त्यौहारों से पहले चीनी की कड़वाहट, सरकार ने कसी लगाम

त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले चीनी की बढ़ती कीमतों ने आम परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। मांग बढ़ने, गन्ने की उपलब्धता, एथेनॉल उत्पादन और सीमित स्टॉक के बीच बाजार में कीमतें ऊपर गई हैं। जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने बड़े खरीदारों की स्टॉक सीमा घटा दी है, जबकि जरूरत पड़ने पर आयात का विकल्प भी खुला रखा गया है।

  • चीनी की कीमतें बढ़ने से मिठाई और घरेलू रसोई का बजट प्रभावित।
  • स्टॉक सीमा 30 दिन से घटाकर 15 दिन करने की तैयारी, जमाखोरी पर नजर।
  • एथेनॉल उत्पादन और घरेलू उपलब्धता के बीच संतुलन सरकार के लिए बड़ी चुनौती।

Sugar Prices Sour Festive Season : रक्षाबंधन और जन्माष्टमी का त्यौहार आने वाला है। इसके बाद गणपति स्थापना के साथ देशभर में त्यौहारों का सिलसिला तेज हो जाएगा। त्यौहारों का मतलब है मिठाइयां, पकवान और घर-घर में बनने वाले पारंपरिक व्यंजन। लेकिन इस बार त्यौहारों की मिठास पर चीनी की बढ़ती कीमतों की कड़वाहट भारी पड़ती दिखाई दे रही है। पिछले कुछ महीनों में चीनी के दाम जिस तेजी से बढ़े हैं, उससे आम परिवारों का रसोई बजट प्रभावित हुआ है।

बाजार में चीनी के औसत भाव करीब 48 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 70 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए हैं, जबकि कुछ जगह अधिकतम खुदरा कीमत 68 से 80 रुपए प्रति किलो तक बताई जा रही है। यानी एक महीने में ही खुदरा बाजार में कीमतों में 20 रुपए से ज्यादा की तेजी देखने को मिली है। चीनी की यह महंगाई ऐसे समय आई है जब त्यौहारों का सबसे बड़ा दौर शुरू होने वाला है। रक्षाबंधन पर मिठाइयों की मांग बढ़ती है, जन्माष्टमी पर दूध, माखन और मिठाई से जुड़े उत्पादों की खपत बढ़ती है और इसके बाद गणपति उत्सव के दौरान बाजार में मिठाई, पेय पदार्थ और खाद्य सामग्री की बिक्री तेज हो जाती है।

आगे भी बहुत सारे त्यौहार स्थापना, नवरात्रा, दशहरा, दीवाली है। ऐसे में चीनी की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ने वाली है। यही वजह है कि सरकार ने भी समय रहते बाजार पर नजर रखने और जमाखोरी की आशंका को रोकने के लिए कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने उन डीलरों के लिए चीनी की स्टॉक सीमा तय कर दी है जो हर महीने 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी का इस्तेमाल करते हैं। नए नियम के अनुसार ऐसे डीलर अब 15 दिनों से ज्यादा का स्टॉक अपने पास नहीं रख सकेंगे। पहले यह सीमा 30 दिनों की थी। यह व्यवस्था 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेगी।

सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि त्यौहारों से पहले बड़े खरीदार भारी मात्रा में चीनी खरीदकर उसका भंडारण न कर लें और कृत्रिम रूप से बाजार में कमी पैदा न हो। चीनी के दाम बढ़ने के पीछे केवल त्यौहारों की मांग ही जिम्मेदार नहीं है। देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक में उत्पादन में गिरावट ने भी बाजार को प्रभावित किया है। इसके अलावा पिछले वर्ष बड़ी मात्रा में चीनी बनाने योग्य गन्ने और उसके उत्पादों का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में हुआ। अनुमान के मुताबिक करीब 25 लाख टन चीनी बनाने लायक गन्ना और शीरा एथेनॉल के लिए इस्तेमाल किया गया। इससे चीनी मिलों के पास उपलब्ध स्टॉक पर दबाव बढ़ा। चीनी उत्पादन और उपलब्धता का अनुमान बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले वर्ष उत्पादन के अनुमानों के आधार पर निर्यात की अनुमति देने का फैसला भी मौजूदा स्थिति की एक वजह बना। जब घरेलू बाजार में भविष्य की जरूरत को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं थी, तब चीनी के निर्यात से घरेलू स्टॉक में कमी आई। बाद में निर्यात पर अंकुश लगाया गया, लेकिन तब तक करीब 8 लाख टन चीनी देश से बाहर जा चुकी थी। यही कारण है कि अब घरेलू बाजार में उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है। चीनी के सबसे बड़े उत्पादक महाराष्ट्र में थोक कीमतों में पिछले छह महीनों के दौरान करीब 52 प्रतिशत की वृद्धि बताई जा रही है।

थोक बाजार में कीमतें लगातार ऊपर जाने का सीधा असर खुदरा बाजार पर पड़ा है। तीन महीने के दौरान चीनी के दाम करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। इस दौरान केवल चीनी ही महंगी नहीं हुई, बल्कि गुड़, चावल और मक्के के आटे की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है। गुड़ के भाव करीब 24 प्रतिशत, चावल के 16 प्रतिशत और मक्के के आटे के दाम लगभग 11 प्रतिशत तक बढ़े हैं। यानी महंगाई का असर केवल चाय में डाली जाने वाली चीनी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी खाद्य श्रृंखला पर दिखाई देने लगा है। इसका एक बड़ा कारण एथेनॉल उत्पादन में कृषि उत्पादों का बढ़ता इस्तेमाल भी माना जा रहा है। एथेनॉल के लिए मक्का, चावल के टूटे दाने, खराब अनाज और गन्ने से जुड़े उत्पादों की मांग बढ़ी है।

पिछले एक वर्ष में देश में करीब 720 करोड़ लीटर एथेनॉल उत्पादन हुआ और इसके लिए लगभग 1.33 करोड़ टन अनाज का इस्तेमाल किया गया। जब कृषि उपज का एक बड़ा हिस्सा खाद्य और पशु आहार बाजार के बजाय औद्योगिक उपयोग में जाने लगता है, तो उपलब्धता पर असर पड़ना स्वाभाविक है। खराब अनाज की उपलब्धता घटने से पशु आहार और पोल्ट्री फीड भी महंगे हुए हैं। इसका असर आगे चलकर दूध और अंडों की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।

हालांकि चीनी उद्योग से जुड़े कुछ विशेषज्ञ मौजूदा तेजी को वास्तविक कमी के बजाय सट्टेबाजी और घबराहट में की जा रही खरीदारी का परिणाम मानते हैं। उनका कहना है कि देश में चीनी की कुल उपलब्धता इतनी कमजोर नहीं है कि गंभीर संकट पैदा हो जाए। उनका अनुमान है कि मौजूदा पेराई सीजन खत्म होने तक भी पर्याप्त क्लोजिंग स्टॉक बचा रहेगा। दूसरी ओर व्यापारियों का कहना है कि सरकार को एथेनॉल नीति और चीनी की घरेलू जरूरत के बीच संतुलन बनाना होगा। यदि बड़ी मात्रा में गन्ने का उपयोग एथेनॉल में होता रहा और चीनी उत्पादन तथा स्टॉक का सही आकलन नहीं हुआ तो भविष्य में कीमतों पर दबाव दोबारा बढ़ सकता है। मिलों के शुरुआती स्टॉक में आई कमी भी मौजूदा परिस्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

पिछले पेराई सीजन से पहले मिलों के पास करीब 47 लाख टन का ओपनिंग स्टॉक था, जबकि इस बार यह घटकर लगभग 32 लाख टन रह गया है। हालांकि 2026-27 में गन्ने का कुल उत्पादन करीब 46.3 करोड़ टन और चीनी उत्पादन लगभग 3.36 करोड़ टन रहने का अनुमान है, लेकिन नए उत्पादन का बाजार में पर्याप्त मात्रा में पहुंचने में अभी समय है। यही अंतर मौजूदा मांग और उपलब्धता के बीच दबाव पैदा कर रहा है। स्थिति बिगड़ने पर सरकार चीनी आयात की संभावना पर भी विचार कर रही है। करीब नौ साल बाद देश को चीनी आयात करने की जरूरत पड़ने की चर्चा ने बाजार और उद्योग दोनों का ध्यान खींचा है।

हालांकि वैश्विक बाजार से पर्याप्त मात्रा में चीनी हासिल करना आसान नहीं माना जा रहा। कच्ची चीनी यानी रॉ शुगर के आयात की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं। दुनिया में रॉ शुगर के बड़े निर्यातक देशों की सीमित संख्या को देखते हुए समय पर आयात करना सरकार के लिए चुनौती हो सकता है। दिलचस्प बात यह है कि कुछ वर्ष पहले भारत दुनिया के प्रमुख चीनी निर्यातकों में शामिल था।

2022-23 में चीनी, शीरा और उनसे बने उत्पादों का निर्यात करीब 1.33 करोड़ टन तक पहुंच गया था। इसके बाद निर्यात लगातार घटता गया। 2023-24 में यह करीब 51.35 लाख टन और 2024-25 में करीब 38.43 लाख टन रह गया। अब घरेलू उपलब्धता और कीमतों के दबाव के बीच आयात की चर्चा होना चीनी बाजार में आए बड़े बदलाव को दिखाता है। सरकार की ओर से स्टॉक सीमा घटाने का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि त्यौहारों के दौरान मांग बढ़ने के साथ जमाखोरी की आशंका भी बढ़ जाती है। यदि व्यापारी पहले से बड़ी मात्रा में चीनी खरीदकर बाजार में आपूर्ति कम कर दें तो कीमतें और तेजी से बढ़ सकती हैं। ऐसे में सरकार का नियंत्रण बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने वालों पर अंकुश लगाने की कोशिश है। आने वाले दिनों में यह भी देखना होगा कि स्टॉक सीमा और निगरानी से खुदरा कीमतों पर कितना असर पड़ता है।

त्यौहारों के इस मौसम में सबसे बड़ी चिंता यही है कि मिठाई की बढ़ती मांग के साथ चीनी की कीमतें आम उपभोक्ता की जेब पर कितना अतिरिक्त बोझ डालेंगी। रक्षाबंधन पर बहन के लिए मिठाई खरीदने से लेकर जन्माष्टमी के प्रसाद और गणपति उत्सव की मिठाइयों तक, चीनी लगभग हर त्योहार की रसोई का अनिवार्य हिस्सा है। इसलिए इसकी कीमत में उछाल का असर केवल एक वस्तु तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मिठाई, पेय पदार्थ, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पादों की लागत भी बढ़ाता है।

सरकार ने फिलहाल कमर कस ली है और स्टॉक सीमा घटाकर बाजार में अनावश्यक भंडारण रोकने की कोशिश शुरू कर दी है। लेकिन लंबे समय का समाधान केवल स्टॉक सीमा या आयात से नहीं निकलेगा। चीनी, एथेनॉल और गन्ने की नीति के बीच ऐसा संतुलन बनाना होगा जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिले, एथेनॉल की जरूरत भी पूरी हो और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए चीनी पर्याप्त और उचित कीमत पर उपलब्ध रहे। त्योहारों में मिठास तभी कायम रह सकती है जब उत्पादन, भंडारण, निर्यात और औद्योगिक उपयोग के बीच सही तालमेल हो। फिलहाल सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि त्योहारों की बढ़ती मांग के बीच चीनी की कीमतों की कड़वाहट आम परिवारों की खुशियों पर भारी न पड़े।

नोट– यह लेख लेखक की व्यक्तिगत राय है जो कभी भी गलत हो सकती है। यह लेख केवल शिक्षा उद्देश्य के लिए हैं। कृपया निवेश करने से पहले अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह लेना ना भूले । पैसा आपका स्वयं का है अतः सोच कर समझ कर ही निवेश करें।

त्यौहारों से पहले चीनी की कड़वाहट, सरकार ने कसी लगाम
Image Source : Via dainik jaltedeep

– कांतिलाल मांडोत, वरिष्ठ पत्रकार, सूरत

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