प्रकृति का रौद्र रूप : पलभर में बिखर गए आशियाने, नेपाल का संकट भारत के लिए भी चिंता
नेपाल में बाढ़, भूस्खलन और झील फटने की घटनाओं ने हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता फिर उजागर कर दी है। तबाही से जान-माल का भारी नुकसान हुआ और बड़ी संख्या में लोग लापता हैं। नेपाल में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा भी चिंता का विषय है। यह आपदा भारत, नेपाल और चीन के बीच बेहतर चेतावनी तंत्र, सूचनाओं के आदान-प्रदान और आपदा प्रबंधन की जरूरत बताती है।
- नेपाल बाढ़ और भूस्खलन ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई।
- भारत के लिए चिंता बढ़ी, कई भारतीय नागरिकों के प्रभावित होने की खबरें हैं।
- हिमालयी आपदा से निपटने के लिए बेहतर चेतावनी और क्षेत्रीय सहयोग जरूरी।
Nepal Flood Disaster Raises Alarm for India : नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि प्रकृति के सामने इंसान की सारी तैयारियां कितनी छोटी पड़ सकती हैं। कुछ ही क्षणों में शांत बहने वाली नदियां विनाश की धार बन गई और देखते ही देखते घर, सड़कें, पुल और वाहन सैलाब में समा गए। जिन परिवारों ने अपने घरों में सुरक्षित भविष्य के सपने संजोए थे, उनके सामने अब अपनों की तलाश और जीवन को फिर से खड़ा करने की चुनौती है। बाढ़ और भूस्खलन से दोनों देशों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत और लापता होने की खबरों ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है।
नेपाल-तिब्बत सीमा के पास एक और झील के फटने की घटना ने संकट को और गंभीर कर दिया है। चोचेन नदी और पुरेपु सांगपो नदी के संगम के पास बनी झील के फटने के बाद पानी का स्तर तेजी से बढ़ने लगा। खतरे को देखते हुए नेपाल के रसुवा जिले में बचाव अभियान कुछ समय के लिए रोकना पड़ा। भोटेकोशी, त्रिशूली और नारायणी नदी के आसपास बसे गांवों को खाली कराया जा रहा है। सेना और सुरक्षाकर्मियों ने भी लोगों से तत्काल सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है। चीन की ओर भी राहत एवं बचाव अभियान रोककर लेवल-4 अलर्ट जारी किया गया है। यानी संकट अभी टला नहीं है और दोबारा बाढ़ आने की आशंका बनी हुई है।
सबसे बड़ी चिंता जनहानि को लेकर है। अब तक सामने आए आंकड़ों के अनुसार बाढ़ और भूस्खलन से दोनों देशों में सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है और 1500 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या भारतीय नागरिकों की भी है। अपनों से बिछड़े परिवार राहत केंद्रों और अस्पतालों के बाहर अपने परिजनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं। किसी के हाथ में तस्वीर है तो किसी की आंखें उस रास्ते पर टिकी हैं जहां से शायद उनका अपना लौट आए। आपदा के ऐसे क्षणों में आंकड़े केवल संख्या नहीं होते, बल्कि हर संख्या के पीछे एक परिवार, एक सपना और कई रिश्ते जुड़े होते हैं। भारत के लिए नेपाल की यह त्रासदी इसलिए भी चिंता का विषय है क्योंकि दोनों देशों के बीच गहरे सामाजिक और पारिवारिक संबंध हैं। नेपाल में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक रहते और काम करते हैं।
सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों का एक-दूसरे के यहां आना-जाना सामान्य बात है। ऐसे में नेपाल की प्राकृतिक आपदा का असर भारत तक पहुंचना स्वाभाविक है। भारत सरकार ने संकट की इस घड़ी में हर संभव सहायता और लापता भारतीयों की तलाश के लिए प्रयास तेज करने का भरोसा दिलाया है। संकट की घड़ी में यही भरोसा प्रभावित परिवारों के लिए सबसे बड़ा सहारा बन सकता है।
इस आपदा ने एक और गंभीर सवाल खड़ा किया है कि क्या समय रहते चेतावनी मिल सकती थी। नेपाल और चीन के बीच मौसम संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था होने की बात कही जाती है। इसके बावजूद इस घटना को लेकर पहले से पर्याप्त जानकारी नहीं मिल पाने के आरोप सामने आए हैं। नेपाली पत्रकारों और विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि यदि समय रहते प्रभावी चेतावनी मिल जाती तो शायद जान-माल का नुकसान कम किया जा सकता था। हालांकि इस मामले में अभी अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। आपदा की वास्तविक वजह, चेतावनी प्रणाली की भूमिका और सूचनाओं के आदान-प्रदान की स्थिति की पूरी जांच जरूरी है।
ग्लेशियर टूटने की घटना ने हिमालय की संवेदनशीलता को भी सामने ला दिया है। ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ और ग्लेशियरों का विशाल भंडार मौजूद है। तापमान में बदलाव, बर्फ के अस्थिर होने और भारी मलबे के अचानक नीचे आने जैसी घटनाएं नदियों के प्रवाह को कुछ ही समय में बदल सकती हैं। ग्लेशियर से टूटकर आया बर्फ, पत्थर और मलबा नदी में अस्थायी बांध बना सकता है। इसके पीछे पानी जमा होता जाता है और दबाव बढ़ने पर यह प्राकृतिक बांध अचानक टूट सकता है। इसके बाद पानी और मलबे की तेज धारा नीचे की ओर तबाही मचा सकती है।
यही कारण है कि हिमालय में होने वाली किसी भी बड़ी प्राकृतिक घटना को केवल एक देश की समस्या मानकर नहीं देखा जा सकता। हिमालय की पर्वत श्रृंखला सीमाओं से बंधी हुई नहीं है। एक ओर नेपाल है तो दूसरी ओर तिब्बत। ऊंचाई वाले इलाकों से निकलने वाली नदियां सीमाएं पार करती हैं और नीचे बसे लाखों लोगों के जीवन से जुड़ जाती हैं। पोइकू नदी तिब्बत से निकलकर नेपाल में प्रवेश करती है और वहां भोटेकोशी के नाम से जानी जाती है। इसकी सहायक नदियों में अचानक आई बाढ़ का असर नेपाल के बड़े इलाके में दिखाई देता है। यही भौगोलिक वास्तविकता भारत, नेपाल और चीन तीनों देशों के बीच आपदा संबंधी सूचनाओं और चेतावनी प्रणालियों के बेहतर तालमेल की जरूरत बताती है।
इस घटना को लेकर ग्लेशियर टूटने और भूकंप के क्रम पर भी अलग-अलग दावे सामने आए हैं। चीन की ओर से पहले भूकंप आने और उसके बाद ग्लेशियर टूटने की बात कही गई है, जबकि नेपाल सहित कुछ वैज्ञानिकों के आकलन में ग्लेशियर टूटने की घटना के कारण भूकंप जैसा झटका महसूस होने की संभावना बताई जा रही है। जब तक वैज्ञानिक जांच पूरी नहीं होती, तब तक किसी एक दावे को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा। आपदा के कारणों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी वैज्ञानिक तथ्यों को सामने लाना है।
नेपाल की इस त्रासदी में प्रकृति का रौद्र रूप दिखाई दे रहा है। इंसान ने पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाई हैं, नदियों के किनारे बस्तियां बसाई हैं और विकास की गति को तेज किया है। विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति की सीमाओं की अनदेखी भारी पड़ सकती है। हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में निर्माण और विकास की हर योजना को पर्यावरणीय जोखिमों के साथ जोड़कर देखना होगा। केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। भविष्य की आपदाओं से नुकसान कम करने के लिए पहले से तैयारी, आधुनिक निगरानी और तत्काल चेतावनी की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। कुदरत किसी के पक्ष या विपक्ष में नहीं होती। उसका प्रहार सीमा, जाति, भाषा और राष्ट्रीयता नहीं देखता।
कुछ ही पलों में बना-बनाया संसार उजड़ सकता है। नेपाल की त्रासदी हमें यही चेतावनी देती है कि मनुष्य चाहे जितनी प्रगति कर ले, प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना सुरक्षित भविष्य की कल्पना अधूरी है। आज नेपाल अपने घावों को समेट रहा है और भारत अपने नागरिकों की कुशलता की चिंता कर रहा है। इस कठिन समय में सबसे जरूरी है कि राहत और बचाव अभियान पूरी ताकत से जारी रहें, लापता लोगों की तलाश तेज हो और प्रभावित परिवारों तक हर संभव मदद पहुंचे।
नेपाल की धरती पर आई यह आपदा केवल एक देश का दुख नहीं है। यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है। प्रकृति के संकेतों को समझना होगा, सीमाओं के पार सहयोग बढ़ाना होगा और ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें खतरा आने से पहले लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सके। क्योंकि आपदा को रोकना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन उसके कारण होने वाली जनहानि को कम करना इंसान के हाथ में जरूर है।
नोट– यह लेख लेखक की व्यक्तिगत राय है जो कभी भी गलत हो सकती है। यह लेख केवल शिक्षा उद्देश्य के लिए हैं। कृपया निवेश करने से पहले अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह लेना ना भूले । पैसा आपका स्वयं का है अतः सोच कर समझ कर ही निवेश करें।

– कांतिलाल मांडोत, वरिष्ठ पत्रकार, सूरत



