पुलिस का झांपो अभियान

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कोई यह ना समझे कि गलती से मिस्टैक हो गई। छपना था-‘झांको और छप गया ‘झांपो। ऐसा नही है। ना तो गलती हुई ना मिस्टैक ना प्रूफ रीडर की चूक। लिखने वाले ने ‘झांपो लिखा। कंप्यूटर ऑपरेटर ने ‘झांपो टाइप किया। प्रूफ रीडर ने ‘झांपो पढा और छपा भी वही, जो हम चाह रहे थे। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।

सफाई ना देते तो भी चल जाता। स्पष्टीकरण ना भी देते तो कौन-किस से और क्या पूछणे वाला। ऐसा भी नही कि कारण बताओ नोटिस के जवाब में सफाई दी जा रही है या कि स्पष्टीकरण दिया जा रहा है। ये सब इसलिए कि गलती हो जाना या गलती कर देना मानवीय प्रवृति है। देश-दुनिया में ऐसा एक भी बंदा नहीं जिसने कभी ना कभी कोई ना कोई गलती की हो। गलती हो जाना और जान बूझ के गलती करने में खासा फरक है। हथाईबाज इस मुद्दे पर पहले भी चर्चा कर चुके हैं।

गलती हो जाने के बाद क्षमा मांग ली जाए तो और भी अच्छा। मामला इज नक्की। सॉरी भाई साहब या सॉरी मैम-तो अगली पार्टी हंस के कोई बात नही कह देगी और वो उधर-आप इधर। कई लोग गलती करने के बावजूद सॉरी फील करने में अपनी हेटी समझते है। हमारे हिसाब से यह गलत है। गलती हो गई तो कान पकडऩे या स्वीकार करने में कैसी हेटी और कैसी ऊंची। पण भतेरे लोग चोरी और सीना जोरी की राह पर चलने वाले। मगर ‘झांपने में ऐसा कुछ नही है जो खामखा अमचूर की तरह अकड़ा जाए।

कई दफे एक छोटी सी गलती बहुत बड़ा बखेड़ा कर देती है। इस पर सावधानी हटी-दुर्घटना घटी का लेबिल भी लगाया जा सकता है। यदि किसी हादसे-दुर्घटना में किसी की मौत हो जाए तो संबंधित समाचार के एंड में एक पंक्ति अमूमन पढने को मिल जाती है-‘पोस्टमार्टम के बाद शव मृतक के परिजनों को सौंप दिया गया। पुलिस मामले की जांच कर रही है।

एक छोटी सी चूक के कारण मचे हंगामे के बाद कुछ अखबारों के क्राइम रिपोर्टरों ने यह लाइनें लिखनी छोड़ दी। कई लिखते हैं तो एक शब्द पे खास नजर रहती है। तसल्ली होने के बाद खबर फाइनल। वो भूल क्या थी, पढ-सुन कर आप को भी हंसी आएगी। हैरत होगी। कोफ्त होगी। एक अक्षर ने मायने बदल दिए। एक अक्षर ने हंगामा कर दिया।

अगले अंक में अखबार को खेद जताना पड़ा। हुआ यूं कि शहर के एक ख्याति प्राप्त उद्योगपति, सेवाभावी, भामाशाह के घर के एक सदस्य का सड़क हादसे में निधन हो गया। रिपोर्टर ने खबर के आखिर में परंपरागत लाइने लिख दी-‘पोस्टमार्टम के बाद शव मृतक के परिजनों को सौंप दिया गया है। पुलिस मामले की तहकीकात कर रही है। रिपोर्टर ने समाचार दे दिया मगर दूसरे दिन जो छपा उसने बखेड़ा कर दिया।

खबर के एंड में ‘प की जगह ‘ह छप गया। वहां परिजनों की जगह हरिजनों हो गया। अगले दिन अखबार को ‘ह की जगह ‘प पढने का निवेदन कर के खेद जताना पड़ा। हमारे सर भी हमें हमेशा से ही पूरी सावधानी-सावचेती और सतर्कता बरतने की सीख देते रहे हैं। हम ऐसा करते भी हैं। उसके बावजूद कोई चूक हो जाए तो क्षमा। भूल चूक लेणी-देणी। मगर ‘झांपो मे ऐसा कुछ नही हुआ जिससे गफलत पैदा हो।

लपक के पकडऩे को हमारी मायड़ भाषा में ‘झांपो कहते हैं। झांप लिया बोले तो पकड़ लिया। झांपो बोले तो पकड़ो। गांवाई इलाकों और पुलिस महकमें में इसका प्रचलन ज्यादा है। पुलिस पलटन में नब्बे फीसदी जवान ग्रामीण परिपेक्ष से आते हैं। टे्रनिंग और तैनाती के बाद भी उनकी जुबां देहाती टाईप। वे लोग आम जनता के साथ जो व्यवहार करते हैं उसे सभ्य समाज उचित नहीं मानता। बोली और भाषा भी खड़ी। गाळी पहले बाकी बात बाद में।

आजकल पुलिस बेड़े ने ‘झांपो अभियान चला रखा है। मिनी लॉकडाउन के चलते नीयत समय के बाद घर से बाहर निकल कर सड़कों पर आने पे पाबंदी लगी हुई है। आपातकालीन स्थिति इससे बाहर। मगर पांडु पुलिस आडेइकट चालान काट रहे हैं। जो आया ‘झांप लिया। वाहन सीज और चालान कट।

ज्यादा चूं-चप्पड़ करो तो क्वारेंटाइन सेंटर में टेक दो। रिपोर्ट आने तक वही पड़े रहो। पांडु किसी की सुनते भी नहीं। उनके लिए ना आपात ना स्थिति। जहां चाहा नाका लगा लिया और वाहन चालकों को ‘झांपणा शुरू । ऐसे ‘झांपते है मानो किसी आतंकवादी को दबोच रहे हो। किसी को मुर्गा बना दिया-किसी से मेंढक चाल चलवा दी। सफाई दो तो डंडा तैयार।

हथाईबाज यह नही कहते कि बेवजह सड़कों पे बाइक चूंचाणे वालों को ‘झांपो मति। जरूर झांपो -जरूर पकड़ो। उनके वाहन सीज करो। चालान बनाओ। मगर उन लोगों को मत ‘झांपो जो वाकई में अस्पताल जा रहे हों। गमी में जा रहे हों। दफ्तर जा रहे हों। किसी की मौत में जा रहे हों। किसी आवश्यक काम से जा रहे हो। समझदार आदमी बाहर नही डोलता। यदि उसका आना-जाना जरूरी है तो तहकीकात कर लो। एक तो वो पहले से ही दुखी और डरा सहमा। तिस पर ‘झांपो अभियान। यह ठीक नही।