हर बूंद की बचत : रेलवे में 124 रेनवाटर हार्वेस्टिंग संरचनाएं

उत्तर मध्य रेलवे ने जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए अपने रेलवे परिसरों में 124 वर्षा जल संचयन संरचनाएं तैयार की हैं। इन व्यवस्थाओं के जरिए छतों और खुले स्थानों से मिलने वाले बारिश के पानी को फिल्टर कर रिचार्ज पिट, सोक पिट, पुराने कुओं और बोरवेल तक पहुंचाया जा रहा है, ताकि पानी जमीन में समाकर भूजल स्तर बढ़ाने में मदद कर सके।

  • 124 रेनवाटर हार्वेस्टिंग संरचनाएं उत्तर मध्य रेलवे में पूरी हुईं।
  • पुराने कुएं और सूखे बोरवेल भी जल पुनर्भरण के काम आ रहे हैं।
  • आगरा, प्रयागराज और झांसी मंडल में अलग-अलग रिचार्ज सिस्टम विकसित किए गए।

124 Rainwater Harvesting Structures in the Railways : उत्तर मध्य रेलवे ने बारिश के पानी को संरक्षित करने और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने के लिए अपने परिसरों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था को व्यापक रूप दिया है। 18 सितंबर 2026 तक रेलवे के विभिन्न स्थानों पर कुल 124 रेनवाटर हार्वेस्टिंग संरचनाएं पूरी की जा चुकी हैं। इनका उद्देश्य बारिश के पानी को बहकर व्यर्थ जाने से रोकना और उसे वैज्ञानिक तरीके से जमीन के भीतर पहुंचाना है।

हर बूंद की बचत : रेलवे में 124 रेनवाटर हार्वेस्टिंग संरचनाएं
Image Source : Via Dainik Jaltedeep

रेलवे परिसरों में बड़ी संख्या में भवन और खुले क्षेत्र हैं, जहां बारिश के दौरान पर्याप्त मात्रा में पानी जमा होता है। इसी पानी को पाइपलाइन के जरिए रिचार्ज पिट, सोक पिट, पुराने कुओं, सूखे बोरवेल और डीप बोर जैसी संरचनाओं तक पहुंचाया जा रहा है। फिल्ट्रेशन के बाद पानी धीरे-धीरे जमीन में समाहित होता है, जिससे भूजल पुनर्भरण में मदद मिलती है।

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उत्तर मध्य रेलवे की ओर से तैयार की गई 124 संरचनाओं में आगरा मंडल में 38, प्रयागराज मंडल में 41 और झांसी मंडल में 45 संरचनाएं शामिल हैं। अलग-अलग इलाकों की जरूरत और वहां उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखते हुए इन स्थानों पर अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है।

झांसी मंडल में महोबा, पामां, मलासा, आटा, भुआ, मोंठ, चिरगांव, परिछा, झांसी और ग्वालियर समेत कई स्थानों पर बारिश के पानी को जमीन तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई है। महोबा में छत से आने वाले पानी को पुराने कुएं की ओर मोड़ा गया है। पामां में सूखे बोरवेल को रिचार्ज के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। वहीं मलासा और आटा में जल तारा तथा सोक पिट आधारित प्रणालियां लगाई गई हैं।

झांसी में रेलवे कॉलोनियों, बीटीसी, एसी लोको शेड और अन्य परिसरों में भी रिचार्ज सिस्टम विकसित किए गए हैं। ग्वालियर में रिचार्ज पिट के माध्यम से परिसर में जमा होने वाले वर्षा जल को जमीन में पहुंचाने की व्यवस्था की गई है।

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प्रयागराज मंडल में प्रयागराज, कानपुर, इटावा, फिरोजाबाद, हाथरस, दादरी, दनकौर, चुनार, लूसा और खैराही सहित कई स्थानों पर ऐसी व्यवस्थाएं विकसित की गई हैं। यहां भवनों और अन्य उपयुक्त सतहों से पानी एकत्र कर पाइप तथा फिल्ट्रेशन सिस्टम के जरिए रिचार्ज संरचनाओं तक पहुंचाया जाता है। जहां परिस्थितियां अनुकूल हैं, वहां पहले से मौजूद डीप बोर और बोरवेल को भी रिचार्ज प्वाइंट के तौर पर उपयोग किया जा रहा है।

कई जगहों पर पानी को सीधे जमीन में भेजने के बजाय पहले फिल्ट्रेशन और फर्स्ट-फ्लश सिस्टम से गुजारा जाता है। इससे शुरुआती बारिश के साथ आने वाली गंदगी को अलग करने और पानी को नियंत्रित तरीके से रिचार्ज संरचना तक पहुंचाने में मदद मिलती है। पुराने कुएं और बोरवेल जैसे उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करने से नई संरचनाओं की जरूरत भी कई स्थानों पर कम होती है।

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उत्तर मध्य रेलवे की यह पहल इस बात पर केंद्रित है कि बारिश के पानी का अधिकतम उपयोग किया जाए। हर स्थान पर एक जैसी तकनीक लगाने के बजाय वहां की भौगोलिक और मौजूदा ढांचागत परिस्थितियों के अनुसार समाधान तैयार किए गए हैं। कहीं पुराना कुआं उपयोगी बनाया गया है तो कहीं सूखे बोरवेल और रिचार्ज पिट के जरिए पानी को जमीन में उतारा जा रहा है। इससे सतही जल बहाव को कम करने और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।

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