रक्षाबंधन पर शेखावत का बड़ा संदेश, रक्षा सूत्र से प्रकृति तक जुड़ा संकल्प
रक्षाबंधन पर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि रक्षा सूत्र का अर्थ केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं है। उन्होंने प्रकृति, पर्यावरण, गुरु और गौ माता की रक्षा को भी भारतीय परंपरा का हिस्सा बताया। खेजड़ली के 363 बलिदानियों को याद करते हुए उन्होंने जलवायु संकट के दौर में संरक्षण का संकल्प मजबूत करने की अपील की।
- रक्षाबंधन का संदेश : भाई-बहन के साथ प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का भी है पावन संकल्प।
- गजेंद्र सिंह शेखावत की अपील : अमृता देवी के खेजड़ली बलिदान से प्रेरणा लेकर पेड़ बचाने की जरूरत।
- सांस्कृतिक परंपरा : भारतीय संस्कृति में रक्षा सूत्र सिर्फ एक रिश्ता नहीं, बल्कि समाज और गौ-माता की सुरक्षा का दायित्व है।
Shekhawat’s major message on Raksha Bandhan : रक्षाबंधन के अवसर पर केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने देशवासियों और बहनों को शुभकामनाएं देते हुए पर्व के व्यापक सामाजिक संदेश को सामने रखा। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में रक्षा सूत्र सिर्फ भाई-बहन के रिश्ते का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि सुरक्षा, विश्वास, सहयोग और जिम्मेदारी की भावना से भी जुड़ा है।
शेखावत ने पर्यावरण संरक्षण को रक्षाबंधन के संदेश से जोड़ते हुए कहा कि प्रकृति, पेड़-पौधों, गुरु और गौ माता की रक्षा का भाव भी हमारी परंपराओं में मौजूद रहा है। उनके मुताबिक, यह पर्व लोगों को अपने रिश्तों के साथ-साथ समाज और पर्यावरण के प्रति दायित्व याद दिलाने का अवसर देता है।

केंद्रीय मंत्री ने राजस्थान की ऐतिहासिक पर्यावरण संरक्षण परंपरा का उल्लेख करते हुए खेजड़ली बलिदान को याद किया। उन्होंने कहा कि अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। यह घटना आज भी प्रकृति के प्रति समर्पण की मिसाल मानी जाती है।
शेखावत ने कहा कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएं पूरी दुनिया के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। ऐसे दौर में खेजड़ली के बलिदान से प्रेरणा लेते हुए पर्यावरण संरक्षण को केवल चर्चा तक सीमित रखने के बजाय उसे व्यवहार में उतारने की जरूरत है।
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उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन का रक्षा सूत्र हमें यह याद दिलाता है कि संरक्षण की भावना परिवार से आगे बढ़कर समाज, प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचनी चाहिए। यही इस पर्व की परंपरा को आज के समय में और अधिक सार्थक बनाता है।



