शहर बसाने के लिए जंगल नहीं उजाड़ सकते : हफीज कॉन्ट्रैक्टर
प्रसिद्ध वास्तुकार हफीज कॉन्ट्रैक्टर ने स्मार्ट सिटी प्लानिंग में पर्यावरण संरक्षण को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि बढ़ती आबादी की जरूरतें पूरी करने के लिए जंगल, कृषि भूमि और वेटलैंड बचाने होंगे। शहरों को केवल दो आयामों में नहीं, बल्कि 3D तरीके से विकसित करना चाहिए। प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित निर्माण, आधुनिक तकनीक और युवाओं की रचनात्मक सोच पर भी उन्होंने जोर दिया।
- स्मार्ट सिटी प्लानिंग में जंगल, कृषि भूमि और वेटलैंड बचाने पर जोर।
- हफीज कॉन्ट्रैक्टर ने 3D निर्माण और सुरक्षित शहरों की जरूरत बताई।
- वास्तुकला शिक्षा में तकनीक, AI और सस्टेनेबिलिटी को शामिल करने की बात।
We cannot destroy the forest to build a city : बढ़ती आबादी के बीच शहरों का विस्तार किस तरह हो, इसे लेकर पद्म भूषण से सम्मानित प्रसिद्ध वास्तुकार हफीज कॉन्ट्रैक्टर ने नई सोच अपनाने की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा कि शहरों को विकसित करने के नाम पर जंगल, कृषि भूमि और आर्द्रभूमि को लगातार खत्म करना अब संभव नहीं है। भविष्य की स्मार्ट सिटी प्लानिंग में पर्यावरण संरक्षण को केंद्र में रखना होगा।
यह भी पढ़ें ; जयपुर में एथर का नया कोणार्क लॉन्च
यह बात उन्होंने एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी (MIT-WPU), पुणे में आयोजित ‘हफीज कॉन्ट्रैक्टर स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर’ के उद्घाटन सम्मेलन में कही। कार्यक्रम में वास्तुकला शिक्षा, तेजी से बदलते शहरों, सस्टेनेबिलिटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों के बढ़ते प्रभाव पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए।
हफीज कॉन्ट्रैक्टर ने कहा कि उनके नाम से जुड़े आर्किटेक्चर कॉलेज के साथ जुड़ना उनके लिए सम्मान के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी है। उन्होंने छात्रों से वास्तुकला के बुनियादी सिद्धांतों को समझने और हर काम के पीछे स्पष्ट उद्देश्य रखने की अपील की।
उन्होंने कहा कि शहरों में आने वाली बड़ी आबादी को बसाने के लिए निर्माण के पारंपरिक तरीकों पर ही निर्भर नहीं रहा जा सकता। शहर नियोजन को केवल 2D नजरिए से देखने के बजाय 3D दृष्टिकोण अपनाना होगा। साथ ही भूकंप और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं को ध्यान में रखकर इमारतों की डिजाइनिंग जरूरी है।
वास्तुकार ने पर्यावरण पर बढ़ते दबाव को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कृषि भूमि और जंगलों को नष्ट करके शहरों का विस्तार करने का तरीका लंबे समय तक नहीं चल सकता। यदि प्रकृति को नुकसान पहुंचाया गया तो इसका सीधा असर मानव अस्तित्व पर पड़ेगा। ऐसे में कम लागत में मजबूत और टिकाऊ निर्माण के नए विकल्प तलाशने की जरूरत है।
उन्होंने निर्माण क्षेत्र में सीमेंट और स्टील जैसी बुनियादी सामग्रियों के इस्तेमाल के साथ उनमें सुधार की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक आने वाले समय में शहर किस तरह डिजाइन किए जाएंगे, इसका असर आने वाली पीढ़ियों के जीवन पर पड़ेगा। इसलिए संस्थानों को युवाओं को नए विचारों और प्रयोगों के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
यह भी पढ़ें ; मोदी-खालिद मुलाकात: भारत-यूएई रिश्तों को मिली नई रफ्तार
एमआईटी-डब्ल्यूपीयू के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. राहुल विश्वनाथ कराड ने कहा कि हफीज कॉन्ट्रैक्टर का संस्थान से जुड़ना गौरव की बात है। साथ ही इससे विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी भी बढ़ी है कि वास्तुकला शिक्षा को समय के बदलावों के अनुरूप तैयार किया जाए। उन्होंने कहा कि आर्किटेक्चर लोगों के रहने, काम करने और शहरों को अनुभव करने के तरीके को प्रभावित करता है।
डॉ. कराड ने तकनीक और AI के कारण शिक्षा एवं पेशेवर कामकाज में आ रहे बदलावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उद्योग और शिक्षा जगत को मिलकर छात्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना होगा।
कार्यक्रम में फाइन ज्वैलर पवन आनंद ने रचनात्मकता और अंतर-विषयक शिक्षा की अहमियत बताई। उन्होंने कहा कि वास्तुकला केवल इमारत बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अनुभव और किसी स्थान से जुड़ाव का भी माध्यम है। उनके अनुसार छात्रों को अपनी डिग्री की सीमाओं से बाहर निकलकर अपनी प्रतिभा और रुचियों को पहचानना चाहिए।
वास्तुकार पुष्कर कानविंदे ने छात्रों को लगातार सीखते रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि वास्तुकला बहुत व्यापक क्षेत्र है और पढ़ाई पूरी होने के बाद सीखने की प्रक्रिया खत्म नहीं होती। अनुभव, प्रयोग और लोगों से संवाद के जरिए लगातार ज्ञान बढ़ाना जरूरी है। AI के दौर में भी रचनात्मक सोच ही एक अच्छे वास्तुकार की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
सम्मेलन में वास्तुकला शिक्षा के भविष्य से जुड़े दो प्रमुख विषयों पर राउंड-टेबल चर्चा भी हुई। ‘सस्टेनेबिलिटी (SDGs) और वास्तुकला शिक्षा का भविष्य’ विषय पर छात्रों को सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप तैयार करने पर विचार हुआ। वहीं ‘प्रौद्योगिकी हस्तक्षेप और बी.आर्च. छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करना’ विषय में तकनीक की बढ़ती भूमिका पर चर्चा की गई।
यह भी पढ़ें ; उज्जैन के अडिग हनुमान: रहस्य या प्राचीन शिल्पकला ?
दोनों सत्रों में छात्रों ने विशेषज्ञों के साथ सीधे संवाद किया और सवाल-जवाब के जरिए अपनी जिज्ञासाओं का समाधान किया। सम्मेलन ने इस बात पर जोर दिया कि आने वाले समय की वास्तुकला केवल आधुनिक और आकर्षक इमारतों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि पर्यावरण, तकनीक, सुरक्षा और मानवीय जरूरतों के संतुलन पर आधारित होगी।



