2040 तक भारत को ‘वेस्ट-फ्री’ बनाने का विजन: कचरे से हाई-वैल्यू मटेरियल और स्टार्टअप्स गढ़ेंगे देश की नई तकदीर : डॉ. रामानुज नारायण
CSIR-IMMT के निदेशक डॉ. रामानुज नारायण ने कहा कि भारत के लो-ग्रेड मिनरल्स, सोलर पैनल और इलेक्ट्रॉनिक कचरे में बड़ी आर्थिक संभावनाएं छिपी हैं। संस्थान सोलर स्क्रैप से क्रिटिकल मिनरल्स निकालने की तकनीक पर काम कर रहा है। उनका मानना है कि वैज्ञानिकों, उद्योग और युवाओं की साझेदारी से 2040 तक कचरे को संसाधन में बदलने वाला मजबूत इकोसिस्टम तैयार किया जा सकता है।
- सोलर स्क्रैपिंग और क्रिटिकल मिनरल्स पर सीएसआईआर-आईएमएमटी की बड़ी तैयारी
- लो-ग्रेड मिनरल्स से आत्मनिर्भरता की राह: सर्कुलर इकॉनमी और सस्टेनेबल माइनिंग से बदल रही है देश की तस्वीर
- राजस्थान के सोलर ग्रिड्स के लिए वरदान साबित होगी नई रीसायकलिंग तकनीक
- सीएसआईआर-आईएमएमटी के निदेशक डॉ. रामानुज नारायण से खास बातचीत
(दीपक मेहता)
भुवनेश्वर। सीएसआईआर-आईएमएमटी (CSIR-IMMT) देश का एक प्रमुख अनुसंधान संस्थान है जो खनिज सुरक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स के दोहन और पर्यावरण के अनुकूल सस्टेनेबल माइनिंग तकनीकों को विकसित करने में अहम भूमिका निभा रहा है यह संस्थान पारंपरिक रूप से केवल औद्योगिक कचरे के बल्क उपयोग (जैसे ईंट या टाइल्स बनाने) तक सीमित न रहकर, अब कचरे से हाई-वैल्यू मटेरियल और क्रिटिकल मिनरल्स निकालने की दिशा में अत्याधुनिक तकनीक तैयार कर रहा है विशेष रूप से राजस्थान जैसे राज्यों के आगामी बड़े सोलर ग्रिड्स को ध्यान में रखते हुए, यह संस्थान अगले कुछ वर्षों में सोलर स्क्रैप रीसायकलिंग और इलेक्ट्रॉनिक कचरे के प्रबंधन के लिए पायलट प्लांट और उन्नत हाइड्रोमेटलर्जी तकनीक लाने की तैयारी में है。 इसके साथ ही, यह संस्थान सर्कुलर इकॉनमी और वेस्ट-टू-रिसोर्स के विजन को आगे बढ़ाते हुए भारत को आत्मनिर्भर बनाने और युवाओं के लिए स्टार्टअप के नए अवसर सृजित करने में निरंतर योगदान दे रहा है।
संस्थान के निदेशक डॉ. रामानुज नारायण के साथ दैनिक जलतेदीप के संपादक दीपक मेहता की विशेष बातचीत के अंश

प्रश्न: अभी जैसे सोलर स्क्रैप है, अब स्क्रैपिंग बहुत बड़ी चुनौती है देश के सामने। चाहे कंप्यूटर स्क्रैप हो, चाहे सोलर स्क्रैप हो। सोलर स्क्रैप के लिए भी आपने एक स्कीम चला रखी है, वो जल्दी उम्मीद है कि उसकी वो मार्केट में टेक्नोलॉजी के आने की, तो वो कब तक आने का है सर? और उसके बारे में थोड़ा सा बताएं।
उत्तर: CSIR ने एक बहुत ही बड़ा मिशन प्रोग्राम जिसमें हमारे साथ अनदर छह लैबोरेटरीज सम्मिलित हैं। हम लोगों ने हमारे अध्यक्ष और प्रधानमंत्री जी के निर्देश पर एक मिशन प्रोग्राम शुरू किया, उसका नाम है ‘सीज’ (SEIG) – सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक एंड इलेक्ट्रिकल वेस्ट एंड एयर कंडीशनर टू क्रिटिकल एलिमेंट्स एंड सस्टेनेबल मटेरियल।
अभी हम लोगों ने जस्ट इसी साल के शुरू में 150 केजी पर आवर का पायलट प्लांट बनाया है, जिसमें प्रिंटेड सर्किट बोर्ड को हम लोग पॉलीमर में सेपरेट करते हैं और मेटल में सेपरेट करते हैं, जिससे क्रिटिकल मिनरल निकालेंगे। जैसा कि आपका प्रश्न है, सोलर पैनल का प्लांट हम बहुत जल्द लगाने वाले हैं, अगले वर्ष तक इसके पूरे होने की संभावना है। सोलर पैनल राजस्थान के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि राजस्थान और गुजरात के पास हमारे बहुत बड़े सोलर ग्रिड आने वाले हैं।
तो उस जगह पर जो भी सोलर पैनल में चाहे वो ग्लास हो, चाहे सिलिकॉन है, अभी भी आपने सुना होगा कि राजस्थान में सिलिकॉन मैन्युफैक्चरिंग सोलर के लिए भी आ रहा है। तो उस दिशा में जो रॉ मटेरियल के रिसोर्स की कमी है, उसको हम सोलर पैनल के रीसायकलिंग के द्वारा उसमें जो भी कंपोनेंट है, उसको निकालने का प्रयास कर रहे हैं और दो से तीन साल में उसमें जितनी टेक्नोलॉजिकल जितनी हाइड्रोमेटलर्जी चाहिए, वो सब से हम लोग क्रिटिकल मिनरल एक्सट्रैक्ट करेंगे।

प्रश्न: भारत को आत्मनिर्भर बनाने में आपके संस्थान की क्या भूमिका आपको लगती है ?
उत्तर: हमारे संस्थान, जो CSIR-IMMT है, इसको भारत के जो मिनरल सिक्योरिटी है, जो क्रिटिकल मिनरल है, उसके एक्सप्लोइटेशन के लिए ही बनाया गया है। हम शुरू से ही बहुत सारी टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर किए हमारे कस्टमर बेस में। मेन यहाँ का मिनरल और माइनिंग इंडस्ट्री है और हम लोगों ने प्रयास किया है।
आत्मनिर्भर जब अभी आज भारत की समस्या है कि जो भी हमारे पास रिसोर्स हैं, वो लो-ग्रेड के रिसोर्स हैं। तो लो-ग्रेड से निकालना, भारत का टेक्निक डेवलप करना क्योंकि कोई टेक्नोलॉजी बाहर से लाएंगे तो उसका तो डायरेक्ट इम्प्लीमेंट यहाँ पर नहीं हो सकता है।
लेकिन हम केवल प्रोसेस ही नहीं बनाते, प्रोसेस का इक्विपमेंट जो कि भारतीय मिनरल के लिए स्पेशल हो, तो इको-फ्रेंडली सस्टेनेबल माइनिंग और सर्कुलर इकॉनमी में यह संस्थान बहुत ही बड़ा इम्पोर्टेन्ट रोल विकसित भारत में करने वाला है।
सवाल : अभी तक जो हमारा इंडस्ट्रियल वेस्ट का फोकस था (जैसे ईंट या टाइल्स बनाना), क्या अब उससे आगे बढ़कर वेस्ट से कुछ ऐसा भी बनने वाला है जो आम जनता के लार्ज स्केल पर यूज़ आ सके? और 2040 तक वेस्ट-फ्री कंट्री बनने का क्या प्रोसेस है?
जवाब: बहुत ही अच्छा प्रश्न है। आज के जमाने में जब आप इंडस्ट्रियल वेस्ट देखते हैं, तो अभी तक हमारा फोकस ‘बल्क यूटिलाइजेशन’ पर था – जैसे ईंटें या टाइल्स बना लेना, जिसमें हम हाई वैल्यू नहीं देखते थे।
लेकिन अभी हम ऐसा प्रयास कर रहे हैं जिससे बल्क भी बने और हाई वैल्यू का मटेरियल भी निकले, जिसमें कोई भी वेस्ट बचे नहीं। इसमें लोगों का, पत्रकारों का और सबका बहुत महत्वपूर्ण योगदान है कि लोग आगे आएं और अपने वेस्ट को निकालें। इंडस्ट्री भी पूरी कोशिश कर रही है; जितनी भी बड़ी इंडस्ट्री हैं, वे सभी सर्कुलर इकॉनमी और सस्टेनेबल डेवलपमेंट की ओर बढ़ रही हैं।
यदि वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों, जनता और पत्रकारों का सम्मिलित प्रयास हो, तो भारत वेस्ट को रिसोर्स में बदलने की ताकत रखता है। हम उम्मीद करते हैं कि अगर हम सब एक साथ हैं, तो 2040 में हमारे सब वेस्ट रिसोर्स होंगे, तो वेस्ट जनरेशन का कोई सवाल ही नहीं उठता।
सवाल : एमपी के एक यूथ (बिट्टू तबाही) ने अज्नार नदी को एकदम क्लीन कर दिया है। ऐसे यूथ के लिए अगर आप कोई संदेश देना चाहें?
जवाब: हमारे जितने युवा साथी हैं, उनमें उद्यमी बनने की बहुत बड़ी योग्यता है। प्रधानमंत्री जी भी कहते हैं कि हमने कितने स्टार्टअप किए! तो जो इंडस्ट्रियल, मिनरल और वेस्ट है, इसमें स्टार्टअप की असीम संभावनाएं हैं। हम चाहते हैं कि हमारे युवा बच्चे इंजीनियरिंग पढ़ें अगर आईटी में जाना है तो कंप्यूटर और आईटी पढ़ें, लेकिन दूसरी इंजीनियरिंग पढ़ते हैं तो उद्यम में जरूर आएं। हमें उनके ऊपर विश्वास है कि जब वेस्ट को वे ठीक से समझेंगे, तो हमारी जिम्मेदारी बनती है कि उनको ठीक से समझाएं। वेस्ट के द्वारा बहुत बड़ा इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम और स्टार्टअप इकोसिस्टम क्रिएट किया जा सकता है।



