ICMR-NIHR भुवनेश्वर पहुंचा राजस्थान का पत्रकार दल, रिसर्च और स्वास्थ्य मिशन की ली जानकारी

राजस्थान से ओडिशा पहुंचे पत्रकार दल ने भुवनेश्वर स्थित ICMR-NIHR का दौरा कर मलेरिया, डेंगू, टीबी, जनजातीय स्वास्थ्य और उभरती बीमारियों पर चल रहे अनुसंधानों को समझा। वैज्ञानिकों ने संस्थान की उपलब्धियों, राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में योगदान, नई वैक्सीन, प्रयोगशाला सेवाओं और वन हेल्थ दृष्टिकोण की जानकारी दी। इसके बाद दल ने ऐतिहासिक लिंगराज मंदिर पहुंचकर ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत को भी करीब से जाना।

  • ICMR-NIHR भुवनेश्वर में पत्रकार दल ने स्वास्थ्य अनुसंधानों की जानकारी ली।
  • मलेरिया, टीबी और जनजातीय स्वास्थ्य पर संस्थान के काम को समझा।
  • लिंगराज मंदिर पहुंचकर ओडिशा की ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत देखी।

दीपक मेहता

Journalist team from Rajasthan arrives at ICMR-NIHR Bhubaneswar : भुवनेश्वर। भुवनेश्वर पहुंचे राजस्थान के पत्रकार दल ने ICMR-राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान (ICMR-NIHRBB) का दौरा किया। इस दौरान पत्रकारों को संस्थान में चल रहे विभिन्न वैज्ञानिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुसंधानों से अवगत कराया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए यहां कई स्तरों पर शोध और फील्ड गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।

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संस्थान की अपर महानिदेशक डॉ. संघमित्रा पाती ने पत्रकार दल को ऑनलाइन संबोधित किया। उन्होंने बताया कि संस्थान का अनुसंधान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य वैज्ञानिक निष्कर्षों को जमीनी स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए उपयोगी बनाना भी है। इसी सोच के तहत क्षेत्र विशेष की बीमारियों, स्वास्थ्य जोखिमों और समुदायों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बहुविषयक शोध किया जा रहा है।

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उन्होंने बताया कि मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी बीमारियों के अलावा आदिवासी स्वास्थ्य, पोषण, संक्रामक रोग, उभरती जूनोटिक बीमारियां और जलवायु परिवर्तन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम भी संस्थान के प्रमुख शोध क्षेत्रों में शामिल हैं।

आउटब्रेक से लेकर डायग्नोस्टिक टूल्स तक काम

पत्रकार दल को बताया गया कि ICMR-NIHR भुवनेश्वर ने विभिन्न स्वास्थ्य आपात स्थितियों के दौरान आउटब्रेक जांच में अहम भूमिका निभाई है। इसके साथ ही मॉलिक्यूलर सर्विलांस और नए डायग्नोस्टिक तथा एंटोमोलॉजिकल टूल्स विकसित करने की दिशा में भी काम किया गया है।

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संस्थान परिचालन अनुसंधान के जरिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों को सहयोग देने के साथ नीति निर्माण के लिए सुझाव भी उपलब्ध कराता है। फील्ड एपिडेमियोलॉजी और प्रयोगशाला नेटवर्क को मजबूत करना भी इसकी प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल है।

वैज्ञानिकों के अनुसार केंद्र ने एक्सट्राम्यूरल और इंट्राम्यूरल रिसर्च परियोजनाओं पर लगातार काम किया है। शोध को पीयर-रिव्यूड जर्नल्स में प्रकाशित करने, प्रतिस्पर्धी अनुदान हासिल करने और आधुनिक प्रयोगशाला व फील्ड सुविधाओं को विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों की क्षमता बढ़ाने के लिए कार्यशालाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

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संस्थान के काम में ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है। इसके तहत मानव, पशु और पर्यावरण के बीच स्वास्थ्य संबंधों को एक साथ समझने पर जोर दिया जाता है।

चार दशक से स्वास्थ्य क्षेत्र में योगदान

अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. देबदत्त भट्टाचार्य ने बताया कि ICMR-NIHR भुवनेश्वर पिछले करीब चार दशकों से राज्य सरकार के साथ समन्वय में काम कर रहा है। संस्थान ने अपने मिशन और विजन के अनुरूप क्षेत्र की स्वास्थ्य स्थिति में सुधार लाने के प्रयासों में योगदान दिया है।

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उन्होंने पत्रकारों को संस्थान की कुछ महत्वपूर्ण परियोजनाओं और उपलब्धियों के बारे में जानकारी दी। इनमें जनजातीय स्वास्थ्य से जुड़ा काम भी प्रमुख है। भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने संस्थान को ट्राइबल हेल्थ ऑब्जर्वेटरी परियोजना का नोडल केंद्र बनाया है।

इस परियोजना के तहत देश के 65 जिलों में लगभग छह लाख विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों यानी PVTGs को शामिल करने की योजना है। इसका उद्देश्य इन समुदायों की स्वास्थ्य स्थिति, आवश्यकताओं और प्रमुख स्वास्थ्य चुनौतियों को बेहतर तरीके से समझना तथा उनके अनुरूप हस्तक्षेप विकसित करना है।

मलेरिया वैक्सीन से टीबी लैब तक

डॉ. भट्टाचार्य ने बताया कि संस्थान ने AdFalciVax विकसित की है, जिसे भारत की पहली स्वदेशी रिकॉम्बिनेंट मल्टी-स्टेज मलेरिया वैक्सीन बताया गया। मलेरिया जैसी चुनौती से निपटने की दिशा में इसे संस्थान के महत्वपूर्ण अनुसंधान प्रयासों में शामिल किया गया है।

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टीबी के क्षेत्र में भी संस्थान की भूमिका महत्वपूर्ण है। ICMR-NIHR भुवनेश्वर देश में ट्यूबरकुलोसिस के लिए छह नेशनल रेफरेंस लेबोरेटरीज में से एक है। यह सात उत्तर-पूर्वी राज्यों सहित कुल दस राज्यों में टीबी से संबंधित प्रयोगशाला सेवाओं को सहयोग उपलब्ध कराता है। संस्थान की नेशनल रेफरेंस लैबोरेटरी को वर्ष 2018 में NABL मान्यता मिली थी।

वायरल बीमारियों की जांच में भी अहम भूमिका

संस्थान की वायरस रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लेबोरेटरी (VRDL) को वर्ष 2018 में क्षेत्रीय स्तर पर अपग्रेड किया गया था। पत्रकार दल को बताया गया कि ओडिशा सरकार ने इस प्रयोगशाला को जापानी इंसेफेलाइटिस, डेंगू, चिकनगुनिया और H1N1 के लिए प्रमुख प्रयोगशाला के रूप में मान्यता दी है।

इसके साथ ही मीजल्स और रूबेला की जांच के लिए इसे WHO से मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला का दर्जा भी मिला है। इससे क्षेत्र में संक्रामक रोगों की निगरानी और जांच क्षमता को मजबूती मिली है।

HIV के क्षेत्र में भी संस्थान की प्रयोगशाला सेवाएं महत्वपूर्ण हैं। इसकी HIV-1 वायरल लोड लेबोरेटरी ओडिशा के 14 ART केंद्रों में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम की सेवाओं को सहयोग प्रदान कर रही है। संस्थान के अनुसार यह देश की NABL से मान्यता प्राप्त पहली गैर-NACP प्रयोगशाला भी है।

विज्ञान के बाद संस्कृति से जुड़ा पत्रकार दल

ICMR-NIHR भुवनेश्वर के दौरे के बाद राजस्थान से पहुंचे पत्रकार दल ने शहर के ऐतिहासिक लिंगराज मंदिर के दर्शन किए। स्वास्थ्य अनुसंधान और वैज्ञानिक गतिविधियों को करीब से देखने के बाद मंदिर का दौरा दल के लिए ओडिशा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को समझने का अवसर भी बना।

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भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर अपनी भव्यता और प्राचीन स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध है। करीब 180 फीट ऊंचा यह मंदिर 11वीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित माना जाता है और कलिंग मंदिर स्थापत्य परंपरा के प्रमुख उदाहरणों में शामिल है। मंदिर परिसर में लगभग 150 सहायक मंदिर भी स्थित हैं।

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मंदिर की संरचना में गर्भगृह, यज्ञ मंडप, नाट्य मंडप और भोग मंडप जैसे प्रमुख हिस्से शामिल हैं। इसकी दीवारों और स्थापत्य सज्जा में बारीक नक्काशी के साथ तत्कालीन सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक गतिविधियों के विभिन्न दृश्य देखने को मिलते हैं।

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पत्रकार दल ने मंदिर परिसर का अवलोकन करते हुए ओडिशा की प्राचीन कला, वास्तुकला और आध्यात्मिक परंपरा को करीब से जाना। इस तरह दौरे के दौरान पत्रकारों को एक ओर आधुनिक स्वास्थ्य अनुसंधान और वैज्ञानिक प्रयासों की जानकारी मिली, वहीं दूसरी ओर ओडिशा की समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत से भी रूबरू होने का अवसर मिला।

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