त्योहारों में बढ़ेगी कर्ज मांग, बैंकों को लिक्विडिटी पर नजर
आरबीआई के डिप्टी गवर्नर रोहित जैन ने कहा कि त्योहारी सीजन के साथ देश में कर्ज की मांग तेज हो रही है। ऐसे में बैंकों को ऋण जरूरतों को पूरा करने के साथ अपनी लिक्विडिटी का भी संतुलित प्रबंधन करना होगा। उन्होंने बताया कि आरबीआई ने बैंकों के साथ इस मुद्दे पर बैठक कर रणनीतियों पर चर्चा की है और फंड के इस्तेमाल का फैसला बैंक अपनी कारोबारी जरूरतों के आधार पर करेंगे।
- कर्ज मांग: त्योहारी सीजन में उपभोक्ता, वाहन और होम लोन की मांग बढ़ने की संभावना।
- बैंक लिक्विडिटी: बढ़ती ऋण मांग के बीच बैंकों को फंड का संतुलित प्रबंधन करना होगा।
- रुपया: आरबीआई की पूनम गुप्ता ने मौजूदा स्तर से रुपये में मजबूती की गुंजाइश बताई।
RBI Flags Liquidity Focus Amid Rising Festive Loan Demand: मुंबई। त्योहारी सीजन के साथ देश में कर्ज की मांग बढ़ने लगी है। ऐसे में बैंकों के सामने ग्राहकों की बढ़ती ऋण जरूरतों को पूरा करने के साथ पर्याप्त लिक्विडिटी बनाए रखने की चुनौती होगी। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर रोहित जैन ने यह बात 13वें एसबीआई बैंकिंग एंड इकोनॉमिक्स कॉन्क्लेव के प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान कही।
रोहित जैन ने कहा कि देश में क्रेडिट ग्रोथ मजबूत बनी हुई है और आने वाले महीनों में बैंकों को अपनी फंडिंग स्थिति पर सावधानी से नजर रखनी होगी। उनके मुताबिक, बढ़ती ऋण मांग और पर्याप्त लिक्विडिटी के बीच संतुलन बनाए रखना बैंकिंग क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
उन्होंने बताया कि आरबीआई ने बैंकों के साथ बैठक कर लिक्विडिटी प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा भी की है। हालांकि, उपलब्ध धनराशि का इस्तेमाल किस क्षेत्र में और किस तरीके से किया जाएगा, इसका निर्णय प्रत्येक बैंक अपनी कारोबारी जरूरत और वित्तीय स्थिति के आधार पर करेगा।
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डिप्टी गवर्नर के मुताबिक, बैंकों की मौजूदा परियोजनाएं, लोन प्रस्तावों की पाइपलाइन और आने वाले समय में संभावित लिक्विडिटी स्थिति जैसे पहलू फंड के इस्तेमाल को प्रभावित करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि उपलब्ध लिक्विडिटी को किस तरह तैनात करना है, यह बैंकों का व्यावसायिक निर्णय होगा।
बैंकों की एसेट-लायबिलिटी पोजीशन भी इस फैसले में अहम भूमिका निभाएगी। त्योहारी अवधि में आम तौर पर उपभोक्ता ऋण, वाहन ऋण, आवास ऋण और कारोबार से जुड़े कर्ज की मांग में तेजी देखने को मिल सकती है। ऐसे में बैंकों को अपनी वित्तीय स्थिति को संतुलित रखते हुए संसाधनों का इस्तेमाल करना होगा।
इसी सम्मेलन में रुपये को लेकर भी आरबीआई की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि 31 मार्च 2025 से 16 सितंबर 2026 के बीच भारतीय रुपया पॉइंट-टू-पॉइंट आधार पर संचयी रूप से 13.1 प्रतिशत कमजोर हुआ है।
पूनम गुप्ता ने कहा कि मौजूदा स्तर पर रुपये के स्थिर रहने के साथ-साथ मजबूत होने की भी गुंजाइश है। उन्होंने पूंजी प्रवाह से जुड़े उपायों के समय बाजार विश्लेषकों की ऐसी ही उम्मीदों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने आगे कहा कि आने वाले वर्षों में भारत का चालू खाते का घाटा (CAD) और कम हो सकता है। इसके पीछे अर्थव्यवस्था की पारंपरिक मजबूती के अलावा वस्तुओं के निर्यात में बढ़ती सफलता जैसी नई ताकतों को भी एक वजह बताया गया।
पूनम गुप्ता के अनुसार, आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित परिस्थितियां बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंक के पास कई दशकों के चालू खाते के घाटे या भुगतान संतुलन के शुद्ध घाटे से निपटने की क्षमता है।
भारत की बाहरी अर्थव्यवस्था को लेकर उन्होंने बताया कि देश परंपरागत रूप से चालू खाते में मामूली घाटा और पूंजी खाते में बड़ा अधिशेष दर्ज करता रहा है। इसी वजह से भुगतान संतुलन (BoP) सकारात्मक रहा है।
त्योहारी सीजन में कर्ज मांग और बैंक लिक्विडिटी पर आरबीआई की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब बैंकिंग क्षेत्र को आर्थिक गतिविधियों के साथ बढ़ती ऋण जरूरतों के अनुरूप अपनी फंडिंग स्थिति को भी संभालना होगा।



