छाछ को फूंक-फूंक के पीने मेें सब की भलाई

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हमने पहले भी आग्रह किया था, आज फिर कर रहे हैं। जनहित में एक बार और करना पड़े या बार-बार करना पड़े तो भी पीछे हटने वाले नहीं। हम दूध के जले हैं मगर छाछ फूंक-फूंक के नहीं पीते। उसका नतीजा भुगत भी रहे हैं। अब छाछ परोसी जाए या राब। गलवाणी गिलास में डालकर आगे की जाए या कोल्ड कॉफी। हमें फूंक-फूंक के पीनी होगी। कदम भी सावधानी से उठाने होंगे वरना अब की बार-फिर घरबंदी तैयार। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।

जिस भाई अथवा जिन भाईयों ने दूध और छाछ वाली कहावत घड़ी वो जरूर देहाती पृष्ठभूमि के रहे होंगे। हो सकता है वो किसी गांव-ढाणी में ही निवास करते होंगे। जरूरी नहीं कि लिखा पढी शहरिए ही करते हैं। यह भी जरूरी नहीं कि साहित्य सृजन टेबिल-कुरसी पे बैठकर लैंप की रोशनी में किया जाता है। साहित्य की किरण कही से भी फूट सकती है। गांव-ढाणियों से महके साहित्य की खुशबू ही निराली होवे है।

ना प्रदूषण। ना हाका दडबड़। ना कोलाहल। ना राग। ना खटराग। ना चिल्लम-पौ। एकदम शांत वातावरण। चारों ओर लहलहाते खेत। कुंए की मुंडेर पर पानी भरती पणिहारिने। इधर से मोर की पीहू.. पीहू.. उधर से कोयल की कुहू.. कुहू..। धूल उड़ाती गायों की टोली। गायों के गले में बंधी घंटी की अपनी धुन। ऐसे में ‘गौरी तेरा गांव बड़ा प्यारा.. मैं तो गया हारा, आ के यहां रे.. के सुर बिखर जाएं तो गलत नही है।

हमें कहावत के महावत पे ग्रामीण होने का विश्वास इसलिए हुआ कि उनने दूध के साथ छाछ का उपयोग किया। अगर वो शहरी होते तो छाछ की जगह आम रस। गन्ने का रस। कोल्ड कॉफी। मौसमी का जूस। कोकाकोला या अन्य किसी पेय का इस्तेमाल करते। कहते-हम दूध के जले हैं.. लिम्का को भी फूंक-फूंक के पीते हैं..।

क्यूंकि उनने छाछ का महिमा मंडन किया इससे यही लगा कि काका किसी गांव-ढाणी का रहवासी होगा। वो छाछ प्रेमी भी हो सकता है, तभी तो दुनियाभर के पेय पदार्थों की अनदेखी कर छाछ को चुना। वो चाहते तो शरबत या नींबू की शिंकजी अथवा लस्सी का उपयोग कर सकते थे। मगर उन्होंने सिर्फ-ओ-सिर्फ छाछ को चुना इसका मतलब वो जरूर छाछ समर्थक रहे होंगे। वो छाछ समर्थक रहे हों या राब प्रशंसक। पैगाम ये दिया कि हमें सावचेती से काम करने की जरूरत है। हमें हर कार्य में सतर्कता बरतनी चाहिए। हमें हर काम पूरी तन्मयता और तसल्ली से करना चाहिए। नजर हटी दुर्घटना घटी।

जल्दी का काम शैतान का। यदि एक बार कोई गलती हो जाए तो कोई बात नहीं। इंसान गलती का पुतला है। वो गलती वापस ना दोहराई जाए उसी के वास्ते दूध और छाछ का उदाहरण परोसा गया वरना येड़े भी जानते हैं कि छाछ को फूंक-फूंक के नही पीया जाता। कहावत में सजगता बरतने का संदेश है जिसे सभी को जीवन में उतारने की जरूरत है। हथाईबाज वैसे तो छाछ को फूंक-फूंक कर पीते रहे हैं। याने कि हर काम में सावचेती ‘भत्ती। मगर यहा संदेश दोहराने का खास मकसद इसलिए कि हम पहले लापरवाहियों की नुमाइश कर चुके हैं। हम बेपरवाहियों का प्रदर्शन कर चुके हैं।

हम पहले भी अधनंगे हो चुके हैं। कुछ लोगों की खता और सजा सभी ने भुगती। घरबंदी काटी। लॉकडाउन झेला। एक बार फिर तनिक राहत मिली है। इस राहत को राहतनाक बनाना है। राहत को बढाना है। तब तो हैं मजा, वरना सरकार ने अपना काम पहले भी किया। कर रही है और आइंदा भी करेगी। खास का कुछ नहीं जाणा है। वो अगर साल-दो साल-तीन साल घर में पड़े रहे तो भी भंडार खाली नहीं होणे हैं। तकलीफ हम-आप जैसे ‘आमÓ को होगी। भुगतेगा वो कलुआ जो सुबह से शाम तक खपता है। तड़पेगा-तरसेगा वो जो दिहाड़ी कमाता है।

हथाईबाजों का इशारा लॉकडाउन में दी गई और राहतों की ओर। हमने कोरोना की पहली लहर को ठंडा करने के बाद जो बेपरवाहियां की, उसका नतीजा आखे देश ने भुगता। कोरोना से राहत क्या मिली। हम गाइड और लाइन सब कुछ भूल गए। मास्क उतार दिए। देह दूरी मिटा दी। बाजारों में भीड़ ही भीड़। हम तो हम-नेते भी बावळे हो गए। उस बेपरवाही का नतीजा फिर घरबंदी और तालाबंदी के रूप में भुगतने को मिला। हम डेढ माह के लिए फिर घरों में कैद कर दिए गए। कोरोना ने सब कुछ पलट के रख दिया। हमारी बेपरवाहियों ने भी अलट-पलट में कोई कमी नही रखी।

गाड़ी कुछ पटरी पे आती दिखी तो सरकार ने थोड़ी राहत दी। फिर ठीकठाक लगा तो और राहत दी। हमने इन राहतों का दुरूपयोग किया तो फिर आहत होते-टेम नहीं लगेगा। बेहतर यही होगा कि हम खाल के बाहर ना निकलें। सरकारी गाइड लाइन का पालन करें ताकि बाजार की टाइमबंदी, रात्रिकालीन और वीकेंड कफ्र्यू से छुटकारा पाकर पहले जैसा जीवन जी सकें। इसके लिए संयम-धैर्य और अनुशासन जरूरी है। छाछ को फूंक- फूंक कर पीने में ही सब की भलाई है।

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