ओडिशा: कला, शिल्प और संस्कृति का महासंगम
रघुराजपुर के पट्टचित्र से लेकर पिपिली के अप्पलिक तक, पीआईबी के पत्रकार दल ने करीब से जानी ओडिशा की समृद्ध विरासत
विशेष रिपोर्ट: दीपक मेहता
भुवनेश्वर। ओडिशा को अक्सर उसके भव्य मंदिरों और शांत समुद्र तटों के लिए जाना जाता है, लेकिन इसकी असली आत्मा यहाँ की जीवंत कला और पारंपरिक शिल्प में बसती है। यहाँ इतिहास, अध्यात्म और रचनात्मकता के धागे आपस में इतनी गहराई से गुंथे हुए हैं कि हर कलाकृति एक नई कहानी कहती है। राज्य के कला और पर्यटन परिदृश्य को करीब से समझने के लिए पीआईबी (प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो) द्वारा आयोजित यात्रा के दौरान पत्रकार दल ने इन सांस्कृतिक स्थलों का गहन अध्ययन किया, जो ओडिशा की सृजनात्मक आत्मा को समझने का बेहतरीन माध्यम साबित हुआ।
रघुराजपुर: जहाँ हर घर एक कला स्टूडियो है

पुरी के निकट स्थित ‘रघुराजपुर’ केवल एक गाँव नहीं, बल्कि यूनेस्को से मान्यता प्राप्त एक विरासत शिल्प ग्राम है। यह भारत का पहला ऐसा अनूठा गाँव है, जहाँ लगभग हर घर एक कला स्टूडियो या कार्यशाला में तब्दील हो चुका है। यहाँ की गलियों में घूमना किसी जीवित कला संग्रहालय में चलने जैसा अनुभव है।
पत्तचित्र कला और जगन्नाथ रथ यात्रा से इसका नाता
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यह शिल्प ग्राम प्राचीन ‘पत्तचित्र’ कला के लिए विश्व भर में विख्यात है। कपड़े और ताड़ के पत्तों पर उकेरी जाने वाली ये पारंपरिक पौराणिक पेंटिंग्स अद्भुत कौशल का प्रमाण हैं। इसका आध्यात्मिक महत्व इस बात से भी है कि इन्हीं विशेष ‘पट्टा’ चित्रों का उपयोग पुरी की प्रसिद्ध रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के सिंहासन और रथों की भव्य सजावट के लिए किया जाता है।
ऐसी ही कला को हमने करीब से जाना, इस गांव में स्थित शुभम आर्ट एंड क्राफ्ट के कलाकार दिलीप कुमार प्रुस्टी- शिबम प्रुस्टी और माँ दक्षिणकाली आर्ट एंड क्राफ्ट्स कल्चर के बिजय कुमार बारिकी-अक्षय कुमार बारिकी से। इनकी मेहनत और कला अनमोल है। पीढ़ियों से यह इस कला को संजोए है।

गोटीपुआ नृत्य और अन्य शिल्प कलाएं
पत्तचित्र के अलावा, रघुराजपुर के कलाकार तालपत्र नक्काशी के मुखौटे, और पत्थर व लकड़ी की बेहद जीवंत मूर्तियां भी गढ़ते हैं। यह गाँव केवल हस्तशिल्प तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रसिद्ध ‘ओडिसी’ नृत्य के अग्रगामी और पारंपरिक ‘गोटीपुआ’ नृत्य का मूल जन्मस्थान होने का गौरव भी रखता है।

पिपिली का अप्पलिक कार्य: रंगों का जादुई संसार
पुरी और भुवनेश्वर के बीच स्थित पिपिली शहर अपने चमकीले और रंग-बिरंगे पैचवर्क यानी ‘अप्पलिक कला’ के लिए पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान रखता है। इस कला के तहत कपड़ों के छोटे-छोटे टुकड़ों को ज्यामितीय और पारंपरिक आकृतियों में बेहद सलीके से काटकर छाते, दीवार की सजावट के सामान, झूमर, बेड कवर और हैंडबैग जैसी वस्तुओं पर सिला जाता है। इन उत्पादों में लाल, पीले, हरे और नीले रंगों का पारंपरिक व आकर्षक उपयोग देखते ही बनता है।
सांस्कृतिक ताने-बाने का अनूठा संगम
कुल मिलाकर, रघुराजपुर की हस्तकला, पिपिली का अप्पलिक काम, पुरी का अध्यात्म और कोर्णाक का बेजोड़ स्थापत्य ये सभी तत्व मिलकर ओडिशा के उस सांस्कृतिक ताने-बाने को पूरा करते हैं, जो पर्यटकों को पूरी तरह से मंत्रमुग्ध कर देता है।



