दारू ने कुंडा कर दिया

जो नही होना चाहिए था, वो हो गया। यूं कहे कि कर दिया तो भी अतिश्योक्ति नहीं। सब कु छ उलटा हो गया। जो कुछ सुना था वो सब का सब ‘ताक पर टंगा नजर आया। पहले नियम तोड़ा उसके बाद जानवर बन गए। वो भी जंगली। बकरी का गुस्सा बकरी वाले पे उतार दिया। क्षणिक आवेश में किसको क्या मिला जो तुम्हें मिल जाएगा। बेहतर तो यही होता कि ‘कि..च.. और हुर्र..र्र.. की सुर लहरियां बिखेर के उसे भगा देते। वो तो बिचारा जान से गया। उसका तो परिवार उजड़ गया-तुम भी गए गत्ते से। इस घटना से सीख लेने की जरूरत है। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।


एक हिसाब से देखा जाए तो ऊपर के पेरेग्राफ मेें भांत-भांत के विषय हैं जिन पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है। चर्चा भी सार्थक और उसका कोई परिणाम निकले तब तो है मजा, वरना इनने कह दी-उनने सुन ली और मामला नक्की। यह बात इसलिए कही कि अमूमन ऐसा ही होता है। अफसर-करमचारी बिराजते हैं। मीटिंगें करते हैं। भाषण होते हैं। दिशा-निर्देश दिए जाते हैं। उनका पे्रस नोट जारी होता है। अखबार छाप देते हैं। पाठक पढ लेते हैं और मामला नक्की।

कोरोनाकाल में जोधपुर की स्थिति दिन-ब-दिन विकट होती जा रही है। सैंकड़ों संक्रमित रोजिना सामने आ रहे हैं। सरकारी आंकड़े-कम और अखबारी सूत्रों के अनुसार ज्यादा। शासन-प्रशासन चाहे जितने दावे कर ले, लोगों का भरोसा छपे हुए हरफों के प्रति कल भी था। आज भी है और कल भी रहेगा। प्रशासन अपनी पेंठ खो चुका है जबकि अखबारों पर लोगों को पूरा विश्वास है। राज्य में जोधपुर कोरोना संक्रमितों के मामले में सबसे आगे है मगर प्रशासन आंकड़े छुपा रहा है। पहले तो सरकारी आंकड़े जारी हो जाया करते थे, बदनामी होते देख उन पर कुंडली भार दी। राज्य स्तर पर जारी होने वाले आंकड़ों में और अखबारों में प्रकाशित होने वाले आंकड़ो में रात-दिन का फरक। सरकारी स्तर पर सौ और अखबारी सूत्रों के अनुसार ढाई सौ। ये सूत्र दूसरे विभाग के तो होते नही है। जाहिर है कि घर के भेदिए ही अखबार वालों को अपनी ‘पोल बताते हैं। शासन-प्रशासन ऑक्सीजन पूरी मात्रा में होने का दम भरते हैं-अस्पतालों में टोटा। संक्रमित बढ रहे हैं तो छुपाने की क्या जरूरत है। ऐसा करने से संख्या कम तो होने वाली नहीं लिहाजा सच्चाई पेए परदा ना डाला जाए। ऐसा नहीं होना चाहिए, पर हो रहा है।

यह तो महज एक उदाहरण है वरना लगभग हर क्षेत्र में ऐसा ही हो रहा है। भांडे के दूसरे चावल के रूप में पौधारोपण को लिया जा सकता है। हथाईबाज इससे पूर्व भी इस पर चर्चा कर चुके हैं। मानसून के दिनों में हर साल सरकार से लेकर गली-गुवाडिय़ों की गालियां गुले-गुलजार होती। प्रत्येक कॉलोनी में हजारों पेड़ होते। पर ऐसा होता नही। कई बार तो कागजों में पौधारोपण होता है, कई बार दोष पशुओं, खासकर कर बकरियों पे थोप दिया जाता है। गायों की ओर उंगली उठा दी जाती है। जबकि बकरियां और गायें सबसे सीधे पालतू जिनावरों की श्रेणी में रखे गए हैं। आप किसी सांड या बकरे की पूंछ मरोड़ के देख ल्यो, भेंटी पडऩे के पूरे आसार। इसकी पलट में बकरियां-गायें सब कुछ सह लेती है तभी तो उनकी तुलना मानखा अपने से करता है।

लोग कहते भी है-‘वो गाय है जूं.. वो बकरी है ‘ जूं.. अर्थात वो गाय की तरह है..वो बकरी की तरह है..। इन दोनों सीधे-सादे जिनावरों का मानखा जमात से रिश्ता खासा पुराना और मजबूत है। भारतीय संस्कृति गाय के बिना अधूरी है। हम जिन्हें माता का दरजा देते आए हैं उनमें गाय सब से ऊपर। बचपन में हमने गाय और बकरी पे इतने लेख लिखे कि आज भी याद है। बकरी पर माजाकिया किस्सा याद आ गया। सम्मेलन में भाईजी झाड़ रहे थे- ‘बकरी चढी पहाड़ पर…बकरी चढी पहाड़ पर.. बकरी चढी पहाड़ पर..। भाईजी रट्टा मारते रहे। तभी पीछे से आवजा आई- फिर क्या हुआ..। होणा क्या, चरचुरा के वापस उतर गई। भाईजी ने बड़े प्यार से कहा। पर यहां उलटा हो गया। बकरी चरती-चरती पारटी में चली गई, जिसका खामियाजा चरवाहे को जान देकर चुकाना पड़ा।


हवा बंूदी के लालेड़ा क्षेत्र से आई। वहां के वरधा बांध पर कुछ लोग प्रतिबंध के बावजूद पारटी मनाने पहुंच गए। पारटी को पिकनिक का नाम दिया गया था। पारटीमैन मस्ती मार रहे थे तभी एक बकरी वहां पहुंच गई। उसने बोतलों-सोतलों-बरतन-भांडों में मुंह मार दिया। तभी उसका मालिक वहां आ गया फिर क्या था दारू में टंच लोगों ने उसकी इतनी सुड़ाई की कि जान चली गई। आगे वही होगा जो होना है। गिरफ्तारी जेल-केस और तारीख पेशी। पर वहां सीधीसादी बकरी का निरदोष मालिक खामखा मारा गया। मुंह बकरी ने मारा और मारा गया चारवाहा। पारटी में खलल बकरी ने डाली। जान से हाथ धोना पड़ा गडरिए को। इससे अच्छा तो यह होता कि बकरी को हु..र्र..र्र.. या ढगी..ढगी.. की सुर लहरियां बिखेर कर भगा दिया जाता पर दारू में कुंडा कर दिया। संत सयाने ठीक ही कहते हैं-‘नशा नाश का द्वार है।