उनके साथ तो भी बाड़े में

ये तो है ना तो, ये बड़ा वैसा है। जब भी जुबान पे आता है-एक नया सवाल खड़ा कर देता है। सवाल सुलझ जाएं या कि उनका जवाब मिल जाएं तब तक तो ठीक वरना सवाल पे बवाल मचना तय। सदन में हंगामा। कार्रवाई घंटे-दो घंटे के लिए स्थगित। शुरू होने पर फिर हंगामा तो गई दिन भर की। ऐसा हुआ तो समझ लो गए लाखों। हमारी-आप की खून-पसीने की कमाई हंगामें की भेंट। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।

हंगापे पे लाखों पढ कर कई लोगों का अचकचाहट हो रही होगी। उनसे कई गुणा ज्यादा लोग समझ भी गए होंगे कि इशारा किस की ओर है। अपने यहां समझवान लोगों की भरमार है। ऐसे लोग समझ के बोलते हैं। हर बात-मसले पर तसल्ली से सोचते हैं। हर मुद्दे की गहराई और गंभीरता को समझते है उसके बाद अपनी राय व्यक्त करते हैं या कि उसके बाद कुछ बोलते हैं। अपने यहां ऐसे लोगों की भी भरमार जो बात पूरी होने से पहले ही अपनी बात पटक देते हैं। ऐसे लोगों को डेढ हूशियार की श्रेणी में रखा जाता है।

असल में वो अपने आप को डेढ-दो-ढाई या तीन हूशियार भले ही समझ लें अगली पार्टी बखूबी जान जाती है कि भाई की बुद्धि छलक रही है। अपने यहां ऐसे लोग भी हैं जो जो सब कुछ जानते-बूझते अनजान बने रहते हैं। उनसे कोई भी बात पूछ ल्यो, जवाब मिलेगा ‘म्हनै ठा कौनी। मतलब कि नन्ना उन की जुबान पर। हां, खुद के मतलब की बात हो तो तीन तिरलोकी की बातें याद आ जाती है वरना जान के अनजान बने रहना उनकी आदत में शुमार। ऐसे लोगों को क्या कहा जाता है, बताने की जरूरत नहीं। उनके बारे में हर कोई जानता है फिर हम अपने मुंह से क्यूं कहें या लिखें क्यूं कि उन्हें जाणगेला कहते हैं। सब को पता है कि वो जाणगेले हैं पर हम क्यूं कहें। सब को पता है कि वो येडे बन के पेड़े खा रहे हैं, पर हम क्यूं लिखें।


अपने यहां ऐसे लोगों की भी भरमार जो ना हरी में-ना भरी में। इस खांचे में भांत-भांत के लोग शुमार। इनमें मजदूर लोग-इन में मजबूर लोग। शरीफ इनमें-तसल्लीवान इन में। इनमें संतोषी-इन में भोळेजीव। इस वर्ग में इतनी खांपें कि गिनना मुश्किल। एक-एक को लेकर बैठ गए तो कैलेंडर बदल जाणे हैं मगर खास-खास को छोड़ा भी नही जा सकता। उनपे चर्चा करनी जरूरी। वरना लोग कहेंगे कि ये भी जान के अनजान बन रहे हैं। मजदूर को भांडे के चावल के रूप में ले लेते हैं। इस वर्ग को परिवार के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ करने से ही फुरसत नहीं मिलती। सुबह से शाम तक खपता है। जो मिलता है उससे आटा-प्याज-आलू खरीद के घर आता है। वो कुछ लाता है तब चूल्हा जलता है। जैसी मिलती है- खा खू के पड़ जाता है। सुबह फिर मजदूरी पे। देश में क्या हो रहा है। दुनिया में क्या हो रहा है। नई शिक्षा नीति में क्या शामिल किया-किसे हटाया। सचिन के खेमे में कित्ते विधायक-अशोकजी का खेमा हाल मुकाम कहां है। उन्हें इनसे कोई लेना-देना नहीं। वो बिचारा रोटी-बाटी की जुगत से ही ऊपर नहीं उठ पाता।

बात करें सवाल और बवाल पर लाखों की बरबादी की तो यह भी सीधा और सपाट। सदन चाहे लोकसभा का हो या राज्यसभा अथवा विधानसभा का। एक घंटे की कार्रवाई पर लाखों का खर्च आता है। जिस दिन हंगामा हो गया, समझो लाखों गए और दिन हंगामा होना रोज की बात। हम उन्हें अपनी आवाज बनाकर भेजते हैं। हम उन्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजते हैं और वो सदन में हंगामा करने से बाज नही आते। उनकी तो चीख-चिल्लाहट और हमारे टैक्स का पैसा गया। यही पैसा अगर जनता की समस्याओं के निराकरण पर खर्च किया जाए ‘तो कितना अच्छा रहेगा। बात घूमा-फिरा के तो पे ले आए। यह तो होना ही था, ऐसा नही होता ‘तो हथाई आगे कैसे बढती।

तो एक सवाल हैं। तो एक प्रश्न है। तो एक अचकच है। अपने यहां ‘तो पर घड़ी कहावत आम है-‘भुआसा रै मूंछां होवती ‘तो भूड़ो सा कैविजता। रील में कहा गया-‘तुम होती तो ऐसा होता.. तुम होती ‘तो वैसा होता। आम लोगों में चर्चा इस बात की कि शादी हो जाती ‘तो ऐसा नही होता। नौकरी लग जाती ‘तो वैसा नही होता। हर बात में ‘तो बात-बात में ‘तो। जहां ‘तो नहीं, अडंग़ेबाज वहां लगा देते है, पर हथाईबाज ‘तो के माध्यम से जो सवाल खड़ा होता देख रहे हैं उसकी ‘डोर झंडे से जुडी हुई। झंडा भी किसी दल या पार्टी का नहीं बल्कि राष्ट्रीय ध्वज। जिस के लिए हम भारतीय अपना सर्वस्व कुरबान करने को तैयार रहते हैं।


सवाल ये कि इस बार जिला मुख्यालयों पर होने वाले स्वाधीनता दिवस समारोहों में झंडे कौन फहराएगा। जिला प्रभारी मंत्री बाड़े में बंद है। बाड़े-खुले ‘तो पता चले। बाड़े खुलने के फिलहाल कोई आसार नही है। विधानसभा सत्र 14 अगस्त से शुरू होगा। बाड़ेदारों को सीधे जैपर ले जाया जाएगा। उसके बाद क्या होगा-खुद सियासी पंडित भी नहीं जानते। ऐसे में संभागीय मुख्यालयों पर संभागीय आयुक्त-जिला मुख्यालयों पर कलक्टर और उपखंड स्तर पर उपखंड अधिकारी झंडे फरहराएंगे। राज्य सरकार ने समारोहों संबंधी गाइड लाइन ‘तो जारी कर दी मगर मंतरियों की जिलेवार सूची जारी नही की। तब तक ‘तो की उठक-बैठक जारी रहेगी।