कचरा अब अनुपयोगी नहीं
भुवनेश्वर स्थित सीएसआईआर-आईएमएमटी में कोयला अवशेष, फ्लाई ऐश और रेड मड जैसे सेकेंडरी रिसोर्सेज से दुर्लभ मृदा तत्व और क्रिटिकल मिनरल्स निकालने पर तेजी से काम चल रहा है। फ्लाई ऐश पायलट प्लांट से उपयोगी उत्पादों की रिकवरी, NdPr तकनीक और उद्योगों के साथ साझेदारी इस शोध को प्रयोगशाला से बाजार तक पहुंचाने की दिशा में अहम कदम माने जा रहे हैं।
- सीएसआईआर-मिनरल्स एंड मटेरियल्स टेक्नोलॉजी संस्थान से वेस्ट में छिपे खजाने की तलाश
- क्रिटिकल मिनरल्स की नई तकनीक पर भुवनेश्वर में बड़ा काम
(दीपक मेहता)
भुवनेश्वर। जिस खनिज या चीजों को हम पहले कभी बेकार समझकर छोड़ दिया जाता था, उसमें छिपे महत्वपूर्ण तत्व अब देश की जरूरतों का हिस्सा बन रहे हैं। यानि कचरा अब कचरा नहीं उसे भी जनउपयोगी बनाया जा रहा है भुवनेश्वर स्थित सीएसआईआर-मिनरल्स एंड मटेरियल्स टेक्नोलॉजी संस्थान (CSIR-IMMT) में। यहां का खनिज प्रसंस्करण, महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) और कचरे से मूल्यवान सामग्री की रिकवरी पर अनुसंधान (शोध) को नई दिशा मिल रही है।
डॉ. रामानुज नारायण. निदेशक, सीएसआईआर आईएमएमटी ने जानकारी देते हुए बताया कि संस्थान की मौजूदा शोध परियोजनाओं में कोयला अवशेष (कोल रिजेक्ट्स), फ्लाई ऐश, रेड मड और अन्य माध्यमिक संसाधनों (सेकेंडरी रिसोर्सेज) से दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earth Elements – REEs) तथा अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की रिकवरी शामिल है। संस्थान की जानकारी के अनुसार कोबाल्ट, निकेल, टाइटेनियम, वैनेडियम, लिथियम, मैंगनीज और दुर्लभ मृदा तत्वों जैसी सामग्रियों की रिकवरी पर भी काम किया जा रहा है।
फ्लाई ऐश से निकलेंगे कई उपयोगी उत्पाद

इस दिशा में अगस्त 2026 में एक महत्वपूर्ण प्रायोगिक संयंत्र (पायलट प्लांट) शुरू किया गया। नाल्को (NALCO) के अनुसंधान और प्रौद्योगिकी केंद्र, भुवनेश्वर में स्थापित इस संयंत्र को सीएसआईआर-आईएमएमटी (CSIR-IMMT) और केआईआईटी (KIIT) ने नाल्को, सीएसआईआर तथा खान मंत्रालय के सहयोग से विकसित किया है।
इसकी क्षमता 50 किलोग्राम फ्लाई ऐश प्रतिदिन प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) करने की है। संयुक्त रूप से विकसित और पेटेंट प्रक्रिया के जरिए फ्लाई ऐश से एलुमिना, कैल्शियम सिलिकेट, क्वार्ट्ज अवशेष और दुर्लभ-मृदा तत्वों से समृद्ध आयरन हाइड्रॉक्साइड अवशेष जैसे उत्पादों को पुनर्प्राप्त (रिकवर) करने का प्रयास किया जा रहा है।
यानी जिस फ्लाई ऐश को औद्योगिक कचरे के रूप में देखा जाता है, उसमें मौजूद अलग-अलग सामग्रियों को अलग कर उपयोगी उत्पाद बनाने की दिशा में तकनीक विकसित की जा रही है।
दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earths) पर बढ़ा फोकस

महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक मांग बढ़ने के साथ दुर्लभ मृदा तत्व भी रणनीतिक महत्व हासिल कर रहे हैं। सीएसआईआर- ईएमएमटी में प्राथमिक संसाधनों के साथ-साथ माध्यमिक संसाधनों से भी आरईई (REEs) रिकवर करने की परियोजनाएं चल रही हैं।
संस्थान की एक 2026 की परियोजना में क्षारीय चट्टानों (अल्कलाइन रॉक्स) जैसे प्राथमिक स्रोतों तथा कोयला अवशेषों, फ्लाई ऐश और रेड मड जैसे माध्यमिक स्रोतों से आरईई की रिकवरी पर काम हो रहा है।
इसी क्रम में अगस्त 2026 में सीएसआईआर-आईएमएमटी और लोहम (LOHUM) के बीच सहयोग समझौता भी हुआ। इसका उद्देश्य नियोडिमियम-प्रासियोडिमियम (NdPr) जैसी सामग्रियों के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित करना है, जो उच्च-प्रदर्शन वाले दुर्लभ-मृदा स्थायी चुम्बकों (परमानेंट मैग्नेट) के निर्माण में महत्वपूर्ण हैं।
अनुसंधान से उद्योग (इंडस्ट्री) तक पहुंचाने की कोशिश

सीएसआईआर-आईएमएमटी का मौजूदा फोकस केवल प्रयोगशाला अनुसंधान तक सीमित नहीं दिखता। जुलाई 2026 में इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) और सीएसआईआर-आईएमएमटी के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) में महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों से जुड़े अनुसंधान एवं विकास (R&D), प्रौद्योगिकी के विस्तार (स्केल-अप) तथा प्रायोगिक और व्यावसायिक तैनाती (कमर्शियल डिप्लॉयमेंट) पर सहयोग शामिल है।
ऑयल इंडिया के साथ भी महत्वपूर्ण खनिजों पर संयुक्त अनुसंधान एवं विकास के लिए सहयोग हुआ है। इसका बड़ा सवाल यही है कि प्रयोगशाला में विकसित तकनीक को औद्योगिक स्तर पर कितनी तेजी से लागू किया जा सकता है। यही वह चरण है जहां अनुसंधान को व्यावसायिक तकनीक में बदलने की असली चुनौती सामने आती है।
अमेरिका की भी नजर

9 सितंबर 2026 को अमेरिकी वाणिज्य दूतावास (Consulate General) के प्रतिनिधिमंडल ने सीएसआईआर-आईएमएमटी का दौरा किया। प्रतिनिधिमंडल ने मिनरल प्रोसेसिंग पायलट प्लांट, पीजीएम पायलट प्लांट और सीबेड मिनरल्स पायलट प्लांट जैसी सुविधाओं को देखा तथा महत्वपूर्ण खनिजों और उन्नत प्रसंस्करण तकनीकों में भारत-अमेरिका सहयोग पर चर्चा की।
यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब भारत और दूसरे देश महत्वपूर्ण-खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने और प्रसंस्करण तकनीकें विकसित करने पर जोर दे रहे हैं।
ओडिशा के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
ओडिशा पहले से ही खनिज-समृद्ध राज्य है। अब राज्य में केवल खनन और कच्चे माल की आपूर्ति के बजाय खनिज प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) और महत्वपूर्ण-खनिज तकनीकों पर भी जोर बढ़ रहा है।
पारदीप में क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग पार्क प्रस्तावित किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। यह विकास ओडिशा में खनन से आगे बढ़कर प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन का पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) बनाने की संभावनाओं से जुड़ा है।
ऐसे में भुवनेश्वर स्थित सीएसआईआर-आईएमएमटी का अनुसंधान और प्रायोगिक स्तर की तकनीकों का महत्व केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रह जाता। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन तकनीकों में से कितनी व्यावसायिक संयंत्रों तक पहुंचती हैं और उनका वास्तविक औद्योगिक उत्पादन कितना होता है।

संस्थान के निदेशक का धर्मेश भारती (डिप्टी डायरेक्टर, पीआईबी जयपुर) ने प्रतीक चिन्ह भेज कर आभार व्यक्त किया



