भूलकर भी कोई भूल हो ना..

हम ने पहले भी कहा था-आज फिर कह रहे हैं। हमने पहले भी सलाह दी थी-आज फिर दे रहे हैं। जरूरत पड़ी तो आइंदा भी देते रहेंगे। बार-बार देते रहेंगे। भाईबीरे के साथ देंगे। हाथाजोड़ी करके देंगे। मानने में हम सबकी भलाई है। सावधानी हटी-दुर्घटना घटी। हम फिर खाल से बाहर निकले तो तिबारा भुगतना पड़ेगा। कुछ लोगों की बेपरवाहियों की सजा पूरा समाज भुगते, यह ठीक नही है। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।

नसीब से भुगतना और भुगतने को न्यौता देने में जमीन-आसमां का अंतर है। देश-दुनिया में ऐसा कोई बंदा नहीं जिसने कभी ना कभी कोई ना कोई अच्छा बुरा लम्हा ना देखा हो। पल खुशी के हुए तो हंसी-ठठ्ठा और बुरे हुए तो भुगतना। जब समय अच्छा हो तो खुश-गपियों का माहौल और बुरा हो तो अंगुली भुगतने की ओर। कोई आर्थिक समस्या से ग्रस्त तो कोई हारी-बीमारी से। कोई शारीरिक रूप से लाचार तो कोई नुगरी औलाद से। कोई पिछले जनम की भुगतता है-कोई इस जनम की।

पुरखे कहते थे कि सात जनम की लगती है। पता नहीं किस जनम में पाप किए जो इस जनम में भुगत रहे हैं। हो सकता है वैसा हो रहा हो मगर समय चेंज। डिजीटलयुग में सात जनम पर विश्वास करने वालों की संख्या घटती दिखाई दे रही है। सुबह करो-शाम को भरो। इस जनम में बुरा किया है तो इसी जनम में भुगतो। अच्छे करम करोगे तो अच्छा फल मिलेगा-बुरे करम करोगे तो वैसा ही फल मिलेगा। कोई किसी का बुरा कर के राजी भले ही हो जाए पण एंड में भुगतना उसे ही पड़ता है।

कई दफे एक के गुनाह की सजा अनेक को भुगतनी पड जाती है। गलती माफ है-गुनाह की सजा अवश्य मिलती है। चाहे देर-सवेर मिले। कानून की नजरों से भले ही कोई गुनहगार बच जाए-नीली छतरी वाले के कानून से कोई नही बच सकता। उसके डंडे में आवाज नही होती। वो जब चलता है तो हिसाब बराबर करने के बाद ही ढबता है। लिहाजा खाल में रहना ही ज्यादा अच्छा। मालिक ने इंसान का जनम दिया। सब का भला करो-अच्छा करो। अच्छा ना कर सको तो कम से कम किसी का बुरा तो मत करो। मगर मानखा खाल से बाहर आने में अपनी शान समझता है।

हमने दो-चार दिन पहले ‘हम संकरे-गली भी संकरी शीर्षक से छपी हथाई में सलाह दी थी कि हम अपनी हद-सरहद में रहें तो सब के लिए अच्छा रहेगा। खाल से ज्यादा बाहर निकलना ठीक नही है। ज्यादा तो क्या कम निकलना भी घातक है। जब भगवान को सबके अपने-अपने खांचे सेट कर रखे हैं तो उनसे बाहर क्यूं निकलना। पुरखों ने कहा-कवि भी कहता हैं-‘हम चलें नेक रस्ते पे हमसे.. भूल कर भी कोई भूल हो ना..। हम भूल तो भूलाने के लिए तैयार है, मगर बेपरवाहियों की पराकाष्ठा लांघना कत्तई मंजूर नहीं। इसीलिए भाईसेणों को हद में रहने की नसीहत दी थी। आज फिर दे रहे हैं। हमने अब भी बेपरवाहियां जारी रखी तो हो सकता हैं-उसके और ज्यादा घातक परिणाम भुगतने पड़ जाएं।

सरकार लॉकडाउन के समय में परिवर्तन करने की सोच रही है। इस बाबत हथाईबाजों ने भी सरकार को खूब आड़े हाथों लिया। छूट का समय जंचा नहीं, ऊं ठ हवार लद गधी और ‘राफळरोळियो शीर्षकों से लगातार तीन दिन तक छपी हथाईयां छूट के समय पर ही केंद्रित रही। अभी यह छूट सुबह 6 से 11 बजे तक दी हुई है जो ना तो जनता को रास आ रही हैं, ना दुकानदारों को। भला इतनी सवेरे कौन सा कपड़े वाला अपनी दुकान खोलेगा और कौन से ग्राहक खरीददारी करने पहुंच जाएंगे। दुकाने अमूमन 9-10 बजे खुलनी शुरू होती है।

झाडू-सफाई-पूजा-करते-करते ग्यारह बजे जाते है। सरकारी हिसाब से तब तक दुकान ‘मंगळ करने का समय हो जाता है। ऐसे में कौन-कित्ती कमाई कर पाएगा या किसने कितनी कमाई की। हथाईबाजों ने इस की पूरी ‘फड़ बांची थी। शासन-प्रशासन को खूब लपेटा। खूब सुनाया। आम जनता भी उनके साथ। शायद उसी को देखते हुए सरकार अब छूट के समय में बदलाव करने का मानस बना रही है। मंगलवार से नया प्रावधान-गाइड लाइन लागू होणी है। छूट सुबह 10 से 3 बजे तक मिले या 11 से 4 बजे तक। पहली वाली छूट से तो ठीक है। सब कुछ ठीकठाक रहा तो समय सीमा बढाई भी जा सकती है।

हथाईबाजों की सलाह है कि हमें लापरवाहियां नहीं बरतनी है। छूट का दुरूपयोग नही करना है। खाल से बाहर नहीं निकलना है। छूट का समय बदला है-हालात बदलने में थोड़ा वक्त है। हम संयम से काम लें। धैर्य रखें-धीरज रखें। सरकारी गाइडलाइन का पालन करें। मास्क लगा के रखें। देह दूरी बनाए रखें। समय-समय पर हाथ धोते रहें। कोरोना भागेगा-हम जितेंगे..। जयहिन्द.. जयहिन्द..।

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