राजस्थान बीजेपी में बढ़ी बेचैनी, संतोष संभालेंगे मोर्चा

राजस्थान में शहरी निकाय चुनाव से पहले बीजेपी के सामने सरकार से नाराजगी और संगठन के भीतर असंतोष बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है। टिकट वितरण को लेकर उठे विरोध के बीच राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष का जयपुर दौरा अहम माना जा रहा है। पार्टी अब डैमेज कंट्रोल के जरिए शहरों में कमजोर होती पकड़ और कार्यकर्ताओं की नाराजगी को साधने की कोशिश में जुटी है।

  • राजस्थान बीजेपी में शहरी इलाकों से मिले फीडबैक ने चिंता बढ़ाई।
  • बी.एल. संतोष जयपुर पहुंचकर संगठन की स्थिति का जायजा लेंगे।
  • शहरी निकाय चुनाव से पहले टिकट बंटवारे की नाराजगी बड़ी चुनौती बनी।

Rajasthan BJP Faces Urban Discontent: जयपुर। राजस्थान में शहरी निकाय चुनाव से पहले बीजेपी के सामने दोहरी चुनौती खड़ी होती नजर आ रही है। एक तरफ शहरों में सरकार के कामकाज को लेकर नाराजगी की चर्चा है, तो दूसरी ओर टिकट वितरण को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच असंतोष सामने आ रहा है। ऐसे में अब संगठन स्तर पर डैमेज कंट्रोल की कवायद तेज हो गई है।

पार्टी के भीतर सबसे ज्यादा चिंता उस फीडबैक को लेकर बताई जा रही है, जो शहरी इलाकों से सामने आया है। सड़क, पानी, सफाई और स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक कामकाज जैसे मुद्दों को लेकर मतदाताओं की नाराजगी ने संगठन को सतर्क कर दिया है। यही वजह है कि जिन नेताओं की भूमिका अब तक चुनावी रणनीति तक सीमित थी, उन्हें भी सीधे मैदान में उतरने का संदेश दिया जा रहा है।

इस बीच बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष का जयपुर पहुंचना सियासी तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रदेश मुख्यालय पर प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने उनका स्वागत किया, लेकिन पार्टी के अंदर चल रही खींचतान के बीच इस दौरे को महज औपचारिक यात्रा नहीं माना जा रहा। संतोष की मौजूदगी में संगठन की तैयारियों, टिकट वितरण और चुनावी फीडबैक पर गंभीर चर्चा होने की उम्मीद है।

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दरअसल, टिकटों के बंटवारे को लेकर कई जगहों पर असंतोष ने बीजेपी की मुश्किल बढ़ाई है। स्थानीय स्तर पर कई दावेदारों और कार्यकर्ताओं के टिकट नहीं मिलने से नाराज होने की खबरों के बीच बगावत की आशंका भी पार्टी के लिए चिंता का विषय बन गई है। ऐसे में नेतृत्व की कोशिश है कि चुनाव से पहले असंतुष्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं को किसी तरह साथ लाया जाए।

कोर कमेटी की बैठक में इसी मुद्दे पर जवाबदेही तय होने की संभावना है। पार्टी नेतृत्व यह समझने की कोशिश करेगा कि टिकट चयन के दौरान किन स्तरों पर असंतोष पैदा हुआ और उसे समय रहते कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। खासतौर पर उन सीटों पर नजर रहेगी जहां बागी उम्मीदवार आधिकारिक प्रत्याशियों के सामने चुनौती खड़ी कर सकते हैं।

शहरी निकाय चुनाव बीजेपी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि शहरों में पार्टी का मजबूत संगठनात्मक आधार माना जाता रहा है। ऐसे में अगर स्थानीय नाराजगी वोट में बदलती है, तो इसका असर सिर्फ निकाय चुनाव के नतीजों तक सीमित नहीं रहेगा। यह सरकार और संगठन दोनों के लिए जनता के मूड का संकेत भी बन सकता है।

बी.एल. संतोष के दौरे को इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। संगठन महामंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती नाराज कार्यकर्ताओं को साधने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर सरकार के खिलाफ बन रही धारणा को समझना होगी। पार्टी के विधायक और मंत्री भी अब अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय होकर मतदाताओं और कार्यकर्ताओं से संपर्क बढ़ा रहे हैं।

हालांकि, असली सवाल यही है कि संगठन की बैठकों और रणनीतिक बदलावों का असर जमीन पर कितना दिखाई देता है। अगर स्थानीय मुद्दों पर मतदाताओं की नाराजगी कायम रहती है और टिकट को लेकर पार्टी के भीतर बगावत नहीं थमती, तो बीजेपी के लिए शहरी निकाय चुनाव आसान नहीं होंगे।

फिलहाल बीजेपी की कोशिश साफ है—चुनावी मैदान में उतरने से पहले संगठन के भीतर की दरारों को भरना और शहरों से मिले नकारात्मक फीडबैक को गंभीरता से लेना। अब नजर इस बात पर रहेगी कि बी.एल. संतोष की रणनीति पार्टी के भीतर असंतोष को शांत करने में कितनी कारगर साबित होती है।

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