रेड मड और ई-कचरे से निकलेंगे दुर्लभ खनिज, भारत के मिनरल सेक्टर में बड़ी क्रांति

राजस्थान से ओडिशा पहुंचे पत्रकार दल ने भुवनेश्वर स्थित CSIR-IMMT का दौरा किया। यहां वैज्ञानिकों ने वेस्ट टू वैल्यू, महत्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ मृदा तत्वों की रिकवरी से जुड़ी तकनीकों की जानकारी दी। संस्थान फ्लाई ऐश, रेड मड, कोयला अवशेष, सोलर स्क्रैप और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से उपयोगी सामग्री निकालने पर शोध कर रहा है।

  • कचरे से निकलेगा क्रिटिकल मिनरल का खजाना – CSIR-IMMT में रेड मड, फ्लाई ऐश और ई-कचरे से दुर्लभ खनिज निकाले जा रहे हैं।
  • CSIR-IMMT की स्वदेशी तकनीक से सोलर पैनलों की रीसाइक्लिंग कर सिलिकॉन, ग्लास और सिल्वर की रिकवरी की जा रही है।
  • देश को नई दिशा देते हुए यह शोध राजस्थान और गुजरात जैसे बड़े सौर ऊर्जा वाले राज्यों के लिए बेहद फायदेमंद साबित होगा।

Rare minerals to be extracted from red mud and e-waste : भुवनेश्वर। राजस्थान से ओडिशा पहुंचे पत्रकार दल ने बुधवार को भुवनेश्वर स्थित वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद–खनिज एवं पदार्थ प्रौद्योगिकी संस्थान (CSIR-IMMT) का दौरा किया। इस दौरान दल ने संस्थान की विभिन्न अनुसंधान एवं प्रायोगिक सुविधाओं को देखा और वैज्ञानिकों से तकनीक के विकास से लेकर उसके औद्योगिक उपयोग तक की प्रक्रिया को समझा।

दौरे के दौरान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर रामानुज नारायण ने पत्रकारों को CSIR-IMMT में चल रहे अनुसंधान कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संस्थान खनन, खनिज और धातु उद्योगों से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के साथ खनिज संसाधनों के सतत उपयोग, मूल्य संवर्धन और उन्नत प्रसंस्करण तकनीकों पर काम कर रहा है।

रेड मड और ई-कचरे से निकलेंगे दुर्लभ खनिज, भारत के मिनरल सेक्टर में बड़ी क्रांति
Image Source : Via PIB

प्रोफेसर नारायण के अनुसार, मौजूदा समय में महत्वपूर्ण खनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में केवल पारंपरिक खनिज स्रोतों पर निर्भर रहने के बजाय द्वितीयक संसाधनों से भी उपयोगी तत्वों की रिकवरी पर जोर दिया जा रहा है। CSIR-IMMT में कोयला अवशेष, फ्लाई ऐश, रेड मड और अन्य औद्योगिक अपशिष्टों से दुर्लभ मृदा तत्वों (REEs) समेत कई महत्वपूर्ण खनिजों की रिकवरी पर अनुसंधान चल रहा है।

संस्थान में कोबाल्ट, निकेल, टाइटेनियम, वैनेडियम, लिथियम और मैंगनीज जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण तथा रिकवरी से जुड़ी तकनीकों पर भी काम किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का फोकस ऐसी तकनीक विकसित करने पर है, जिन्हें आगे चलकर बड़े स्तर पर औद्योगिक उपयोग में लाया जा सके।

फ्लाई ऐश से उपयोगी सामग्री निकालने पर काम

CSIR-IMMT में ‘वेस्ट टू वैल्यू’ की दिशा में किए जा रहे कार्यों का एक उदाहरण फ्लाई ऐश प्रसंस्करण से जुड़ा प्रायोगिक संयंत्र है। इसकी क्षमता प्रतिदिन करीब 50 किलोग्राम फ्लाई ऐश के प्रसंस्करण की बताई गई। संस्थान के अनुसार, संयुक्त रूप से विकसित और पेटेंट प्रक्रिया के जरिए फ्लाई ऐश से एलुमिना, कैल्शियम सिलिकेट, क्वार्ट्ज अवशेष तथा दुर्लभ मृदा तत्वों से समृद्ध आयरन हाइड्रॉक्साइड अवशेष जैसे उत्पादों की रिकवरी की दिशा में काम किया जा रहा है।

रेड मड और ई-कचरे से निकलेंगे दुर्लभ खनिज, भारत के मिनरल सेक्टर में बड़ी क्रांति
Image Source : Via PIB

इस तरह औद्योगिक अपशिष्ट को केवल कचरे के तौर पर देखने के बजाय उसमें मौजूद उपयोगी घटकों को अलग कर उनका दोबारा इस्तेमाल करने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। इससे अपशिष्ट प्रबंधन के साथ-साथ संसाधनों के बेहतर उपयोग और मूल्य संवर्धन का रास्ता भी खुल सकता है।

प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों पर समान फोकस

प्रोफेसर रामानुज नारायण ने बताया कि दुर्लभ मृदा तत्वों की रिकवरी के लिए संस्थान प्राथमिक और द्वितीयक दोनों तरह के स्रोतों पर काम कर रहा है। क्षारीय चट्टानों जैसे प्राथमिक स्रोतों के अलावा कोयला अवशेष, फ्लाई ऐश और रेड मड जैसे द्वितीयक संसाधनों से REEs निकालने की तकनीकों पर भी परियोजनाएं संचालित हैं।

रेड मड और ई-कचरे से निकलेंगे दुर्लभ खनिज, भारत के मिनरल सेक्टर में बड़ी क्रांति
Image Source : Via PIB

महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में उद्योगों के साथ सहयोग को भी इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा बताया गया। CSIR-IMMT की ओर से ऑयल इंडिया के साथ संयुक्त अनुसंधान एवं विकास के लिए सहयोग किया जा रहा है। इसका उद्देश्य प्रयोगशाला में विकसित तकनीकों को आगे पायलट स्तर और औद्योगिक अनुप्रयोग तक ले जाना है।

सोलर स्क्रैप में भी संभावनाएं

पत्रकारों से बातचीत में नारायण ने लो-ग्रेड मिनरल्स के साथ सोलर पैनल और इलेक्ट्रॉनिक कचरे में मौजूद आर्थिक संभावनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भविष्य में बढ़ते सौर ऊर्जा क्षेत्र के साथ पुराने और खराब हो चुके सोलर पैनलों से उपयोगी सामग्री की रिकवरी महत्वपूर्ण हो सकती है।

यह भी पढ़ें ; उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएं : पत्थरों में छिपा धर्म, कला और इतिहास का खजाना

राजस्थान और गुजरात में बड़े सौर ऊर्जा ग्रिड को देखते हुए सोलर पैनलों में मौजूद ग्लास, सिलिकॉन और अन्य घटकों की रिकवरी के लिए तकनीक विकसित करने पर काम किया जा रहा है। इसके अगले चरण में पायलट प्लांट और उन्नत हाइड्रोमेटलर्जी तकनीकों के जरिए महत्वपूर्ण खनिजों की रिकवरी को आगे बढ़ाने की योजना है।

राजस्थान में सौर ऊर्जा के तेजी से विस्तार को देखते हुए सोलर स्क्रैप से संसाधन निकालने की तकनीक का महत्व और बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, उद्योग, शोध संस्थानों और युवाओं की भागीदारी से आने वाले वर्षों में कचरे को संसाधन में बदलने वाला मजबूत इकोसिस्टम तैयार किया जा सकता है।

ओडिशा में खनिज तकनीक की अहम भूमिका

ओडिशा देश के प्रमुख खनिज संसाधन वाले राज्यों में शामिल है। ऐसे में यहां खनन के साथ खनिज प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़ी स्वदेशी तकनीकों का विकास भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। CSIR-IMMT में चल रहे शोध इसी दिशा में विज्ञान और उद्योग के बीच तालमेल की संभावनाओं को सामने रखते हैं।

दौरे के अंत में पत्रकार दल ने संस्थान की अनुसंधान प्रयोगशालाओं और प्रायोगिक सुविधाओं का अवलोकन किया। पत्रकारों ने वैज्ञानिकों और अधिकारियों से तकनीक विकास, संसाधनों की रिकवरी, अपशिष्ट प्रबंधन तथा अनुसंधान को औद्योगिक स्तर तक पहुंचाने से जुड़े सवालों पर संवाद भी किया।

यह भी पढ़ें ; 2040 तक भारत को ‘वेस्ट-फ्री’ बनाने का विजन: कचरे से हाई-वैल्यू मटेरियल और स्टार्टअप्स गढ़ेंगे देश की नई तकदीर : डॉ. रामानुज नारायण

इसके बाद पत्रकार दल ने भुवनेश्वर की ऐतिहासिक उदयगिरि-खंडगिरि गुफाओं का भी दौरा किया। इस यात्रा में वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ ओडिशा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को करीब से देखने का अवसर भी मिला।

Related Articles

Back to top button