उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएं : पत्थरों में छिपा धर्म, कला और इतिहास का खजाना
भुवनेश्वर से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित उदयगिरि-खंडगिरि की गुफाएं ओडिशा के प्राचीन इतिहास और जैन परंपरा की महत्वपूर्ण विरासत हैं। चट्टानों को काटकर बनाई गई इन गुफाओं में खारवेला का ऐतिहासिक शिलालेख, रानी गुम्फा की नक्काशी और प्राचीन कलिंग कला की झलक आज भी पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करती है।
- उदयगिरि-खंडगिरि: आमने-सामने स्थित 33 प्राचीन गुफाओं का ऐतिहासिक परिसर।
- रानी गुम्फा: दो मंजिला गुफा अपनी बारीक नक्काशी और राजसी दृश्यों के लिए प्रसिद्ध।
- हाथीगुम्फा: खारवेला का प्राकृत शिलालेख इसे इतिहास के लिए खास बनाता है।
(दीपक मेहता)
भुवनेश्वर। ओडिशा की राजधानी से कुछ ही दूरी पर ऐसी पहाड़ियां हैं, जहां पहुंचते ही इतिहास किताबों से निकलकर सामने खड़ा नजर आता है। उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएं इसी विरासत की कहानी कहती हैं। प्राकृतिक चट्टानों को काटकर तैयार की गई इन गुफाओं में धर्म, कला और तत्कालीन जीवन की झलकियां आज भी उकरी नजर आती हैं।
यह ऐतिहासिक परिसर भुवनेश्वर से करीब 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। माना जाता है कि इन गुफाओं का निर्माण ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में कलिंग के शासक सम्राट खारवेला के समय हुआ था। इनका संबंध मुख्य रूप से जैन साधुओं के निवास, ध्यान और तपस्या से जोड़ा जाता है।
दो पहाड़ियां, 33 गुफाओं की विरासत

उदयगिरि और खंडगिरि एक-दूसरे के सामने स्थित दो पहाड़ियां हैं। दोनों के बीच करीब 200 मीटर का अंतर है। पूरे परिसर में कुल 33 गुफाएं बताई जाती हैं, जिनमें 18 उदयगिरि और 15 खंडगिरि में हैं।
उदयगिरि को ‘सूर्योदय की पहाड़ी’ के अर्थ में जाना जाता है। यहां की कई गुफाएं अपनी नक्काशी और अपेक्षाकृत बेहतर संरक्षण के कारण खास आकर्षण रखती हैं। खंडगिरि की पहाड़ी के शीर्ष पर 19वीं सदी का एक जैन मंदिर भी मौजूद है।
रानी गुम्फा में पत्थरों पर दिखती है कहानी

उदयगिरि की रानी गुम्फा इस परिसर की सबसे बड़ी और चर्चित गुफाओं में शामिल है। इसकी दो मंजिलों पर की गई नक्काशी आज भी लोगों का ध्यान खींचती है।
गुफा में पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, वाद्य यंत्र बजाती महिलाओं और राजसी दृश्यों को चट्टानों पर उकेरा गया है। इन आकृतियों को देखकर उस दौर की कला और जीवनशैली की कल्पना करना आसान हो जाता है।
हाथीगुम्फा में दर्ज है खारवेला की कहानी

उदयगिरि की हाथीगुम्फा ऐतिहासिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। इसकी चट्टान पर प्राकृत भाषा में सम्राट खारवेला का प्रसिद्ध शिलालेख अंकित है।
इस अभिलेख में उनके शासनकाल से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। यही वजह है कि हाथीगुम्फा केवल एक प्राचीन गुफा नहीं, बल्कि कलिंग के इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत भी मानी जाती है।
इसी शिलालेख में इन पहाड़ियों के लिए ‘कुमारी पर्वत’ या ‘कुमारागिरि’ नाम का उल्लेख मिलता है।
खंडगिरि की अनंत गुम्फा भी खास

खंडगिरि की गुफाओं में अनंत गुम्फा अपनी कलात्मक सजावट के लिए जानी जाती है। इसे गुफा संख्या 3 के रूप में भी जाना जाता है। यहां सांप, हाथी और कई सजावटी आकृतियों की नक्काशी देखने को मिलती है।
इन शिल्पों की बारीकी बताती है कि उस समय चट्टानों को तराशने की कला कितनी विकसित थी। धार्मिक उपयोग के लिए बनाए गए ये स्थल धीरे-धीरे प्राचीन कलिंग की कला और स्थापत्य के दस्तावेज भी बन गए।
कलिंग की कारीगरी का पत्थरों में प्रमाण

उदयगिरि-खंडगिरि की खासियत सिर्फ इसकी प्राचीनता नहीं है। यहां की वास्तुकला इस बात का प्रमाण है कि प्राकृतिक पहाड़ियों को किस तरह तराशकर उपयोगी और कलात्मक संरचनाओं में बदला गया।
गुफाओं की दीवारों और छतों पर पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, दिव्य आकृतियां और जैन परंपरा से जुड़े शिल्प दिखाई देते हैं। प्रवेश द्वार और स्तंभों की नक्काशी में प्राचीन कलिंग शैली की कारीगरी साफ नजर आती है।
आज इन गुफाओं में घूमते हुए पर्यटक सिर्फ पुराने पत्थर नहीं देखते। हर मोड़ पर कोई न कोई आकृति, शिलालेख या स्थापत्य का हिस्सा उस समय की कहानी सुनाता महसूस होता है। यही वजह है कि उदयगिरि-खंडगिरि आज भी ओडिशा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा हैं।




