देखते।

हांलांकि विभाग में भतेरे अफसर-सिपाही अच्छे हैं। मगर बिना पैसे दिए चरने की खबरें आने के बाद सबकी मेहनत पे पानी फिर जाता है। मुफत की आमखोरी ने भी वही किया। बदनामी होती देख अफसरों ने दोनों को लाइन हाजिर कर 17 सीसी के तहत आरोप पत्र भी थमा दिए। हथाईबाज या आम लोग भले ही पांडुओं को दी गई सजा को उचित ठहराएं मगर उन लोगों के लिए तो आम खट्टेतूड हो गए। कहानी की भाषा में कहें तो-भावे ‘इ आम खट्टे।

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