कोणार्क से पुरी तक: जहां पत्थरों में इतिहास और आस्था में जीवंत है ओडिशा
सूर्य मंदिर की शिल्पकला से भगवान जगन्नाथ के दरबार तक—ओडिशा के दो ऐतिहासिक पड़ावों ने दिखाई विरासत और आस्था की अलग-अलग तस्वीर
विशेष रिपोर्ट: दीपक मेहता
पुरी/कोणार्क। ओडिशा की यात्रा शुरू करते ही महसूस होता है कि यह प्रदेश केवल पर्यटन का नक्शा नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, स्थापत्य और आस्था की एक जीवंत किताब है। पीआईबी के साथ ओड़िशा यात्रा में हमारा पहला पड़ाव रहा कोणार्क का विश्वप्रसिद्ध सूर्य मंदिर और उसके बाद पुरी में भगवान जगन्नाथ के दर्शन। कुछ घंटों और कुछ किलोमीटर के इस सफर में जैसे सदियों का इतिहास सामने से गुजरता दिखाई दिया।
विश्व का एक ऐसा सूर्य मंदिर जहां कभी सूर्य देव की पूजा ही नहीं हो पाई
कहा जाता है कि 13वीं सदी में राजा नरसिंहदेव-1 ने 1200 कारीगरों को 12 साल में इसे बनाने का आदेश दिया था और तय समय पर काम पूरा न होने पर सभी के सिर कलम करने की कठोर चेतावनी दी थी। जब अनुभवी कारीगर अंतिम चरण में मंदिर की मुकुट शिला (दधिनौती) स्थापित करने में बार-बार विफल रहे, तो मुख्य वास्तुकार बिसु महाराणा के 12 वर्षीय पुत्र धर्मपाद ने अपनी अद्भुत सूझबूझ से इसे सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया।
मुकुट शिला स्थापित होने के बाद कारीगरों को डर सताने लगा कि यदि राजा को पता चला कि 1200 अनुभवी लोगों का काम एक बच्चे ने किया है, तो वे क्रोध और अपमान के कारण सबको मृत्युदंड दे देंगे। अपने पिता और सभी 1200 कारीगरों के प्राण बचाने के लिए, 12 वर्षीय धर्मपाद ने रात के सन्नाटे में मंदिर के शिखर से चंद्रभागा नदी में छलांग लगाकर अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया। एक बालक के इसी दुखद आत्मबलिदान के कारण मंदिर अपवित्र मान लिया गया और वहाँ कभी पूजा शुरू नहीं हो सकी।

कोणार्क: जहां पत्थर बोलते हैं इतिहास की भाषा
सुबह की रोशनी में कोणार्क सूर्य मंदिर को करीब से देखना अपने आप में अलग अनुभव रहा। दूर से दिखाई देती इसकी विशाल संरचना जैसे-जैसे पास आती है, दीवारों पर उकेरी गई बारीक शिल्पकला ध्यान खींचने लगती है। इसके 24 अलंकृत पहिए और सात घोड़ों की संरचना इसे भारतीय स्थापत्य की अनूठी कृतियों में शामिल करती है। यह मंदिर पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियों में तत्कालीन समाज, संगीत, नृत्य, पशु-पक्षियों और जीवन के विभिन्न पहलुओं की झलक मिलती है। यानी यह मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि उस दौर के जीवन का एक तरह का पत्थर पर दर्ज दस्तावेज भी है।
24 पहिए और समय की कहानी

कोणार्क के पहिए इस पूरे परिसर की सबसे आकर्षक विशेषताओं में हैं। इनके बीच और बाहरी हिस्सों में की गई महीन नक्काशी देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय के शिल्पकारों के पास कला के साथ-साथ गणना और ज्यामिति की भी गहरी समझ रही होगी। यही वजह है कि कोणार्क को देखते हुए मन में बार-बार एक सवाल आता है—सैकड़ों वर्ष पहले बिना आधुनिक मशीनों और तकनीक के इतनी विशाल और बारीक संरचना आखिर कैसे तैयार की गई होगी?
एक पत्रकार के तौर पर इस यात्रा को केवल दर्शन नहीं माना जा सकता। किसी ऐतिहासिक स्मारक को देखना एक बात है, लेकिन उसके पीछे छिपे श्रम, ज्ञान और सामाजिक इतिहास को समझना दूसरी।
‘ब्लैक पैगोडा’ से विश्व धरोहर तक
कोणार्क का सूर्य मंदिर समुद्र के नजदीक होने के कारण समुद्री यात्रियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण पहचान रहा। यूरोपीय नाविकों के विवरणों में इसे ‘ब्लैक पैगोडा’ के नाम से भी जाना गया। आज यह मंदिर UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल है। समय, प्राकृतिक परिस्थितियों और इतिहास के उतार-चढ़ाव के बावजूद इसकी स्थापत्य विरासत आज भी लोगों को आकर्षित करती है।कोणार्क में खड़े होकर सबसे खास अनुभव यह रहा कि यहां इतिहास किसी किताब के पन्ने पर नहीं, बल्कि आंखों के सामने पत्थरों में दर्ज दिखाई देता है।
कोणार्क से पुरी: बदलते दृश्य, बदलता अनुभव
कोणार्क से पुरी की ओर बढ़ते हुए यात्रा का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगता है। एक ओर पीछे छूटता है सूर्य मंदिर का स्थापत्य संसार, तो दूसरी ओर पुरी में प्रवेश के साथ धार्मिक गतिविधियों और श्रद्धालुओं की मौजूदगी बढ़ती दिखाई देती है। पुरी की पहचान सदियों से भगवान जगन्नाथ की परंपरा के साथ जुड़ी हुई है। यहां मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि शहर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।
पुरी में भगवान जगन्नाथ के दर्शन

पुरी पहुंचकर श्री जगन्नाथ मंदिर में दर्शन का अवसर मिला। मंदिर परिसर के आसपास श्रद्धालुओं की गतिविधियां और शहर की धार्मिक लय इस बात का अहसास कराती है कि यहां परंपरा केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि आज भी रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है। भगवान जगन्नाथ के साथ भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की आराधना इस परंपरा की विशिष्ट पहचान है। यहां की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि मुख्य देव प्रतिमाएं लकड़ी से निर्मित हैं और समय-समय पर होने वाली धार्मिक परंपराओं के तहत उनका नवीनीकरण किया जाता है। दर्शन के दौरान सबसे उल्लेखनीय बात अलग-अलग स्थानों से आए श्रद्धालुओं की विविधता रही। भाषा अलग हो सकती है, पहनावा अलग हो सकता है, लेकिन मंदिर के सामने पहुंचते ही सबकी आस्था का भाव एक जैसा दिखाई देता है।

दुनिया की सबसे बड़ी व अनोखी रसोई, पूरी तरह सात्विक और पारंपरिक तरीके से तैयार होता है यहां महाप्रसाद
भगवान जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी की आंच पर पकाया जाने वाला साक्षात ‘अन्नब्रह्म‘ का स्वरूप है, जहाँ एक के ऊपर एक रखे सात बर्तनों में से सबसे ऊपर का भोजन सबसे पहले पकता है। भगवान और माता विमला को अर्पित होने के बाद यह प्रसाद मंदिर के ‘आनंद बाजार’ में सभी भक्तों को बिना किसी भेद-भाव के संकुदी और सुखीला के रूप में प्राप्त होता है।
इतिहास से आस्था तक—एक ही यात्रा में दो अनुभव
कोणार्क और पुरी की यात्रा को अगर एक साथ देखा जाए तो दोनों स्थान एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होते हुए भी एक-दूसरे से जुड़े नजर आते हैं। कोणार्क ने सवाल खड़े किए—इतनी अद्भुत स्थापत्य कला कैसे बनी?
पुरी ने दूसरा सवाल सामने रखा—सदियों पुरानी परंपराएं आज भी लोगों को किस तरह जोड़ती हैं? कोणार्क में पत्थरों पर इतिहास दिखाई देता है, जबकि पुरी में परंपरा आज भी जीवंत रूप में सामने आती है। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी खूबसूरती रही।
पत्रकार की नजर से: पर्यटन से कहीं आगे है ओडिशा
एक यात्रा केवल किसी जगह पहुंचकर तस्वीरें खींचने और वहां की खूबसूरती देखने तक सीमित नहीं होती। असली कहानी उन चीजों में छिपी होती है जो पहली नजर में दिखाई नहीं देतीं। कोणार्क में वह कहानी शिल्पकारों की कला, स्थापत्य और इतिहास में दिखाई देती है। पुरी में वही कहानी आस्था, परंपरा और लोगों के विश्वास के रूप में सामने आती है। इस यात्रा ने यह महसूस कराया कि विरासत केवल पुरानी इमारतों को बचाकर रखने का नाम नहीं है। विरासत तब जीवित रहती है जब समाज उसे अपनी स्मृतियों और परंपराओं में आगे बढ़ाता रहता है।



