अराकू की बोरा केव्स: पहाड़ों में छिपा कुदरत का अजूबा
राजस्थान के पत्रकारों के मीडिया दौरे के पांचवें दिन अराकू वैली की प्रसिद्ध बोरा केव्स ने सबका ध्यान खींचा। लाखों वर्षों में पानी और चूना-पत्थर की प्राकृतिक प्रक्रिया से बनी इन गुफाओं में स्टैलेक्टाइट-स्टैलेग्माइट संरचनाएं, धार्मिक आस्था, आदिवासी लोककथा और भू-विरासत एक साथ देखने को मिलती हैं।
विनोद शर्मा –
भारत सरकार की विकास संचार और सूचना प्रसार (डीसीआईडी) योजना के तहत आंध्र प्रदेश के मीडिया दौरे पर आए राजस्थान के पत्रकारों के दल ने अपने दौरे के पांचवे दिन सूचना कार्यालय (पीआइबी), जयपुर के सहायक निदेशक अमित कनौजिया की अगुवाई में विशाखापट्टनम के निकट प्रसिद्ध पर्वतीय क्षेत्र अराकू वैली स्थित बोरा केव्स का दौरा किया।
बोरा केव्स : प्रकृति की लाखों साल पुरानी अद्भुत गुफा

बोरा केव्स (Borra Caves) आंध्र प्रदेश के अराकू क्षेत्र की अनंतगिरी पहाड़ियों में स्थित भारत की प्रमुख प्राकृतिक चूना-पत्थर की गुफाओं में शामिल हैं। यह क्षेत्र वर्तमान में अल्लूरी सीताराम राजू जिले में आता है। गुफाएं समुद्र तल से करीब 1,400 मीटर की ऊंचाई पर हैं और लगभग 2 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हैं। इनके चूना-पत्थर के कार्स्ट संरचनात्मक भाग करीब 80 मीटर तक गहरे हैं।
1807 में हुई खोज
बोरा गुफाओं की खोज का श्रेय 1807 में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से जुड़े विलियम किंग जॉर्ज को दिया जाता है। इसके बाद यह क्षेत्र भू-विज्ञान और पर्यटन, दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गया। आंध्र प्रदेश सरकार बोरा केव्स को विशाखापट्टनम क्षेत्र के जियो-हेरिटेज स्थलों में शामिल करती है।
कैसे बनी इतनी विशाल गुफा?

बोरा केव्स मुख्यतः कार्स्टिक चूना-पत्थर से बनी हैं। लंबे समय तक पानी के रिसाव और बहाव ने चूना-पत्थर को धीरे-धीरे घोला और भूमिगत रास्ते तथा विशाल कक्ष बनते गए। गुफा के भीतर छत से नीचे की ओर बनने वाली संरचनाओं को स्टैलेक्टाइट और जमीन से ऊपर उठने वाली संरचनाओं को स्टैलेग्माइट कहा जाता है।
इन प्राकृतिक संरचनाओं का आकार कहीं शिवलिंग, कहीं मानव आकृति, पशु-पक्षी या अन्य आकृतियों जैसा दिखाई देता है। यही कारण है कि गुफा का प्राकृतिक सौंदर्य धार्मिक और लोकविश्वासों से भी जुड़ गया है।
शिवलिंग और गोस्थनी नदी का संबंध

गुफा के भीतर प्राकृतिक रूप से बना एक शिवलिंग श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। इसके ऊपर चट्टान से लगातार पानी की बूंदें गिरती रहती हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार यहीं से गोस्थनी नदी का उद्गम माना जाता है। यह धार्मिक मान्यता है; सरकारी विवरण भी गुफा के भीतर शिवलिंग और गोस्थनी नदी के संबंध का उल्लेख करते हैं।
गुफा के अंदर क्या खास है?
विशाल प्राकृतिक चूना-पत्थर के कक्ष और सुरंगें
स्टैलेक्टाइट और स्टैलेग्माइट की अद्भुत संरचनाएं
प्राकृतिक रूप से बनी विभिन्न आकृतियां
चमगादड़ और गोल्डन गेको जैसे जीव
काई तथा भूरे से हरे रंग की शैवाल प्रजातियां
आसपास चूना-पत्थर, कैल्साइट, अभ्रक, क्वार्ट्ज आदि खनिजों की उपस्थिति।
पर्यटन का प्रमुख केंद्र

गुफाओं के अंदर प्रकाश व्यवस्था की गई है, जिससे प्राकृतिक चट्टानी संरचनाएं अलग-अलग रूपों में दिखाई देती हैं। बोरा केव्स विशाखापट्टनम से करीब 100 किमी दूर और अराकू घाटी के मार्ग पर स्थित हैं। यहां बोरा केव्स रेलवे स्टेशन भी है, इसलिए सड़क के साथ रेल मार्ग से भी पहुंचा जा सकता है।
लोककथा भी है रोचक
स्थानीय आदिवासी लोककथा के अनुसार एक गाय चरते-चरते गुफा की छत में बने छेद से नीचे गिर गई। गाय की तलाश में निकले चरवाहे को गुफा का पता चला और अंदर उसे शिवलिंग जैसी आकृति दिखाई दी। इसके बाद इस स्थान को धार्मिक महत्व मिलने लगा। यह स्थानीय लोककथा है, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना नहीं।
बोरा केव्स की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भू-विज्ञान, प्राकृतिक विरासत, आदिवासी लोककथा और धार्मिक आस्था एक ही स्थल पर दिखाई देती है। अराकू घाटी की पहाड़ियों में बनी यह गुफा आंध्र प्रदेश के प्रमुख पर्यटन आकर्षणों में है और राज्य के जियो-हेरिटेज स्थलों में भी दर्ज है।




