जयराम रमेश का हमला, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड पर उठाए सवाल

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि कानून में श्रमिकों के संरक्षण से जुड़े प्रावधान कमजोर हो सकते हैं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा से जुड़े हालिया फैसले पर चिंता जताते हुए उन्होंने आशंका व्यक्त की कि भविष्य में श्रम विवादों में कानूनी अनिश्चितता बढ़ सकती है।

  • जयराम रमेश: इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड को लेकर केंद्र पर सवाल
  • सुप्रीम कोर्ट फैसला: ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा को लेकर जताई चिंता
  • श्रमिक हित: सुरक्षा और कानूनी निश्चितता कमजोर होने की आशंका

Jairam Ramesh Raises Concerns Over Industrial Relations Code: नई दिल्ली। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने केंद्र सरकार के इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि कानून में ऐसे प्रावधान हैं, जो श्रमिकों को मिलने वाली सुरक्षा को कमजोर कर सकते हैं। उन्होंने साथ ही सुप्रीम कोर्ट के ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा से जुड़े 20 अगस्त के फैसले पर भी चिंता जाहिर की है।

रमेश ने कहा कि उत्तर प्रदेश बनाम जय बीर सिंह मामले में 5:4 के बहुमत से आए फैसले में ‘इंडस्ट्री’ की अवधारणा को लेकर एक नई व्याख्या सामने आई है। उनके मुताबिक इसका असर इस बात पर पड़ सकता है कि भविष्य में कौन ‘कामगार’ की श्रेणी में आएगा और किन कर्मचारियों को श्रम कानूनों का संरक्षण मिलेगा।

1978 के ट्रिपल टेस्ट का दिया हवाला

जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पोस्ट में 1978 के ऐतिहासिक बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा फैसले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय सुप्रीम कोर्ट ने किसी गतिविधि को ‘इंडस्ट्री’ मानने के लिए एक ट्रिपल टेस्ट तय किया था।

इसमें व्यवस्थित गतिविधि, नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच सहयोग तथा मानवीय जरूरतों को पूरा करने के लिए वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन अथवा वितरण जैसे तत्व शामिल थे। रमेश के मुताबिक उस फैसले में मुनाफा कमाना किसी गतिविधि को ‘इंडस्ट्री’ मानने के लिए अनिवार्य शर्त नहीं था।

उनका कहना है कि चैरिटेबल संस्थाओं और सार्वजनिक निकायों की कई गतिविधियां भी इस व्यापक दायरे में आ सकती थीं। हालांकि न्यायपालिका, कानून-व्यवस्था और रक्षा जैसी मुख्य संप्रभु गतिविधियों को इससे बाहर रखा गया था।

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नए फैसले पर क्या है आपत्ति?

रमेश के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के 2026 के बहुमत वाले फैसले में पुराने दृष्टिकोण को दो स्तरों पर सीमित करने की संभावना दिखाई देती है। पहला, किसी गतिविधि में व्यापार या व्यवसाय जैसा स्पष्ट व्यावसायिक चरित्र होने की बात सामने आती है, जबकि 1978 के ट्रिपल टेस्ट में यह शर्त स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं थी।

दूसरा, संप्रभु कार्यों को ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा से बाहर रखने का दायरा व्यापक हो सकता है। रमेश को आशंका है कि इससे सरकार की ज्यादा गतिविधियां श्रम कानूनों के दायरे से बाहर जाने का रास्ता पा सकती हैं।

हालांकि उन्होंने यह भी माना कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नई व्याख्या पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत पहले ही पूरी हो चुकी या लंबित कार्यवाहियों पर लागू नहीं होगी। साथ ही यह फैसला नए इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड की व्याख्या को सीधे नियंत्रित नहीं करेगा।

असहमति के फैसले का भी किया जिक्र

जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की असहमति को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने 1978 के ट्रिपल टेस्ट को दोबारा विचार के लिए खोलने की जरूरत से इनकार किया।

रमेश ने कहा कि असहमति वाले फैसले में न्यायिक निश्चितता बनाए रखने और लंबे समय से स्थापित कानून को अस्थिर न करने पर जोर दिया गया है। उनके मुताबिक पुराने कानून के तहत विकसित न्यायिक फैसले नए कोड को समझने में भी उपयोगी हो सकते हैं।

श्रम कानूनों को लेकर अनिश्चितता की आशंका

कांग्रेस नेता का कहना है कि ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा में बदलाव या उसे संकीर्ण किए जाने की संभावना ऐसे समय में चिंता बढ़ाती है, जब औद्योगिक संबंधों में स्पष्टता जरूरी है। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र में सेवाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है और ऐसी स्थिति में श्रम कानूनों का दायरा सीमित होने से कर्मचारियों के संरक्षण पर असर पड़ सकता है।

रमेश ने यह भी आरोप लगाया कि इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड में केंद्र सरकार को पहले से ही प्रतिष्ठानों की कुछ अतिरिक्त श्रेणियों को कानून के दायरे से बाहर करने की शक्ति दी गई है। उनके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले में सामने आई संभावित नई व्याख्या और कानून में मौजूद इन शक्तियों के बीच भविष्य में श्रमिकों से जुड़े विवादों को लेकर बहस बढ़ सकती है।

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