पूर्वोत्तर की संस्कृति पर जयपुर में शुरू हुआ मंथन
जयपुर के आरआईसी में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर की ओर से आयोजित दो दिवसीय सेमिनार में पूर्वोत्तर भारत की कला, संस्कृति, लोक परंपराओं और सामाजिक जीवन पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए। वक्ताओं ने राजस्थान और पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक समानताओं को समझने तथा लोक कलाओं को जीवन से जोड़कर देखने की जरूरत पर भी चर्चा की।
- पूर्वोत्तर की संस्कृति: आठ राज्यों की कला, लोक परंपराओं और सामाजिक जीवन पर विशेषज्ञों ने चर्चा की।
- सांस्कृतिक मंथन: जयपुर में शुरू दो दिवसीय सेमिनार में पूर्वोत्तर और राजस्थान की समानताओं पर भी विचार हुआ।
- लोक कला पर जोर: वक्ताओं ने कहा कि पूर्वोत्तर में कला केवल प्रदर्शनी तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा है।
Northeast Culture Seminar : पूर्वोत्तर भारत की विविध संस्कृति, लोक परंपराओं और कला को समझने के लिए जयपुर में दो दिवसीय सेमिनार की शुरुआत हुई। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर ने आरआईसी, जयपुर के सहयोग से इस आयोजन की शुरुआत की। सेमिनार में पूर्वोत्तर के आठ राज्यों की सांस्कृतिक विरासत और राजस्थान से उनकी समानताओं पर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।
कार्यक्रम की शुरुआत पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर के निदेशक डॉ. अश्विन महेश दलवी, सेमिनार संयोजक एवं सिक्किम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संतोष कुमार, केंद्र के पूर्व निदेशक फुरकान खान और उप निदेशक पवन अमरावत ने दीप प्रज्वलित कर की।
उद्घाटन सत्र में डॉ. दलवी ने कहा कि पूर्वोत्तर में कला किसी महल या संग्रहालय तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों के रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देती है। वहां के रंग, पहनावे, बनावट और परंपराओं में स्थानीय संस्कृति की स्पष्ट झलक मिलती है। उन्होंने कहा कि सेमिनार का उद्देश्य पूर्वोत्तर के आठ राज्यों की कला और सांस्कृतिक जीवन को समझना तथा राजस्थान के साथ उनके जुड़ाव और समानताओं पर संवाद करना है।
यह भी पढ़ें : स्वास्थ्य भवन में रक्तदान शिविर, अधिकारियों-कर्मचारियों ने लिया संकल्प
सेमिनार संयोजक प्रोफेसर संतोष कुमार ने पूर्वोत्तर भारत को प्राचीन भारतीय संस्कृति की जीवंत झलक बताते हुए कहा कि वहां की लोक परंपराएं आज भी सामाजिक जीवन में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए हुए हैं।
पहले सत्र में असम के डॉ. असीम बोरा ने ‘एथनिक और वैष्णवी संस्कृति का पूर्वोत्तर भारत में संगम’ विषय पर प्रस्तुति दी। डॉ. पूजा बासनेत ने सिक्किम की लोककथाओं, मौखिक परंपराओं, मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान पर चर्चा की। इस सत्र का संचालन प्रोफेसर रविरंजन ने किया।
यह भी पढ़ें : आयुष्मान की पसंद: कहानी पहले, निर्देशक बाद में
दूसरे सत्र में विदुषी मौनिका चंदा ने मेघालय के पारंपरिक नृत्यों के माध्यम से पूर्वोत्तर की संस्कृति को समझने का प्रयास किया। वहीं प्रोफेसर रविरंजन ने नागालैंड के संदर्भ में पूर्वोत्तर के साहित्य की विशेषताओं पर विचार रखे। सत्र का संचालन डॉ. असीम बोरा ने किया।
तीसरे सत्र में डॉ. संतोष कुमार ने ‘पूर्वोत्तर भारत के सुषिर वाद्य’ विषय पर क्षेत्र में प्रचलित विभिन्न वाद्यों की जानकारी दी। इसके बाद डॉ. युमनम भूमेश्वर ने मणिपुर के नट संकीर्तन को पूर्वोत्तर भारत की विशिष्ट और दुर्लभ सांस्कृतिक परंपरा के रूप में रेखांकित किया।
सभी विशेषज्ञों ने पावरपॉइंट प्रस्तुतियों के माध्यम से विषयों को उदाहरणों सहित समझाया। सेमिनार का दूसरा दिन शुक्रवार को सुबह 10 बजे से शुरू होगा, जिसमें पूर्वोत्तर की कला और संस्कृति से जुड़े अन्य विषयों पर चर्चा जारी रहेगी।



