गीता और महाभारत के समन्वय से ही संभव है बेहतर जीवन प्रबंधन: पं. विजयशंकर मेहता
जयपुर के बिरला ऑडिटोरियम में ‘सिद्धांत और दृष्टांत’ कथा का समापन हुआ। पं. विजयशंकर मेहता ने गीता और महाभारत के प्रसंगों को जोड़कर जीवन प्रबंधन के सूत्र समझाए। उन्होंने परिवार में प्रेम और समर्पण, कामकाज में मेहनत, निर्णयों में बदलाव की समझ और मानसिक शांति के लिए ध्यान को जरूरी बताया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहरवासी शामिल हुए।
बिरला ऑडिटोरियम में आयोजित दो दिवसीय ‘सिद्धांत और दृष्टांत’ कथा का हुआ भव्य समापन
जयपुर। गीता के हर श्लोक में जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांत बसे हुए हैं और किसी भी सिद्धांत को गहराई से समझने के लिए दृष्टांत बहुत महत्वपूर्ण होता है. गीता में 18 अध्याय हैं और महाभारत का युद्ध भी 18 दिन ही चला था; भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता के जिस अध्याय में जो ज्ञान दिया गया, संयोग से वैसी ही घटना महाभारत के उस दिन के युद्ध में घटी थी । इसलिए जीवन प्रबंधन को यदि समझना हो, तो गीता और महाभारत को जोड़कर समझना होगा।प्रताप परिवार के तत्वावधान में स्थानीय बिरला ऑडिटोरियम में आयोजित दो दिवसीय ‘सिद्धांत और दृष्टांत’ कार्यक्रम के दौरान व्यासपीठ से जीवन प्रबंधन गुरु पं. विजयशंकर मेहताजी (हमारे हनुमान परिवार, उज्जैन) ने दोनों ग्रंथों के समन्वय से जीवन के कई अनमोल सूत्र साझा किए।

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पहला दिन: व्यावसायिक और पारिवारिक प्रबंधन के सूत्र
कार्यक्रम के पहले दिन जीवन प्रबंधन गुरु पं. विजयशंकर मेहताजी (हमारे हनुमान परिवार, उज्जैन) ने गीता के पहले नौ अध्यायों को महाभारत के पहले नौ दिन के युद्ध से जोड़ा. उन्होंने बताया कि व्यावसायिक जीवन की सफलता के लिए पहली शर्त परिश्रम है. कर्मयोग पर आधारित गीता के आरंभ के छह अध्याय हमें सिखाते हैं कि पूरी ईमानदारी के साथ खूब परिश्रम कीजिए, और जब परिश्रम के साथ पुरुषार्थ मिल जाता है, तो हर सफलता आसान हो जाती है।कथा के अगले चरण में सातवें से नौवें अध्याय के माध्यम से भक्तियोग को केंद्र में रखते हुए उन्होंने बताया कि पारिवारिक जीवन की सफलता के लिए दो बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं—प्रेम और समर्पण. घर-परिवार में सदस्यों के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं, परंतु जब मतभेद मनभेद में बदल जाते हैं, तब परिवार की शांति चली जाती है. इसलिए धैर्य, प्रेम और समन्वय बनाए रखना आवश्यक है।

दूसरा दिन: निजी जीवन, ज्ञानयोग और जीवन दृष्टि की गहराई
सोमवार को समापन दिवस पर व्यासपीठ से जीवन प्रबंधन गुरु पं. विजयशंकर मेहताजी (हमारे हनुमान परिवार, उज्जैन) ने गीता के 10वें से 18वें अध्याय के सिद्धांतों को महाभारत युद्ध के 10वें से 18वें दिन के दृश्यों से जोड़कर पारिवारिक तथा निजी जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण सूत्रों की गहरी व्याख्या की. उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण से सीखिए कि जीवन के प्रति दृष्टि कितनी गहरी होनी चाहिए।
आचरण और परिवार प्रबंधन: अध्याय 10 से 12 की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ व्यक्ति के आचरण का अनुसरण दूसरे लोग करते हैं. इसलिए समाज या परिवार में यदि आप बड़े या लोकप्रिय हैं, तो आपका आचरण हमेशा ऐसा होना चाहिए जिससे लोग कुछ अच्छा सीख सकें।
ज्ञानयोग और पुनर्मूल्यांकन: गीता के अध्याय 13 से 18 को महाभारत के 13वें से 18वें दिन के युद्ध से जोड़कर बताया कि देश-काल-परिस्थिति के अनुसार अपने निर्णयों और संकल्पों का पुनर्मूल्यांकन करते रहना चाहिए. जिसने यह कला सीख ली, उसका जीवन औरों के लिए आदर्श बन जाता है।
सद्मार्ग और दैवीय संपदा: उन्होंने आह्वान किया कि आसुरी संपदा से दूर रहें और दैवीय संपदा (अच्छी बातें) को जीवन में उतारें. जीवन के युद्ध में यदि गलत मार्ग अपनाएंगे तो जल्दी थक जाएंगे; इसलिए सत्य, धर्म और उत्साह हमेशा बनाए रखिए।
ईश्वरीय विधान व आध्यात्मिकता: जयद्रथ वध प्रसंग यह समझाता है कि ईश्वर किस सीमा तक हमारी सहायता को तत्पर रहते हैं. गुरु द्रोण की मृत्यु यह बताती है कि ईश्वर के विधान में सही का मान और गलत को दंड मिलता है. अर्जुन के रथ पर हनुमानजी की उपस्थिति की तरह हमें भी अपने जीवनरथ की ध्वजा पर हनुमानजी को बिठाकर उसकी रास प्रभु को सौंप देनी चाहिए. अंत में उन्होंने संदेश दिया कि व्यस्तताओं के बीच भी 24 घंटे में कुछ समय मेडिटेशन (ध्यान) को अवश्य दें ताकि कर्म के फल का त्याग आसान होकर शांति प्राप्त हो सके ।
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आयोजक परिवार के श्री देवेंद्र शेखावत ने बताया कि इस दो दिवसीय ज्ञानवर्धक आयोजन का बड़ी संख्या में शहरवासियों ने लाभ उठाया और जीवन प्रबंधन के इन सूत्रों को अपने जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया ।



