एक मंदिर ऐसा, जहाँ ‘हरि-हर’ एक साथ विराजते हैं

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित लिंगराज मंदिर सिर्फ आस्था का प्रमुख केंद्र नहीं, बल्कि कलिंग वास्तुकला की शानदार मिसाल भी है। भगवान शिव और विष्णु को समर्पित इस प्राचीन मंदिर में हरिहर स्वरूप की पूजा की जाती है, जहां शिव और विष्णु का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

विशेष रिपोर्ट : दीपक मेहता 

भुवनेश्वर को अक्सर मंदिरों का शहर कहा जाता है और इस पहचान के केंद्र में लिंगराज मंदिर का खास स्थान है। भगवान शिव और विष्णु को समर्पित यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ अपनी भव्य वास्तुकला और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए भी जाना जाता है।

मंदिर की सबसे दिलचस्प विशेषता यहां पूजे जाने वाले स्वयंभू शिवलिंग से जुड़ी है। इसे हरिहर स्वरूप का प्रतीक माना जाता है, यानी इसमें भगवान विष्णु के ‘हरि’ और भगवान शिव के ‘हर’ स्वरूप का समन्वय देखा जाता है। इसी मान्यता के कारण यहां शिव पूजा में तुलसी के पत्ते भी चढ़ाने की परंपरा है।

​शिखर पर त्रिशूल नहीं

अधिकांश शिव मंदिरों के शिखर पर त्रिशूल स्थापित होता है, लेकिन लिंगराज मंदिर के शीर्ष पर भगवान शिव रूप श्री राम का धनुष ‘पिनाक’ और चक्र स्थापित है, जो हरि और हर के संगम का प्रतीक है। वहीं मन्दिर के सामने एक स्तम्भ के रूप में गरुड़ देव और नंदी जी भी एक साथ विराजे है।

​तुलसी और बेलपत्र का एक साथ अर्पण

यह मंदिर केवल शिव (हर) का नहीं, बल्कि विष्णु (हरि) और शिव के समन्वित रूप ‘हरिहर’ को समर्पित है। यही कारण है कि यहाँ शिवलिंग पर बिल्वपत्र के साथ-साथ भगवान विष्णु को प्रिय तुलसी पत्र भी चढ़ाए जाते हैं, जो किसी अन्य प्रमुख शिव मंदिर में दुर्लभ है।

कर्ज़न व्यूइंग प्लेटफॉर्म

मंदिर में पारंपरिक रूप से केवल सनातन धर्मावलंबियों का प्रवेश अनुमन्य है। 20वीं सदी की शुरुआत में जब ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्ज़न यहाँ आए, तो उनके लिए मंदिर के बाहर उत्तरी दीवार के पास एक ऊँचा पत्थर का चबूतरा (Viewing Platform) बनवाया गया था, जहाँ से आज भी गैर-हिंदू या विदेशी पर्यटक पूरे मंदिर की नक्काशी का अवलोकन करते हैं।

11वीं शताब्दी से जुड़ा इतिहास

एक मंदिर ऐसा, जहाँ 'हरि-हर' एक साथ विराजते हैं
Image Source : Via Dainik Jaltedeep

लिंगराज मंदिर का वर्तमान भव्य स्वरूप 11वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। इसके निर्माण का श्रेय सोमवंशी शासक ययाति प्रथम, जिन्हें ययाति केसरी भी कहा जाता है, को दिया जाता है। समय के साथ यह मंदिर भुवनेश्वर की धार्मिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

कलिंग शैली की शानदार मिसाल

लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह मंदिर कलिंग वास्तुकला की खासियतों को बेहद खूबसूरती से सामने रखता है। इसका मुख्य शिखर लगभग 180 फीट ऊंचा बताया जाता है, जो दूर से ही मंदिर की भव्यता का एहसास कराता है।

मंदिर की पूरी संरचना चार प्रमुख हिस्सों में विभाजित है विमान यानी गर्भगृह, जगमोहन यानी सभा कक्ष, नाट्यशाला और भोगमंडप। मुख्य मंदिर के आसपास बने छोटे मंदिरों की बड़ी संख्या पूरे परिसर को एक विशाल धार्मिक परिसर का रूप देती है।

बिंदु सागर से जुड़ी परंपरा

मंदिर के पास स्थित बिंदु सागर भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रमुख उत्सवों के दौरान भगवान की प्रतिमा को यहां ले जाने की परंपरा है। इससे मंदिर और बिंदु सागर के बीच का धार्मिक संबंध और गहरा हो जाता है।

महाशिवरात्रि पर उमड़ता है आस्था का सैलाब

लिंगराज मंदिर में महाशिवरात्रि और अशोकाष्टमी प्रमुख पर्वों में शामिल हैं। इन अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है।

मंदिर की धार्मिक मान्यताओं के साथ यहां प्रवेश से जुड़े नियम भी महत्वपूर्ण हैं। गर्भगृह और मंदिर परिसर में केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों को प्रवेश की अनुमति है। गैर-हिंदू पर्यटक मंदिर के बाहर बने विशेष मंच से इसकी भव्यता देख सकते हैं और फोटोग्राफी कर सकते हैं।

लिंगराज मंदिर की खासियत यही है कि यहां इतिहास, आस्था और वास्तुकला एक-दूसरे से अलग नहीं लगते। भव्य शिखर से लेकर हरिहर परंपरा तक, मंदिर भुवनेश्वर की उस विरासत को सामने रखता है, जिसने शहर को भारत के प्रमुख मंदिर नगरों में खास पहचान दिलाई है।

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