भाषाओं में छिपे ज्ञान की खोज, IIT जोधपुर का खास शोध

आईआईटी जोधपुर के भाषाविज्ञानी डॉ. गुरूजेगन मुरुगेसन कम बोली जाने वाली भाषाओं, उनके व्याकरण और सांस्कृतिक ज्ञान पर अध्ययन कर रहे हैं। राजस्थान के भील समुदाय, झारखंड की मुंडारी और स्विट्जरलैंड के प्रवासी तमिल समुदाय पर शोध के जरिए भाषा, समाज, संस्कृति और मानव मस्तिष्क के बीच संबंधों को समझने की कोशिश की जा रही है।

  • IIT जोधपुर में भाषाओं पर खास शोध
  • भील, मुंडारी और तमिल भाषा का अध्ययन
  • भाषा के साथ स्थानीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण

Uncovering knowledge hidden in languages, A unique research initiative by IIT Jodhpur : भाषा सिर्फ संवाद का जरिया नहीं होती, बल्कि उसके भीतर किसी समाज की परंपराएं, जीवनशैली, स्थानीय ज्ञान और दुनिया को समझने का नजरिया भी दर्ज रहता है। इसी विचार को केंद्र में रखकर आईआईटी जोधपुर में कम बोली जाने वाली और विरासत की भाषाओं पर शोध किया जा रहा है।

भाषाओं में छिपे ज्ञान की खोज, IIT जोधपुर का खास शोध
Image Source : Via PIB

आईआईटी जोधपुर के स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स के सहायक प्रोफेसर डॉ. गुरूजेगन मुरुगेसन के नेतृत्व में शोध टीम भाषा के दस्तावेजीकरण के साथ उसके व्याकरण, सांस्कृतिक संदर्भ और संरक्षण की संभावनाओं का अध्ययन कर रही है। शोध का उद्देश्य यह समझना भी है कि किसी भाषा के कमजोर पड़ने के साथ उस समुदाय का पारंपरिक ज्ञान किस तरह प्रभावित हो सकता है।

भाषाओं में छिपे ज्ञान की खोज, IIT जोधपुर का खास शोध
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दुनिया में करीब 7,164 भाषाएं बोली जाती हैं और इनमें लगभग 44 प्रतिशत भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें 1,000 से कम लोग बोलते हैं। ऐसे में कई भाषाओं के सामने भविष्य में लुप्त होने का खतरा बना हुआ है। शोधकर्ता इन भाषाओं को दर्ज करने के साथ यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि इनके माध्यम से पीढ़ियों से किस तरह का ज्ञान आगे बढ़ता आया है।

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डॉ. मुरुगेसन के मुताबिक, भाषा संकट में आने पर सिर्फ शब्द और व्याकरण ही प्रभावित नहीं होते, बल्कि उससे जुड़ा सांस्कृतिक ज्ञान और जीवन जीने की परंपराएं भी कमजोर पड़ सकती हैं। इसलिए उनकी टीम मैदानी अध्ययन के दौरान भाषाई जानकारी के साथ समुदायों के स्थानीय ज्ञान को भी रिकॉर्ड कर रही है।

भील समुदाय की भाषा और रेगिस्तानी जीवन का अध्ययन

शोध का एक प्रमुख हिस्सा राजस्थान के ओसियां क्षेत्र में भील समुदाय के साथ किया जा रहा मैदानी अध्ययन है। थार क्षेत्र की परिस्थितियों में लंबे समय से रह रहे समुदायों ने सीमित संसाधनों और कठिन जलवायु के अनुरूप अपनी जीवनशैली विकसित की है।

घर बनाने के तरीके, भोजन, पहनावा और पानी के सीमित संसाधनों का इस्तेमाल जैसे कई पहलुओं में पारंपरिक ज्ञान दिखाई देता है। शोध टीम यह समझने की कोशिश कर रही है कि यह ज्ञान स्थानीय भाषा से किस तरह जुड़ा है और नई पीढ़ी में भाषा का इस्तेमाल कम होने से इस ज्ञान के हस्तांतरण पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।

आईआईटी जोधपुर की टीम नियमित मैदानी दौरों के दौरान भाषाई सामग्री जुटाती है। इन गतिविधियों में विद्यार्थियों की भागीदारी भी रहती है, जिससे उन्हें अलग-अलग समुदायों की भाषा और संस्कृति को सीधे समझने का अवसर मिलता है।

मुंडारी की संख्या प्रणाली ने खड़े किए नए सवाल

शोध का दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र मुंडारी भाषा है, जिसे झारखंड के मुंडा समुदायों में बोला जाता है। यह ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से संबंधित है।

अध्ययन के दौरान जुटाए गए आंकड़ों के विश्लेषण में मुंडारी की एक विशिष्ट संख्या प्रणाली सामने आई है। शोधकर्ताओं के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भाषाओं में व्याकरणिक संरचनाओं के विकास को लेकर नए सवाल सामने आते हैं।

टीम यह जानने का प्रयास कर रही है कि मुंडारी की यह व्यवस्था इतनी कम देखने को क्यों मिलती है और दूसरी भाषाओं की तुलना में इसकी व्याकरणिक संरचना किस तरह अलग है। इस तरह का अध्ययन मानव भाषा की संभावित संरचनाओं और उनके विकास को समझने में भी योगदान देता है।

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स्विट्जरलैंड में तमिल पर भी अध्ययन

आईआईटी जोधपुर का शोध केवल भारत की स्थानीय भाषाओं तक सीमित नहीं है। टीम विरासत की भाषाओं पर भी काम कर रही है। ऐसी भाषाएं आमतौर पर प्रवासी परिवार अपने घरों में इस्तेमाल करते हैं, जबकि उनके आसपास के सामाजिक माहौल में दूसरी भाषाओं का दबदबा होता है।

इसी क्रम में स्विट्जरलैंड में दूसरी पीढ़ी के प्रवासी समुदाय के बीच तमिल भाषा के इस्तेमाल का अध्ययन किया जा रहा है। घर में तमिल बोलने वाले बच्चों और युवाओं के आसपास स्विस जर्मन और फ्रेंच जैसी भाषाएं अधिक इस्तेमाल होती हैं। शोध में यह समझने की कोशिश की जा रही है कि इस बहुभाषी माहौल का विरासत की भाषा के विकास और इस्तेमाल पर क्या असर पड़ता है।

यह सहयोगी परियोजना स्विट्जरलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ लॉज़ेन की प्रो. अनिता ऑयर के साथ की जा रही है। परियोजना को स्विस नेशनल साइंस फाउंडेशन और इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च का समर्थन प्राप्त है।

भाषा, संस्कृति और समाज को जोड़ता शोध

आईआईटी जोधपुर के इस शोध में मैदानी भाषाविज्ञान, सैद्धांतिक भाषाविज्ञान और समाजभाषाविज्ञान तीनों क्षेत्रों को जोड़ा गया है। भील समुदाय से मिले स्थानीय ज्ञान, मुंडारी की व्याकरणिक विशेषताओं और स्विट्जरलैंड में तमिल के इस्तेमाल का अध्ययन अपने-अपने स्तर पर भाषा की विविधता को समझने में मदद करता है।

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शोध का व्यापक उद्देश्य यह देखना है कि भाषा किस तरह समाज और संस्कृति के साथ विकसित होती है और उसमें पीढ़ियों का ज्ञान कैसे सुरक्षित रहता है। कम बोली जाने वाली भाषाओं का दस्तावेजीकरण इसी वजह से केवल भाषा संरक्षण का काम नहीं, बल्कि मानव समाज और उसकी विविध सांस्कृतिक विरासत को समझने का माध्यम भी बन रहा है।

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