
सवाल तो सवाल है। कब उठ जाए। कौन उठा दे। किस मसले पे उठ जाए। मसला जायज है या नहीं। इस का जवाब किसी के पास नही। होवे भी तो देेने को तैयार नहीं। लोगों की तासीर ऐसी होती जा रही है कि वो जवाब देने की बजाय सवाल खड़ा करने में ज्यादा रूचि दिखाते हैं। पिछले सवालों का जवाब भी मिला ही नहीं कि बोरी फिर खुल गई। उसमें से पाव भर सवाल छांटे जाएं तो सबसे अहम ये कि वो खरचा किस के खाते में जाएगा। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।
खरचे के चरचे सुन कर एकबारगी लगा होगा कि घर गिरस्थी के खरचे की बात हो रही होगी। कारण ये कि अपने यहां मोटामोटी रूप में इसी पे ज्यादा मगजमारी होती है। अनुभवी लोग कहते हैं कि रसोई भरी हुई हो। घराळी की अलमारी में उचित संख्या में साडि़एं हो।अलमारी के लॉकर में टणाटण ज्वैलरी हो उस घर में झगड़े-टंटे की आशंका कम रहती है। उनका मानना है समझदार गृहिणी सब से पहले महिने-डेढ-दो महिने का सामान रसोई में भरा रखती है। आज कल की नव विवाहिते इस बारे में बेजा लापरवाह। अव्वल तो वो संयुक्त परिवार में रहना भी नही चाहती। रहना पड़ जाए तो नित नए पंगे। नित नए झगड़े। रोज-रोज की चिकचिक से परेशान होकर अभिभावक खुदी कह देते हैं-‘पपिया अबै तू न्यारौ हो जा।
न्यारा बोले तो अलग हो जाणा या अलग कर देना। कोई भले ही इसे आजादी माने। कोई भले ही इसे अपने हिसाब से जीना कहे। हथाईबाजों का विचार है कि जो आनंद संयुक्त परिवार में है वो एकल परिवार में नहीं। सामाजिक सुरक्षा आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है-उसे नजरअंदाज करना किसी भी सूरत में उचित नहीं। आई और आई की आई के जमाने में साझा चूल्हे हुआ करते थे। एक समय में बीस-तीस सदस्यों का खाना बनता। चाय-कलेवा अलग। घर की महिलाएं हिलमिल कर काम निपटा लिया करती। पता ही नहीं चलता कि कौन सास है और कौन जेठाणी-देराणी। रसोई और घर में कोठार भरे रहते थे। लगभग प्रत्येक घर में साल-छह माह की खाद्य सामग्री का स्टॉक रहता। उन संस्कारों से जुडी-महिलाएं आज भी है। भले ही उनकी संख्या कम हो। उन परिवारों ने ढाई तीन माह की घरबंदी आराम से निकाली। घर में रसोई का पूरा सामान उपलब्ध। दाल-चावल-आटा-बडि़एं-राबोडिए-पापड़-घी-तेल और रोजमर्रा का सारा सामान रसोई और स्टोर में। उन परिवारों का लॉकडाउन काल आराम से गुजरा। छोटी-मोटी समस्याएं आना-जाना हमेशा की बात है।
खरचे पर पूरी अर्थव्यवस्था टिकी हुई है। घर खरचे से लेकर राज्य और केंद्र का बजट खरर्चों से लदकद। रूपया कहां से आएगा-कहां खरच होगा। किस मद से आएगा-किस मद में जाएगा। समझदार लोग खरचे का पूरा हिसाब रखते हैं। आधी आबादी को इस मामले में प्रधानाध्यापिका माना जाता है खास कर हमारी पीढी की महिलाएं इसमें सबसे आगे। आजकल की छोरियां कमाने और खाने-उड़ाने में माहिर। जब कि चाचियां-मामियां घर का खरचा निकालने के बाद भी पांच-पच्चीस रूपए की बचत कर लेती है। यह बचत संकट काल में काम आती है। नोटबंदी और लॉकडाउन काल उनकी अर्थव्यवस्था की सॉलिड मिसाल। महंगाई के गलकाटू दौर में सीमित कमाई के बावजूद कुछ बचत कर लेना उनके कुशल आर्थिक प्रबंधन का उदाहरण है वरना लोग यही राग आलापते हंै कि ‘पईसा आवता दिखे..जावता नीं दिखे..। कहने का मतलब ये कि तनखा के पैसे एकमुश्त आते दिखते हैं। घर में रोज इतना छुटपुट खरचा हो जाता है कि 25-26 तारीख के बाद हाथ तंग।
खरचों की अपनी भरी-पूरी बही है। अपना भरा-पूरा खाता है। घर खरचा। पेट्रोल का खरचा। हाथ खरचा। बच्चों की पढाई का खरचा। बच्चे टैक्सी में जाएं तो उसका खरचा। रोजमर्रा की वस्तुओं का खरचा। शादी का खरचा। समारोहों का खरचा। दवाई-सवाई का खरचा। मेंटनेंस का खरचा। घरेलु खरचों के इतर सरकारी खरचे अलग। विभागीय खरचे अलग। हर विभाग का अपना बजट। हर विभाग के अपने खरचें। मुनीम जी बही में खरचे नांवें मांडते हैं। बाकी-पोते मांडते हैं। इसके माने ये किस मद पर कितना खरचा। किस के नाम कितना खरचा। पर हथाईबाज जिस खरचे की बात कर रहे हैं उसके साथ सवाल चस्पा। सवाल ये कि वो खरचा किस के नाम मंडेगा।
राज्य में इन दिनों विधायकों की बाड़ाबंदी चल रही है। मुख्यमंत्री का खेमा इस होटल में-उनके विरोधियों का खेमा नामालूम होटल में। पहले वो हरियाणे के मानेसर में थे, अब पता नही कहां है। इन के खेमेबाज अपनी मस्ती में-उनके खेमेदार अपनी मस्ती में। जिन्होंने वोट दिया, वो जाए भाड़ में उनके तो मजे ही मजे। दोनों तरफ के विधायकों पर अब तक डेढ करोड़ से ज्यादा का खरचा हो चुका है। पता नही खेमों का कुआं और कितना गहराएगा। ढाई करोड़ तो समझ ही ल्यो। राज्यसभा चुनाव के दौरान खेमेंबाजी नही थी मगर बाड़ाबंदी तो थी। उसका खरचा अलग। दोनों अवसरों की बाड़ाबंदी पर चार-पांच करोड़ तो पक्के समझो। यह खरचा किस पर? पार्टी पर? सरकार पर? या विधायकों पर? कान अइसे पकड़ो या वइसे। खरबूजा छुरी पे हो या छुरी पे खरबूजा। कटना-पिसना तो जनता को ही है।