सनी देओल के मुस्लिम किरदार पर संतोषी का जवाब

‘बंटवारा 1947’ में सनी देओल के मुस्लिम किरदार को लेकर उठी चर्चाओं के बीच निर्देशक राजकुमार संतोषी ने अपने फैसले का बचाव किया है। उनका कहना है कि फिल्म का मकसद किसी धर्म को निशाना बनाना नहीं, बल्कि विभाजन के दौर की पीड़ा, भाईचारे और आपसी सम्मान की कहानी को दर्शकों तक पहुंचाना है।

  • सनी देओल का मुस्लिम किरदार फिल्म में चर्चा का बड़ा विषय बना है।
  • राजकुमार संतोषी ने कास्टिंग का बचाव करते हुए सनी की मेहनत की तारीफ की।
  • बंटवारा 1947 में विभाजन की त्रासदी और भाईचारे का संदेश दिखाया गया है।

Sunny Deol’s Muslim Role Sparks Debate : राजकुमार संतोषी की फिल्म ‘बंटवारा 1947’ रिलीज के बाद से ही चर्चा में है। फिल्म में सनी देओल का भारतीय मुस्लिम किरदार निभाना दर्शकों के बीच खास आकर्षण और बहस की वजह बना है। आमतौर पर देशभक्ति और एक्शन फिल्मों में नजर आने वाले सनी को इस अलग अंदाज में देखना उनके प्रशंसकों के लिए भी नया अनुभव रहा।

संतोषी ने अब इस कास्टिंग को लेकर अपनी बात रखी है। निर्देशक के मुताबिक, फिल्म की कहानी का विचार करीब 15 साल पहले उनके मन में आया था। उस दौर में पाकिस्तान और मुस्लिम पृष्ठभूमि से जुड़ी कहानियों को पर्दे पर उतारना आसान नहीं माना जाता था। इसके बावजूद उन्होंने इस कहानी पर काम करने का फैसला किया।

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निर्देशक का मानना था कि सनी देओल में इस किरदार को प्रभावी ढंग से निभाने की क्षमता है। उन्होंने बताया कि अभिनेता ने भूमिका को गंभीरता से लिया और इसे वास्तविक बनाने के लिए काफी मेहनत की। किरदार की धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए सनी ने कुरान की आयतों का पाठ भी किया।

फिल्म की कहानी 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बीच आम लोगों की जिंदगी और उनके दर्द पर केंद्रित है। संतोषी के अनुसार, कहानी का उद्देश्य किसी समुदाय या धर्म के खिलाफ माहौल बनाना नहीं है। वह चाहते हैं कि दर्शक फिल्म के जरिए उस दौर में सामने आई इंसानी त्रासदी और आपसी रिश्तों को महसूस करें।

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फिल्म को लेकर दर्शकों की प्रतिक्रियाएं हालांकि एक जैसी नहीं रही हैं। कुछ लोगों ने इसके संदेश की सराहना की, जबकि बॉक्स ऑफिस पर शुरुआती प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक मजबूत नहीं दिखा। इसके बावजूद संतोषी को भरोसा है कि समय के साथ फिल्म का मूल संदेश ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा।

उनका कहना है कि ‘बंटवारा 1947’ के केंद्र में धर्म से ज्यादा इंसान और उसके रिश्ते हैं। फिल्म के जरिए वह भाईचारे, सह-अस्तित्व और एक-दूसरे के विश्वास का सम्मान करने की भावना को सामने लाना चाहते हैं।

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