ऑक्टेव 2026 में दिखा नॉर्थ ईस्ट का रंग

जयपुर में ऑक्टेव 2026 के दूसरे दिन पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध लोक और शास्त्रीय परंपराएं मंच पर जीवंत हो उठीं। आठ राज्यों के पारंपरिक परिधानों, मणिपुरी रास और विविध लोकनृत्यों ने दर्शकों को आकर्षित किया। रंग-बिरंगी वेशभूषा, ऊर्जावान प्रस्तुतियों और सांस्कृतिक विविधता से सजे कार्यक्रम ने जयपुर के कला प्रेमियों को नॉर्थ ईस्ट की विरासत से रूबरू कराया।

  • ऑक्टेव 2026: दूसरे दिन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां।
  • मणिपुरी रास: राधा-कृष्ण की भक्ति और प्रेम कथा ने मोहा मन।
  • नॉर्थ ईस्ट संस्कृति: आठ राज्यों के पारंपरिक परिधानों और लोकनृत्यों की झलक।

Northeast Culture Shines at Octave 2026 : आरआईसी में चल रहे ‘ऑक्टेव 2026’ के दूसरे दिन शुक्रवार को पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति और लोक परंपराओं का रंग देखने को मिला। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर की ओर से आरआईसी के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में कॉस्ट्यूम शो, मणिपुरी रास और आठों पूर्वोत्तर राज्यों की संयुक्त कोरियोग्राफिक प्रस्तुति ने दर्शकों को देर तक बांधे रखा।

कार्यक्रम की शुरुआत कॉस्ट्यूम शो से हुई, जिसमें पूर्वोत्तर के आठ राज्यों के पारंपरिक परिधानों को मंच पर प्रस्तुत किया गया। युवक-युवतियों ने अलग-अलग राज्यों की हस्तनिर्मित पोशाकें पहनकर प्रस्तुति दी। पहले मॉडल्स ने एक-एक कर और फिर जोड़ों में परिधान प्रदर्शित किए। अंतिम चरण में सभी मॉडल्स ने एक साथ मंच पर आकर पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े परिधानों का प्रदर्शन किया।

रंग-बिरंगे परिधानों और उनकी बारीक कारीगरी ने दर्शकों का ध्यान खींचा। कई दर्शकों के लिए यह अनुभव खास रहा, क्योंकि मंच पर उन्हें पूर्वोत्तर की संस्कृति को करीब से देखने और समझने का अवसर मिला।

कॉस्ट्यूम शो के बाद मणिपुरी रास की प्रस्तुति ने वातावरण को भक्ति और अध्यात्म से भर दिया। श्रीकृष्ण की मुरली की धुन, राधा और गोपियों का आगमन तथा रासलीला के दृश्यों ने गोकुल की कथा को मंच पर साकार किया। कलाकारों की भाव-भंगिमाओं, हाथों की मुद्राओं और कोमल लास्य शैली ने प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया।

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मणिपुरी रास में पुंग और करताल की संगत ने नृत्य में लय और ऊर्जा जोड़ी। कृष्ण का नटवर रूप और राधा-गोपियों की पारंपरिक पोपलॉय वेशभूषा भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रही। अंतिम चरण में राधा-कृष्ण की आरती और पूजन के दृश्य ने प्रस्तुति को आध्यात्मिक भाव के साथ पूर्ण किया।

इसके बाद पूर्वोत्तर के आठ राज्यों की संयुक्त कोरियोग्राफिक प्रस्तुति ने माहौल में नई ऊर्जा भर दी। अरुणाचल प्रदेश के ताई खेमती और जुजु-जाजा नृत्य से शुरुआत हुई। मणिपुर के पुंग ठोल चोलम में कलाकारों के तेज फुटवर्क और कलाबाजियों ने दर्शकों को रोमांचित किया, जबकि थांगटा की प्रस्तुति में युद्ध कौशल की झलक देखने को मिली।

त्रिपुरा के होजागिरी नृत्य में कलाकारों का संतुलन दर्शकों के लिए खास आकर्षण रहा। सिर पर बोतल और दीपक तथा हाथों में थाली लेकर किए गए नृत्य ने खूब तालियां बटोरीं। ममिता नृत्य के जरिए फसल के बाद देवी लक्ष्मी की आराधना का भाव प्रस्तुत किया गया।

सिक्किम के तमंग सेलो में विवाह समारोह की सांस्कृतिक झलक दिखाई गई, वहीं सिंघी छम में हिम शेर की वेशभूषा ने मंच पर अलग ही दृश्य रचा। मेघालय के वांगला नृत्य में अच्छी फसल के लिए सूर्य देवता सालजोंग के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा दिखाई गई।

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असम के बारदोई सिखला नृत्य में ऊर्जा और उत्साह नजर आया, जबकि बिहू की प्रस्तुति ने फसल कटाई से जुड़ी लोक परंपरा को जीवंत किया। मिजोरम के चेराव नृत्य में बांस की छड़ों के बीच कलाकारों का शानदार तालमेल देखने को मिला। वहीं सरलामकाई नृत्य में युद्ध में जीत के उल्लास को अभिव्यक्ति मिली।

नागालैंड के पारंपरिक नागा वार डांस ने कार्यक्रम को जोशीला समापन दिया। ढोल की थाप, तेज कदमों और युद्ध कौशल से जुड़ी मुद्राओं ने दर्शकों में रोमांच पैदा कर दिया। कार्यक्रम में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर के निदेशक डॉ. अश्विन एम. दलवी ने आईएएस नवीन जैन, प्रो. मायारानी टाक, संस्कृति मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी लक्ष्मी कांत मंडल और डब्ल्यूजेडसीसी के पूर्व निदेशक देवेंद्र कुमार धोदावत का अंगवस्त्र प्रदान कर अभिनंदन किया।

पूरे कार्यक्रम की कोरियोग्राफिक प्रस्तुति भारत के प्रसिद्ध कोरियोग्राफर प्रोफेसर तरुण प्रधान के निर्देशन में तैयार की गई थी। विविध नृत्य शैलियों और पारंपरिक परिधानों के जरिए प्रस्तुति ने जयपुर के दर्शकों को पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक विविधता का जीवंत अनुभव कराया।

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