भारतीय ज्ञान परंपरा पर शोध जरूरी : राज्यपाल बागडे

उदयपुर में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने अध्ययन और शोध की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा दुनिया में महत्वपूर्ण है। विदेशी विद्वानों ने भाषा, दर्शन, विज्ञान और ज्ञान-विचार की समृद्धता को स्वीकार किया है। युवाओं से इस विरासत को समझने और आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

  • भारतीय ज्ञान परंपरा पर शोध और अध्ययन बढ़ाने पर राज्यपाल ने दिया जोर।
  • राज्यपाल बागडे ने भारतीय दर्शन, भाषा और विज्ञान की समृद्ध विरासत का किया उल्लेख।
  • प्राचीन भारतीय ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत बताई।

Research on the Indian knowledge tradition is essential : प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को लेकर उदयपुर में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हुआ। इस दौरान राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान विरासत पर दुनिया भर में शोध और अध्ययन को आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि आज भी अध्ययन और विमर्श का महत्वपूर्ण विषय है।

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पेसिफिक अकादमी ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग, फैकल्टी ऑफ सोशल साइंस एंड ह्यूमैनिटीज, वैश्विक संस्कृत मंच और वैश्विक इतिहास मंच के संयुक्त तत्वावधान में यह संगोष्ठी आयोजित की गई। इसका विषय ‘प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा : ज्ञान एवं विज्ञान के आधुनिक आयाम’ रखा गया था।

समापन समारोह में राज्यपाल ने भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी दार्शनिकों, भाषाविदों और लेखकों ने भी भारत के ज्ञान, दर्शन, भाषा और वैज्ञानिक चिंतन की विशेषताओं को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में ज्ञान के कई ऐसे आयाम रहे हैं, जिनका आधुनिक संदर्भों में फिर से अध्ययन किया जाना जरूरी है।

अपने संबोधन में बागडे ने औपनिवेशिक दौर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के आने से पहले देश में गुरुकुलों, विद्यालयों और आश्रमों के माध्यम से शिक्षा और ज्ञान की परंपरा व्यापक रूप से संचालित थी। उनके अनुसार, औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था के दौर में भारतीय संस्कृति, ज्ञान और विज्ञान की पारंपरिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचा।

राज्यपाल ने इस दौरान भारत के प्राचीन वैज्ञानिक और दार्शनिक चिंतन से जुड़े विभिन्न संदर्भ भी सामने रखे। उन्होंने परमाणुवाद सहित भारतीय ज्ञान परंपरा के अलग-अलग पक्षों का उल्लेख करते हुए इनके दस्तावेजीकरण और गंभीर शोध की आवश्यकता पर जोर दिया।

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बागडे ने अपने संबोधन में बप्पा रावल से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों का भी उल्लेख किया। उन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ उनके संघर्ष से जुड़े विभिन्न संदर्भ प्रस्तुत किए और रावलपिंडी नाम को भी बप्पा रावल के नाम से जोड़कर अपनी बात रखी।

उन्होंने कहा कि प्राचीन ज्ञान और इतिहास को केवल पुस्तकों तक सीमित रखने के बजाय नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। इसके लिए शोध, संवाद और प्रमाण आधारित अध्ययन को बढ़ावा देना होगा, ताकि भारत की ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों में बेहतर तरीके से समझा जा सके।

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