करौली में ‘बायोगैस विलेज’ की नई पहल
राजस्थान के करौली में डीएस ग्रुप 300 घरेलू बायोगैस इकाइयों के जरिए स्वच्छ खाना पकाने की ऊर्जा, टिकाऊ खेती और ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देगा। ग्राम गौरव संस्थान के साथ यह पहल स्थानीय गोबर को उपयोगी ईंधन और जैविक खाद में बदलकर जलवायु चुनौतियों से जूझ रहे परिवारों के लिए एक चक्रीय और व्यावहारिक मॉडल तैयार करने की दिशा में कदम है।
- बायोगैस विलेज: करौली में पहले चरण में 300 घरेलू बायोगैस इकाइयों की स्थापना होगी।
- स्वच्छ ऊर्जा: गोबर से बायोगैस तैयार कर लकड़ी, उपलों और फसल अवशेषों पर निर्भरता घटाने का प्रयास।
- टिकाऊ खेती: बायो-स्लरी का इस्तेमाल जैविक खाद के रूप में कर मिट्टी की सेहत और ग्रामीण आजीविका को मजबूत किया जाएगा।
DS Group Announces Biogas Village Initiative in Karauli : करौली के ग्रामीण इलाकों में पानी की कमी, अनियमित बारिश और गिरते भूजल स्तर के बीच खेती और पशुपालन आज भी बड़ी संख्या में परिवारों की आय का आधार हैं। ऐसे में स्थानीय संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने की दिशा में धर्मपाल सत्यपाल ग्रुप (डीएस ग्रुप) ने ‘बायोगैस विलेज’ पहल शुरू करने की घोषणा की है।
इस पहल के तहत पहले चरण में 300 परिवारों के लिए घरेलू बायोगैस इकाइयों की स्थापना में सहयोग दिया जाएगा। इसका उद्देश्य पशुओं से मिलने वाले गोबर को स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन में बदलना है, ताकि ग्रामीण परिवारों को पारंपरिक ईंधन पर कम निर्भर रहना पड़े।
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यह कार्यक्रम डीएस ग्रुप की करौली में चल रही वाटर इकोनॉमिक ज़ोन (WEZ) परियोजना से जुड़ा है। ग्राम गौरव संस्थान के सहयोग से संचालित इस परियोजना में जल संरक्षण, कृषि और डेयरी विकास को एक साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
बायोगैस पहल की शुरुआत पहले ही दो घरेलू इकाइयों के प्रदर्शन मॉडल से की जा चुकी है। इन इकाइयों से मिले अनुभव ने यह समझने में मदद की कि गांवों में उपलब्ध गोबर को घरेलू ऊर्जा के भरोसेमंद स्रोत में बदला जा सकता है। अब इसी अनुभव को बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी है।
डीएस ग्रुप में सस्टेनेबिलिटी और सीएसआर के जनरल मैनेजर प्रभाकांत जैन ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी का लक्ष्य ऐसे समाधान तैयार करना है, जो लंबे समय तक परिवारों और समुदायों के लिए उपयोगी रहें। उनके अनुसार, बायोगैस पहल ऊर्जा, कृषि, पशुधन, आजीविका और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे से जोड़ने का प्रयास है।
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बायोगैस से ग्रामीण परिवारों को खाना पकाने के लिए लकड़ी और उपलों के इस्तेमाल में कमी लाने में मदद मिल सकती है। इससे ईंधन जुटाने में लगने वाला समय और मेहनत भी कम हो सकती है। वहीं, बायोगैस उत्पादन के बाद बचने वाली बायो-स्लरी को खेतों में जैविक पोषक तत्व के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
WEZ परियोजना के तहत करौली में पहले से ही कई स्तरों पर काम किया जा रहा है। इनमें पोखर, पगारा, ताल और एनीकट जैसी जल-संचयन संरचनाएं, वाडी मॉडल, बेहतर फसल उत्पादन, बायो-रिसोर्स सेंटर और कस्टम हायरिंग सेंटर शामिल हैं। इसके अलावा मॉडल कैटल शेड, हरे चारे का विकास, पशु चिकित्सा सेवाएं और सामुदायिक डेयरी सहयोग भी परियोजना का हिस्सा हैं।



