
हम भी सफाई चाहते हैं। वो भी सफाई चाहते हैं। हम सब सफाई चाहते हैं तो फिर देरी किस बात की है। हम किसका इंतजार कर रहे हैं। अगर हम सोच रहे है कि कोई मसीहा अथवा मिस्टर इंडिया आ के सारे घर के बदलेगा, तो यह हमारी गलतफहमी है। जब हमें ही सब कुछ करना है तो किसी का इंतजार क्यूं करना और कब तक करना। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।
मुद्दे-मसले तो भतेरे हैं मजा तब है जब उनपे गंभीर चिंतन-मंथन हो और उनका सम्मानजनक हल निकले। दूर जाने की जरूरत नहीं है। संसद के मौजूदा मानसून सत्र को ही लेल्यो। इस के अलावा पिछले कुछ सत्रों के मंजर पर नजर डाले तो सिवाय हंगामें के और कुछ सुनाई नहीं देगा। सम्मानीय सदस्य चैनल्स पर दिखाई भी देंगे तो चिल्लाते हुए। आसन की ओर बढ़ते हुए। कागज लहराते हुए। कागज फाड़ कर फैंकते हुए गले में तख्ती टांगे। उनकी ऐसी हरकते देखकर जनता को शरम आ जाती है। ऐसा लगता है मानो वो सांसद ना होकर नई सड़क पर प्रदर्शन करने वाले हो। कई बार तो प्रदर्शनकारी भी अनुशासित नजर आते हैं मगर माननीय लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में जो उधंडता दिखाते है उस से हमारा माथा शरम से झुक जाता है। हम सोचते रहे कि सांसद ढिमका चंद जनता की आवाज सरकार तक पहुंचाएगा। हमारे दुख-दर्द-तकलीफों और समस्याओं का निवारण करेगा और भाईजी वहां जाकर हंगामा करते हैं।
कई दफे मन विचार आता है कि ऐसे हंगामी लालों-बवालीसिघों की खाल की जांच होणी चाहिए। पता नहीं इंसानी चमड़ी के नीचे कौनसी चमड़ी चस्पा है जो उन पर किसी बात-सलाह का असर ही नहीं होता। उनके हंगामों पर हम आप के खून-पसीने की कमाई का करोड़ों रूपया फुंक जाता है। करोड़ों रूपए हंगामें की भेंट चढ़ जाते हैं मगर उनकी सेहत पे कोई असर नहीं हो रहा। सत्र से पहले अथवा पूर्व संध्या पर पक्ष-विपक्ष के लगभग सारे बड़े नेते एक टेबिल पे बिराजते हैं। बैठकें करते है। सदन को शांति पूर्वक एवं सुचारू रूप से चलने-चलाने का आश्वासन देते हैं। पक्ष कहता है हम हर मसले-मुद्दे पे चर्चा करने को तैयार है। विपक्ष कहता है जनता से जुड़े मुद्दों को सदन में उठाया जाएगा। अगले दिन आश्वासनों के टुकड़े हजार हुए…. कोई इधर गिरा-कोई उदर गिरा…। इतने टुकड़े हो जाते हैं कि ”चुगणा मुहाल। मानसूनी संसद सत्र के दौरान एक दिन भी विधायी कार्य ढ़ंग से नहीं हुआ। चर्चा-बहस का तो नाम-ओ-निशान नहीं। जो बिल पास हुए वे भी हंगामें के बीच। उनके हंगामें को देखकर मु_ियां तन जाती है। आंखे सुलग उठती हैं। जनता हजार दफे लानत भेज चुकी है। पता नहीं किस चामड़ी के बने हैं जो उन पर कोई असर ही नहीं हो रहा। इस की जांच होणी चाहिए कि चमड़ी के नीचे क्या है… चमड़ी के नीचे…।
कई लोगों को मिस्टर इंडिया के बारे में सुनकर अचकच हो रही होगी। सोच रहे होंगे-कौन सा मिस्टर क्या करेगा। किस मिस्टर के खाते में क्या आएगा। शरीर सौष्ठव से लेकर फैशन के क्षेत्र में मिस्टर इंडिया। भारोत्तोलन से लेकर लेखन-साहित्य में मिस्टर इंडिया। क्यूंकि हम भारतीय हैं तो भारतीय श्री हुए कि नहीं। कोई मिस्टर इंडिया। कोई सिस्टर इंडिया। कोई ब्रदर इंडिया। कोई अंकल इंडिया। कोई मदर इंडिया। पर हम फिलिम वाले ”मिस्टर इंडिया की बात कर रहे हैं जो एक जमाने में सिल्वर स्क्रीन पर छाया हुआ था। पल में गायब-पल में हाजिर। उसने रील लाईफ में कई को निपटा दिया। कई समस्याओं का समाधान कर दिया। रियल लाईफ में उस का आना संभव नहीं दिख रहा। ना कोई मसीहा आणा है। हम ने हमारी खाज खुदी खीणनी होगी। अपनी समस्याओं का हल खुदी ढूंढना होगा। अपनी सफाई खुदी करनी होगी।
सफाई हर क्षेत्र में जरूरी है। सियासत मे तो निहायत जरूरी है मगर अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज सियासत जैसी गंदी शै कोई नहीं। ऐसा नहीं कि सारे सियासतमल सूगले है। कुछ अच्छे भी हैं। उनकी संख्या अंगुलियों पे गिणे जित्ती। मगर ज्यादातर लोग सने हुए। कोई भष्टाचार से तो कोई अपराधो से। जब हमारे सम्माननीय ही आपराधिक पृष्ठ भूमि के हों तो और किसी से क्या उम्मीद की जा सकती है। आदरजोग सुप्रीम कोई भी ऐसी गंदगी पे चिंता जता आ चुका है। सियासी सुगलवाड़े से जनता दुखी-सुप्रीम कोर्ट दुखी तो क्यूं ना सफाई अभियान छेड़ा जाए। इसके लिए सियासी दलों को दागी और दागियों से दूरी रखनी होगी। सफाई का बिस्मिल्लाह घर से हो तो सब से बेहतर। सवाल ये कि ऐसा करे कौन! सफाई करने कोई नहीं आने वाला। ना किसी दल से साफ-सफाई की उम्मीद। इसके लिए हम आप को ही आगे आना होगा। हम तैयार है, आप भी हो जाइए।
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