कलिंग वास्तुकला की अनमोल धरोहर: भुवनेश्वर के मुक्तेश्वर-सिद्धेश्वर मंदिर
भुवनेश्वर के मुक्तेश्वर और सिद्धेश्वर मंदिर कलिंग वास्तुकला की खूबसूरती और शिल्पकला के महत्वपूर्ण उदाहरण माने जाते हैं। भगवान शिव को समर्पित मुक्तेश्वर मंदिर का आकर्षक तोरण, बारीक नक्काशी और स्थापत्य शैली इसे खास पहचान देते हैं। परिसर में स्थित सिद्धेश्वर मंदिर भी अपनी प्राचीन संरचना और शिल्पांकन के कारण इतिहास और वास्तुकला में रुचि रखने वालों का ध्यान खींचता है।
- मुक्तेश्वर मंदिर: कलिंग वास्तुकला के खूबसूरत तोरण और पत्थर की नक्काशी के लिए प्रसिद्ध।
- सिद्धेश्वर मंदिर: प्राचीन स्थापत्य और बाहरी शिल्पांकन से जुड़ा महत्वपूर्ण मंदिर।
- 10वीं शताब्दी: दोनों मंदिर ओडिशा की प्राचीन मंदिर वास्तुकला की समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं।
दीपक मेहता
भुवनेश्वर। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर को मंदिरों का शहर कहा जाता है और यहां मौजूद प्राचीन मंदिर इसकी ऐतिहासिक पहचान को मजबूत करते हैं। इन्हीं में मुक्तेश्वर और सिद्धेश्वर मंदिर भी शामिल हैं, जो 10वीं शताब्दी की कलिंग स्थापत्य परंपरा और पत्थर पर की गई बारीक कारीगरी की झलक दिखाते हैं।
मुक्तेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। ‘मुक्तेश्वर’ नाम का अर्थ ही मुक्ति प्रदान करने वाले देवता से जुड़ा माना जाता है। मंदिर की सबसे अलग पहचान इसका सुंदर मेहराबदार प्रवेश द्वार यानी तोरण है। पत्थर पर की गई महीन नक्काशी और स्थापत्य का संतुलन इसे भुवनेश्वर के प्रमुख ऐतिहासिक मंदिरों में स्थान देता है।
इतिहास और स्थापत्य से जुड़े विवरणों के अनुसार मुक्तेश्वर मंदिर का निर्माण लगभग 950 से 975 ईस्वी के बीच माना जाता है। बलुआ पत्थर पर की गई इसकी सजावटी नक्काशी मंदिर की कलात्मक परंपरा को सामने लाती है। यही कारण है कि इसे कलिंग वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
सिद्धेश्वर मंदिर भी कम खास नहीं

मुक्तेश्वर मंदिर के पास ही स्थित सिद्धेश्वर मंदिर इसी ऐतिहासिक परिसर की स्थापत्य विरासत को आगे बढ़ाता है। इसकी संरचना मुक्तेश्वर मंदिर की तुलना में कुछ ऊंची दिखाई देती है। बाहरी दीवारों पर अपेक्षाकृत सरल शिल्पांकन है, लेकिन यही सादगी इसके स्थापत्य स्वरूप को अलग पहचान देती है।
मंदिर परिसर में दिखाई देने वाली मूर्तिकला उस दौर के कलाकारों की कल्पनाशीलता का परिचय देती है। द्वार नायिकाओं, नाग-नागिन, भाररक्षकों, गंगा-यमुना और नटराज जैसी आकृतियों के साथ कई सजावटी दृश्य मंदिर की बाहरी दीवारों को जीवंत बनाते हैं।
पत्थरों पर दिखती है रोजमर्रा की जिंदगी

इन मंदिरों की नक्काशी की खासियत केवल धार्मिक आकृतियों तक सीमित नहीं है। कुछ शिल्पों में बंदरों से जुड़े मनोरंजक दृश्य भी दिखाई देते हैं। ऐसे दृश्य यह संकेत देते हैं कि तत्कालीन मंदिर कला में धार्मिक विषयों के साथ जीवन के सहज और मनोरंजक प्रसंगों को भी जगह दी जाती थी।
देउल के शिखर पर बने बड़े चैत्य गवाक्ष के दोनों ओर मानव जैसी छोटी आकृतियां दिखाई देती हैं। मंदिर के स्थापत्य में इस तरह के सजावटी तत्व ऊंचाई और दृश्य प्रभाव को बढ़ाते हैं।
कमल की नक्काशी और देवी-देवताओं का अंकन

जगमोहन की भीतरी छत पर उकेरा गया विकसित कमल विशेष आकर्षण का केंद्र है। इसके आसपास वीरभद्र और सप्तमातृकाओं से जुड़ी मूर्तियां बनाई गई हैं। सप्तमातृकाओं को कई स्थानों पर शिशुओं के साथ दर्शाया गया है, जिससे शिल्पकारों ने धार्मिक भाव के साथ मानवीय संवेदना को भी मूर्त रूप दिया।
स्थापत्य की दृष्टि से यहां रेखा देउल और जगमोहन की पीढ़ा देउल शैली के तत्व दिखाई देते हैं। पंचायतन परंपरा से जुड़े स्थापत्य संकेत भी इस परिसर की प्राचीन मंदिर निर्माण परंपरा को समझने में मदद करते हैं।
कलिंग वास्तुकला की जीवंत मिसाल
मुक्तेश्वर-सिद्धेश्वर परिसर को देखने पर सबसे अधिक ध्यान इसकी नक्काशी और स्थापत्य के संतुलन पर जाता है। कहीं देवी-देवताओं की आकृतियां हैं तो कहीं सजावटी बेल-बूटे और मानवीय दृश्य। पत्थर पर इतनी बारीकी से उकेरी गई आकृतियां उस दौर के शिल्पकारों की दक्षता की कहानी कहती हैं।
मुक्तेश्वर मंदिर को अक्सर ‘कलिंग वास्तुकला का रत्न’ कहा जाता है। वहीं सिद्धेश्वर मंदिर इसके साथ मिलकर भुवनेश्वर की उस स्थापत्य परंपरा की तस्वीर पूरी करता है, जिसमें मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं बल्कि कला, संस्कृति और शिल्प का भी केंद्र रहे हैं।
आज भी इन मंदिरों के पत्थरों पर मौजूद आकृतियां सदियों पुरानी कहानी को अपने भीतर समेटे हुए हैं। यही वजह है कि यहां आने वाला व्यक्ति केवल एक धार्मिक स्थल नहीं देखता, बल्कि ओडिशा की प्राचीन कला और वास्तुकला की एक जीवित झलक भी महसूस कर सकता है।

पीआईबी राजस्थान का पत्रकार दल



