
पार्ट टू या तीन-फॉर होना नई बात नही है-मगर सोचा भी नही था कि उसकी इतनी जल्दी नौबत आ जाएगी। प्रथम परोस दिया-द्वितीय चल रहा है। मतलब पार्ट-टू की पुरसगारी चल रही है, हो सकता है थर्ड-चौथे की बारी भी जल्दी आ जाए। कारण ये कि कब-क्या हो जाए, कह नहीं सकते। वो कल तक डीसीएम थे-आज सदस्यता के लिए कोर्टगिरी में उलझे नजर आ रहे हैं। वो कल तक मंतरी थे, आज पूर्व हो गए। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।
शीर्षक को जानबूझकर बदला गया है। अगर बदलाबदली नही करते। अगर पूर्व में लटकाए हैडिंग के आगे टू लगा देते तो भी चल जाता मगर तब की और अब की परिस्थितियों में तनिक फरक है। तब वोट पडऩे थे और इस बार आर-पार की लड़ाई है-वह भी अपनों से। सच्ची-मुच्ची में देखा जाए तो-झगड़ा घर का है, पर भूंड का ठीकरा हमेशा की तरह-दूसरों के सिर पर फोडा जा रहा है। यही तो राजनीति है। लोग चाहे सियासत को सूगली कहें तो कहें। भाईसेण वही कर रहे हैं जो करते आए हैं। सूगली है तो है और गूगली हैं तो है।
पाठकों को पिछले माह अर्थात जून के मध्य में ‘बाड़ाबंदी के सामने पाबंदिया फीकी शीर्ष से छपी हथाई याद होगी। उन दिनों राज्यसभा के लिए चुनाव होने थे। आपणे राजस्थान की तीन सीटों के वास्ते भी वोट पडऩे थे। तब हथाई में कहा गया था कि यह बात एक बार और मजबूत हो गई कि पाबंदिया सिर्फ हम-आप के लिए हैं। नियमों पर चलना उन लोगों के लिए जरूरी नहीं जो बनाते हैं। उन्हें नियमों की तुरपाई उधेडऩे का हक। उन्हें नियमों की बखिया उधेडऩे का अधिकार। नियमों के कच्चे-पक्के टांके उधेडऩा उनकी फितरत में। हम वैसा कर लें तो..? तो क्या होगा, तो क्या हुआ, तो क्या हो सकता है? भुगतभोगी लोग अच्छी तरह जानते हैं।
इसका मतलब सिर्फ और सिर्फ ये कि नियमों पर चलना हम-आप के लिए जरूरी। नियम उन लोगों के लिए कोई मायने नहीं रखते जो सियासत बानों की जुल्फों में जुओं की तरह घुले मिले रहते हैं। राजनीति को गंदगी हम-आप मानते हंै। सियासत को सूगलवाड़ा हम-आप कहते हैं। राजनीति को उकरड़ी हम कहते हैं। सियासत को दीवार खडी करने वाली-आप मानते हैं। तो उसका क्या। हम-आप के मानने समझने से कुछ होने वाला नहीं। मजे-मलगोजे उनके लिए जो सेवा का नाम लेकर सियासत में आते हैं और मेवा-मावे से नीचे नही उतरते। पहले वो जनता के पीछे। पहले वो जनता को हाथ जोड़ते हैं। कद बढ जाए-कुरसी मिल जाए तो बिचारी जनता उन्हें ढूंढती है। बिचारे लोग उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं। जरूरी नहीं कि उन बिचारों पर इन काले अंगरेजों की नजरें इनायत हो ही जाए। साब फोरी नजर डाल के आगे बढ जाएं तो मन मसोस कर रह जाने के अलावा और कोई चारा नहीं। नुगरे नेतों को पांच साल तो पचाना ही पड़ता है।
हथाईबाजों ने कहा था कि नियम-कायदों के कारण समाज में स्थायित्व रहता है। समाज में मजबूती रहती है। जिस समाज में नियम-कानून ना हो उस समाज की तुलना पशु बाड़े से की जाती है। आप भारत की तुलना अन्य देशों से कर के देख लीजिए। हमारे यहां शादी सात जन्मों का साथ। हमारे यहां बुजुर्ग घर-परिवार की छत। सात समंदर पार ऐसा नही होता। आज शादी हुई हफ्ते भर बाद तलाक। बुजुर्गों की परवाह किसी को नहीं। वहां संयुक्त परिवार ढूंढे नहीं मिलते। हम अपनी विरासत से बंधे है। जहां नंगाई है-वहां है। यह भी सच है कि जो सामाजिक नियम कायदों को लांघ कर नंगे हुए उन्हें आज नहीं तो कल, पछताना पड़ेगा।
एक सच्चाई यह भी है कि नियम-कानून-कायदे आम लोगों पर ज्यादा सख्ती से लागू होते दिखते हैं। पहुंचवान नियमों की चिंदिया उड़ा दे, तो कोई कह, वाला नहीं। चंदू गुटखा खा के पीक यहां-वहां थूकता पकड़ा जाए तो दो सौ रूपए का जूत और बड्डा-आदमी थूकने की जगह ढूंढे तो मुनीम-गुमास्ते हथेली खोल कर तैयार खड़े नजर आ जाएंगे। राज्यसभा चुनाव को लेकर अपने यहां उन दिनों जो अफवाहगिरी और हल्ला गुल्ला चला उसने नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ा दीं। कायदों का कत्ल कर दिया मगर कहीं ‘चूंकाराÓ तक नही हुआ। उन दिनों कांग्रेस ने अपने और समर्थक विधायकों की बाड़ाबंदी कर रखी थी ताकि कोई क्रॉस वोटिंग ना कर पाए। विधायकों को महंगी-महंगी होटलों-रिसोर्ट में ठहराया गया। एक विधायक पर लाखों और सभी बाड़ेबंदियों पर करोड़ों फुंक गए। कोरोनाकाल को देखते हुए हम पर पहरे। धार्मिक आयोजनों पर रोक। शादी में पचास और मौत-मैयत में बीस लोगों की इजाजत। जगराते बंद। जागरण बंद। जीमण बंद और वहां सौ-सवा सौ लोग एक हॉल में जुटे। ज्यादातर के चेहरों से मास्क गायब। सोशियल डिस्टेंस हवा। बाड़ाबंदी के आगे पाबंदिया फीकी। वहां विधायक। वहां मंत्री। किस की मजाल जो नियमों की बात कर सकें। नियम हमारे-आपके लिए।
हथाईबाज इन दिनों भी वही सब कुछ देख रहे हैं जो एक माह पहले देखा था। मौजूदा समय में कांगरेस में जोरदार धां-धं.. चल रही है। फिल्मी अंदाज में इसे एंड की लड़ाई कहा जा सकता है। एक ओर सरकार बचाने की जंग दूसरी ओर सरकार गुड़ाने की जोर आजमाइश। एक पाले का नेतृत्व सीएम अशोक गहलोत के हाथ में-दूसरे की कमान डीसीएम और प्रदेश कांगरेस अध्यक्ष रहे सचिन पायलट के पास। एक तरफ इन के धड़े की बाड़ाबंदी दूसरी तरफ उनके धड़े की। बीच में भाजपा पिस रही है। मामला अदालत की चौखट पर। हम देख रहे है कि सत्ता की लड़ाई में भाईसेण फिर सब कुछ भूल गए। मास्क गए तेल लेणे-हवा हुई देह दूरियां। जनता टीवी पर उनका तमाशा देख रही है। हम तो कहे कि कोर्ट को बिना मास्क टीवी पर तमाशा करने वालों के विरूद्ध संज्ञान लेना चाहिए। पुलिस को इ चालान बना कर उन के घर भेज देना चाहिए। पर इतनी जहमत कौन उठाए। विधायक की जगह गंगूआ बिना मास्क दिख जाए। कलुआ फिजिकल डिस्टेंस वाला नियम तोड़ दे तो पांडू ऐसी की तैसी कर दें। वहां कौन हाथ डाले। ऐसे में बाबा तुलसीदास की पंक्तियां फिर याद आ जाती है-‘समरथ को नही दोष गुसाई..।