
स्मृति ईरानी ने किशोरी लाल को महत्व ही नहीं दिया
अमेठी। अठारहवीं लोकसभा चुनाव में अमेठी से स्मृति ईरानी की हार ने सबको चौंका दिया। कारण, उन्होंने अपनी जीत का दावा बढ़-चढ़कर किया था और राहुल गांधी को सीधे मुकाबले के लिए ललकारा था। स्मृति ईरानी को पराजय का स्वाद गांधी परिवार के उस करीबी किशोरी लाल शर्मा से चखना पड़ा है जिन्हें उम्मीदवार बनाए जाने के बाद उन्होंने कोई महत्व ही नहीं दिया था। उनके इस दंभ का जवाब जनता ने ईवीएम का बटन दबा कर दिया। उन्होंने राहुल गांधी को 2019 के चुनाव में जितने वोटों से हराया था, उससे दोगुने से ज्यादा वोटो से गांधी परिवार के करीबी किशोरी लाल शर्मा ने उन्हें परास्त कर दिया।
जब-जब अमेठी गईं सिर्फ गांधी परिवार को कोसा
चुनाव परिणाम जानने के बाद लोगों की जिज्ञासा अब यह जानने में हो गई है कि जिस अमेठी पर स्मृति ईरानी को पांच साल में ही नाज हो गया था, आखिरकार उसने इतनी जल्दी उन्हें खारिज क्यों कर दिया। इसके एक नहीं अनेक कारण खोजे और गिनाए जा सकते हैं। पहले तो यह कि स्मृति ईरानी को यह अंदाज नहीं था कि राहुल गांधी अमेठी छोड़ देंगे। इसीलिए वह अमेठी में अपने काम गिनाने की बजाय पिछले 5 साल में गांधी परिवार और खास तौर पर राहुल गांधी को कोसने में ही लगी रहीं। अमेठी के लोगों में इसीसे उनकी नकारात्मक छवि बनी और चुनाव आते-आते यह नकारात्मक छवि नाराजगी में तब्दील हो गई। वोटरों के इस नाराजगी को ईरानी और उनके प्रबंधक आखिर तक पहचान ही नहीं पाए।
प्रियंका ने जितना समय रायबरेली में दिया उतना ही अमेठी में भी दिया
गांधी परिवार को हल्के में लेना स्मृति ईरानी की रणनीतिक भूल रही। गांधी परिवार ने 40 साल से रायबरेली-अमेठी के लोगों के अपने माध्यम से सेवा कर रहे किशोरी लाल शर्मा की छवि और काम को आगे करके स्मृति ईरानी को जवाब देने की रणनीति बनाई और प्रियंका गांधी ने उस रणनीति को अपने धुआंधार प्रचार से धार दी। यह ध्यान में रखने वाली बात है कि प्रियंका गांधी ने जितना समय भाई के लिए रायबरेली में दिया उतना ही समय अपने परिवार की प्रतिष्ठा से जुड़ी सीट अमेठी में पार्टी प्रत्याशी किशोरी लाल शर्मा के लिए भी दिया।
किशोरी लाल की छवि सकारात्मक बनी
किशोरी लाल शर्मा ने भी अपने प्रचार के दौरान गांधी परिवार से रिश्तों और विकास की कहानी ही बताई, स्मृति ईरानी का एक बार नाम भी नहीं लिया। चुनाव में उनकी अपनी यह रणनीति कारगर रही। मतदाताओं ने उनके इस व्यवहार को पसंद भी किया। प्रियंका गांधी की एग्रेसिव कैंपेनिंग तो काम आई ही साथ ही स्मृति ईरानी की अपनी गलतियां भी उनको पराजय के द्वार तक ले जाने में मददगार बनीं।
स्मृति ईरानी सिर्फ बड़े लोगों से मिलती थी
आम लोग स्मृति ईरानी से केवल इसलिए नाराज थे कि वह बड़े लोगों को ही पहचानती हैं। उन्हीं के घर आती जाती हैं और आम लोगों से उनका कोई वास्ता नहीं। उनके इसी व्यवहार ने भाजपा के कट्टर समर्थकों तक को पार्टी से दूर कर दिया। ऐसा एक बड़ा वर्ग इस बार ईरानी को सबक सिखाने के लिए ही किशोरी लाल शर्मा या कांग्रेस के पक्ष में खुद-ब -खुद चला गया।
ईरानी के प्रतिनिधि का रसूख मंत्री से भी ज्यादा
ईरानी की हार में उनके प्रतिनिधि विजय गुप्ता भी एक बड़ा कारण बने। विजय गुप्ता का व्यवहार किसी मंत्री के रसूख से भी ज्यादा था। अमेठी के लोग तो यह भी कहते हैं कि ईरानी उसी से बात करती थीं जिसकी तरफ विजय गुप्ता इशारा करते थे। अमेठी में स्मृति से नाराजगी की वजह एक गैरसरकारी संगठन उत्थान भी बताया जा रहा है। अमेठी में चुनाव के दौरान कुछ कार्यकर्ताओं ने दबी जुबान से बताया कि सरकार और सांसद निधि से होने वाले सारे काम ‘उत्थानÓ संस्था के मार्फत ही कराए जाते हैं। इससे कार्यकर्ताओं के लिए कोई अवसर ही नहीं है। इस आरोप में कितनी सचाई है, जांच का विषय है।
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