दवाओं के साइड इफेक्ट पर अलर्ट, जयपुर में फार्माकोविजिलेंस कार्यशाला

जयपुर में 6वें राष्ट्रीय फार्माकोविजिलेंस सप्ताह के तहत राज्य स्तरीय कार्यशाला हुई। विशेषज्ञों ने दवाओं के प्रतिकूल प्रभावों की समय पर रिपोर्टिंग, मरीज की सुरक्षा, मेडिकल डिवाइस की निगरानी और तर्कसंगत दवा उपयोग पर जोर दिया। अधिकारियों ने कहा कि एडीआर रिपोर्टिंग को नियमित चिकित्सा व्यवस्था का हिस्सा बनाकर दवाओं से जुड़े जोखिमों को कम किया जा सकता है और उपचार को अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है।

  • राष्ट्रीय फार्माकोविजिलेंस सप्ताह-2026 पर जयपुर में राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन।
  • दवाओं के साइड इफेक्ट और मेडिकल डिवाइस की गड़बड़ी की तुरंत रिपोर्टिंग का आह्वान।
  • प्रमुख शासन सचिव गायत्री राठौड़ ने कहा- एडीआर रिपोर्टिंग पर चिकित्सकों के खिलाफ नहीं होगी कोई कार्रवाई।

Alert regarding side effects of medicines : दवा मरीज तक पहुंचाना ही इलाज की पूरी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उसके सुरक्षित और तर्कसंगत इस्तेमाल पर नजर रखना भी उतना ही जरूरी है। इसी संदेश के साथ मंगलवार को एसएमएस मेडिकल कॉलेज के ग्राउंड ऑडिटोरियम में 6वें राष्ट्रीय फार्माकोविजिलेंस सप्ताह-2026 के तहत राज्य स्तरीय संवेदनशीलता कार्यशाला आयोजित की गई।

दवाओं के साइड इफेक्ट पर अलर्ट, जयपुर में फार्माकोविजिलेंस कार्यशाला
Image Source : Via DIPR

चिकित्सा शिक्षा विभाग, राजस्थान सरकार और एसएमएस मेडिकल कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम का विषय ‘फार्माकोविजिलेंस के माध्यम से दवाओं के तर्कसंगत उपयोग को बढ़ावा देना—सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में एक कदम’ रहा। इसमें प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों से चिकित्सक, चिकित्सा शिक्षक और विशेषज्ञ शामिल हुए।

दवाओं के साइड इफेक्ट पर अलर्ट, जयपुर में फार्माकोविजिलेंस कार्यशाला
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प्रमुख शासन सचिव चिकित्सा शिक्षा गायत्री राठौड़ ने कहा कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हो रहा है और सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में मरीजों को उपचार, दवाएं और जांच सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। ऐसे में मरीज की सुरक्षा को चिकित्सा व्यवस्था का अहम हिस्सा बनाना जरूरी है। यदि उपचार के दौरान किसी दवा से प्रतिकूल प्रभाव सामने आता है तो उसकी पहचान और समय पर रिपोर्टिंग से भविष्य में ऐसे जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है।

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उन्होंने चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ से एडीआर यानी दवाओं के प्रतिकूल प्रभावों की रिपोर्टिंग में किसी तरह का संकोच नहीं करने का आह्वान किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी रिपोर्टिंग किसी डॉक्टर, रेजिडेंट या नर्स के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का आधार नहीं होगी। उनके अनुसार, किसी अप्रत्याशित प्रतिक्रिया की जानकारी देना गलती स्वीकार करना नहीं, बल्कि मरीज की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी निभाना है।

कार्यशाला में मेडिकल डिवाइस की सुरक्षा को भी फार्माकोविजिलेंस से जोड़कर देखने पर जोर दिया गया। आईवी सेट, कैथेटर, वेंटिलेटर, डायलिसिस सर्किट या अन्य चिकित्सा उपकरणों में खराबी मिलने पर उसकी भी रिपोर्टिंग किए जाने की बात कही गई।

गायत्री राठौड़ ने कहा कि एक अस्पताल से सामने आई एडीआर रिपोर्ट भी पूरे प्रदेश के मरीजों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। यदि किसी दवा के एक विशेष बैच से असामान्य प्रतिक्रियाओं के कई मामले सामने आते हैं और इसकी जानकारी आरएमएससीएल तक पहुंचती है, तो संबंधित बैच की जांच कर आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं। उन्होंने एसडीआरपी-2026, बेड-हेड टिकट की नियमित समीक्षा, एक साथ कई दवाएं लेने वाले मरीजों की निगरानी और दवा से होने वाली एलर्जी को मेडिकल रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज करने पर भी जोर दिया।

आयुक्त चिकित्सा शिक्षा बाबूलाल गोयल ने कहा कि प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों में फार्माकोविजिलेंस को नियमित चिकित्सा व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों से प्रतिकूल दवा प्रतिक्रियाओं की रिपोर्टिंग को अपनी कार्यप्रणाली में शामिल करने का आग्रह किया।

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दवाओं के दुष्प्रभाव निगरानी सेल की राज्य समन्वयक डॉ. मोनिका जैन ने एडीआर सेंटर की रिपोर्टिंग को और मजबूत करने की जरूरत बताई। उन्होंने प्रदेश को एडीआर रिपोर्टिंग के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल करने की दिशा में लगातार प्रयास करने पर जोर दिया।

तकनीकी सत्र में चेतन जाधव ने दवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए हैंडलिंग, स्टोरेज, डिस्ट्रीब्यूशन, प्रोडक्ट रिटर्न और शिकायतों के निस्तारण से जुड़े पहलुओं की जानकारी दी। डॉ. सुरिंदर खेर ने क्लिनिकल ट्रायल के दौरान मरीज की सुरक्षा से जुड़े जरूरी बिंदुओं पर चर्चा की। डॉ. गायत्री देवी रविचंद्रन ने रोजमर्रा के चिकित्सा अभ्यास में फार्माकोविजिलेंस की भूमिका और मरीजों की सुरक्षा के उपायों पर प्रकाश डाला।

बेस्ट प्रैक्टिस सत्र में निजी मेडिकल कॉलेजों की डॉ. शिप्रा जैन, डॉ. प्रियंका राठी और डॉ. नमिता चौधरी ने संस्थानों में फार्माकोविजिलेंस को मजबूत करने के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने नियमित रिपोर्टिंग, टीमवर्क और चिकित्सकीय सतर्कता को दवा संबंधी जोखिम कम करने के लिए महत्वपूर्ण बताया।

कार्यशाला में डॉ. मोनिका जैन के मॉडरेशन में ‘क्या फार्माकोविजिलेंस हमारे दवा लिखने के तरीके को बदल सकता है?’ विषय पर पैनल चर्चा हुई। इसमें डॉ. रीमा मीणा, डॉ. गुंजा जैन, डॉ. अंबिका शर्मा, आरएमएससीएल के डॉ. विकास शर्मा सहित फार्मा क्षेत्र के विशेषज्ञों ने दवाओं के सुरक्षित और तर्कसंगत उपयोग पर विचार रखे।

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अनुभव साझा सत्र में एसएमएस मेडिकल कॉलेज की फार्माकोविजिलेंस कमेटी की सदस्य सचिव एवं फार्माकोलॉजी टीम की डॉ. रूपा कपाड़िया ने एएमसी सेंटर में एडीआर रिपोर्टिंग के दौरान आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों और उनके समाधान पर चर्चा की। कार्यक्रम के समापन पर अतिरिक्त निदेशक (अकादमिक), चिकित्सा शिक्षा डॉ. रश्मि गुप्ता ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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