नॉर्थ ईस्ट की संस्कृति पर मंथन
जयपुर में आयोजित दो दिवसीय सेमिनार के अंतिम दिन पूर्वोत्तर भारत की लोक आस्था, कला, खान-पान और सांस्कृतिक पहचान पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए। अरुणाचल की लोककथाओं, त्रिपुरा की राजशाही चित्रकला और मिजोरम की डिजिटल विरासत पर चर्चा हुई। समापन पर आयोजन को ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की भावना से जोड़ते हुए सांस्कृतिक संवाद की अहमियत बताई गई।
- नॉर्थ ईस्ट संस्कृति: लोक आस्था, कला और खान-पान पर विशेषज्ञों ने चर्चा की।
- लोक विरासत: अरुणाचल और त्रिपुरा की सांस्कृतिक परंपराओं पर विचार रखे गए।
- ऑक्टेव 2026: सेमिनार का समापन ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के संदेश के साथ हुआ।
Northeast Culture in Focus at Jaipur Seminar : पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर और आरआईसी, जयपुर के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय सेमिनार के अंतिम दिन पूर्वोत्तर भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं पर दो सत्रों में चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने लोक विश्वास, कला, खान-पान और बदलते डिजिटल दौर में सांस्कृतिक संरक्षण जैसे विषयों को सामने रखा।

समापन सत्र में वेस्ट जोन कल्चरल सेंटर के निदेशक डॉ. देवेंद्र कुमार धोदावत (आईएएस) ने कहा कि ऑक्टेव 2026 ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की भावना को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन देश की विविध संस्कृतियों को समझने और लोगों को एक-दूसरे की परंपराओं से जोड़ने में उपयोगी हैं।
पहले सत्र में अरुणाचल प्रदेश के डॉ. तारो सिंदिक ने ‘पूर्वोत्तर भारत में प्रचलित लोक विश्वास- अरुणाचल प्रदेश के संदर्भ में’ विषय पर प्रस्तुति दी। उन्होंने तागिन समुदाय में सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ी लोककथाओं के जरिए वहां के लोक विश्वासों और सांस्कृतिक सोच को समझाया। कुरियुम-कुलू, रियुम्चिजेरिंग और रियुमसी से जुड़ी मान्यताओं के साथ पृथ्वी और आकाश की उत्पत्ति की कथाओं का भी उल्लेख किया।
इसी सत्र में त्रिपुरा के डॉ. परमीत परना पॉल ने ‘त्रिपुरा की राजशाही चित्रकला और पूर्वोत्तर की कलात्मक विरासत’ पर जानकारी दी। उन्होंने राजवाड़ा काल में चित्रकला को मिले संरक्षण और बाद के दौर में इस कला परंपरा के विकास की चर्चा की। सत्र का संचालन दिलीप कुमार कलिता ने किया।
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दूसरे सत्र में दिलीप कुमार कलिता ने ‘व्यंजन और खान-पान : पूर्वोत्तर की विशिष्ट पहचान’ विषय पर क्षेत्र की भोजन परंपराओं और उनसे जुड़े सांस्कृतिक पहलुओं को सामने रखा। उन्होंने बताया कि खान-पान भी किसी क्षेत्र की पहचान और जीवनशैली को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
मिजोरम के कला विशेषज्ञ अल्फ्रेड जोनाथन ने ‘पूर्वोत्तर की गूंज : मिजोरम में आस्था, लोककथाओं और सांस्कृतिक पहचान के डिजिटल भविष्य’ विषय पर विचार रखे। उन्होंने लोककथाओं और सांस्कृतिक विरासत को डिजिटल माध्यमों के जरिए सुरक्षित रखने की संभावनाओं पर चर्चा की। इस सत्र का संचालन डॉ. तारो सिंदिक ने किया।
इससे पहले सेमिनार के संयोजक डॉ. संतोष कुमार ने दो दिनों में आयोजित पांचों सत्रों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। आयोजन में योगदान के लिए मंच संचालक प्रणय भारद्वाज और समन्वयक डॉ. आकांक्षा जोशी को पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर के निदेशक डॉ. अश्विन दलवी ने स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।
समापन पर सेंटर के डिप्टी डायरेक्टर पवन अमरावत ने अतिथियों, विशेषज्ञों और आयोजन से जुड़े सभी सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।



