नॉर्थ ईस्ट के रंगों से सजा मंच

पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध लोकसंस्कृति जयपुर के मंच पर जीवंत हो उठी। आठ राज्यों के 15 पारंपरिक नृत्यों की कोरियोग्राफिक प्रस्तुति ने दर्शकों को रोमांचित किया। इसके साथ ही एथनिक कॉस्ट्यूम शो में पारंपरिक परिधानों की खूबसूरती देखने को मिली। नृत्य, संगीत, वेशभूषा और लोक परंपराओं के इस संगम ने पूर्वोत्तर की विविध सांस्कृतिक पहचान को प्रभावी ढंग से सामने रखा।

  • लोकनृत्य: आठ राज्यों के 15 नृत्यों ने दर्शकों को पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक विविधता से रूबरू कराया।
  • कोरियोग्राफिक प्रस्तुति: प्रो. तरुण प्रधान के निर्देशन में नृत्यों में परंपरा, युद्ध कौशल और लोक आस्था की झलक दिखी।
  • एथनिक कॉस्ट्यूम शो: आठ राज्यों के पारंपरिक हस्तनिर्मित परिधानों ने मंच पर नॉर्थ ईस्ट की खूबसूरती बिखेरी।

Northeast India’s Folk Culture Shines on Stage : पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति, लोक परंपरा और कलात्मक विरासत का अनूठा रंग उस समय देखने को मिला, जब आठ राज्यों के 15 पारंपरिक नृत्यों की कोरियोग्राफिक प्रस्तुति मंच पर हुई। प्रसिद्ध कोरियोग्राफर प्रो. तरुण प्रधान के निर्देशन में हुई इस प्रस्तुति ने दर्शकों को कभी आध्यात्मिक भाव से जोड़ा तो कभी लोकनृत्यों की ऊर्जा और युद्ध कौशल से रोमांचित किया।

नॉर्थ ईस्ट के रंगों से सजा मंच
Image Source : Via dainik jaltedeep

प्रस्तुति की शुरुआत अरुणाचल प्रदेश के ताई खेमती नृत्य से हुई। पिकॉक डांस के नाम से पहचाने जाने वाले इस नृत्य में आध्यात्मिक भाव नजर आया। इसी राज्य के जुजु-जाजा नृत्य ने भी दर्शकों का ध्यान खींचा।

मणिपुर के पुंग ठोल चोलम में पारंपरिक ढोल गले में लटकाए कलाकारों ने तेज गति और कलाबाजियों से माहौल में ऊर्जा भर दी। इसके बाद थांगटा की प्रस्तुति में तलवार और भाले से जुड़े युद्ध कौशल को नृत्य की मुद्राओं में दिखाया गया। लाई हारोबा नृत्य ने भी दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं।

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त्रिपुरा के होजागिरी नृत्य ने अपनी संतुलन कला से दर्शकों को हैरान कर दिया। कलाकारों ने सिर पर बोतल और दीपक रखते हुए तथा हाथों में थाली लेकर घड़े पर खड़े होकर नृत्य किया। वहीं ममिता नृत्य में फसल के बाद देवी लक्ष्मी की पूजा से जुड़े लोकविश्वास को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।

सिक्किम के तमंग सेलो में बौद्ध परंपरा से जुड़े विवाह समारोह की झलक दिखाई गई। इसी राज्य के सिंघी छम में कलाकार हिम शेर की वेशभूषा में मंच पर उतरे और अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को रोमांचित किया।

मेघालय के वांगला नृत्य में अच्छी फसल के लिए सूर्य देवता सालजोंग के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा को नृत्य के जरिए सामने रखा गया। असम के बारदोई सिखा में बोड़ो समुदाय की ऊर्जा और उत्साह नजर आया, जबकि फसल कटाई से जुड़े बिहू नृत्य ने अपनी तेज लय से माहौल को जीवंत कर दिया।

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मिजोरम के चेराव नृत्य में बांस की छड़ों के बीच कलाकारों का शानदार तालमेल देखने को मिला। इसी राज्य के सरलामकाई यानी सोलकिया नृत्य में युद्ध में जीत के उत्सव को दर्शाया गया। नागालैंड के नागा वार डांस ने भी अपनी दमदार प्रस्तुति से दर्शकों को प्रभावित किया। ढोल की थाप, तेज फुटवर्क और युद्ध कौशल से जुड़ी मुद्राओं ने प्रस्तुति में खास ऊर्जा भर दी।

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