….. की घर वापसी !

फौरी तौर पर भले ही खेल खल्लास होता दिखे या कि खेल के आगे कोमा-डॉट या अल्प विराम लगता दिख, पर खांटी लोगों का मानना है कि असली सवाल तो जस के तस हैं। सवाल तो सुलग ही रहे हैं। सवाल तो अब भी सुलगेंगे। सवाल यह नही कि कौन जीता या कौन हारा। सवाल ये कि जिस नाटक पर परदा एक महिना बाद गिरा, क्या उसे पहले नही गिराया जा सकता था? सब से बड़ी बात ये कि निकम्मों और नकारों को दिल से गले लगाया जाएगा या नहीं। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।


पिछले करीब 31 दिन से प्रदेश कांगरेस में चल रहा नाटक फिलहाल थम गया। अगर यूं कहे कि थमता दिखाई दे रहा है तो भी गलत नहीं। इस नाटक ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राजनीति और ज्यादा गंदी होती जा रही है-राजनीति इतनी सूगली हो गई कि सुगलवाड़े को भी शरम आने लग गई। कांगरेस में चले नाटक ने इस बात को एक बार फिर पुख्ता कर दिया कि नेते दिन-ब-दिन ‘लिपळे होते जा रहे हैं। उन की चाल पर जनता को भरोसा नहीं। उन के चलन पर जनता विश्वास नही करती। उन की जुबान पर लोगों को तनिक भी भरोसा नहीं रहा। उन के कार्यों पर जनता को विश्वास नहीं। उनके कलापों पर लोगों का विश्वास नही रहा। वो कहते क्या हैं- करते क्या हैं और होता कुछ और है। राजस्थान में घटे घर के झगड़े ने इन सभी बातों को एक बार फिर मजबूत कर दिया कि नेते बिना रीढ़ की हड्डी के। नेते बिना पक्की जुबान के। नेते स्वार्थी। नेते लोभी। नेतों को जनता की कोई परवाह नहीं। नेतों को अपने हितों के अलावा और किसी की चिंता नहीं।


पिछले एक माह में कांगरेस हाउस में जो नाटक चला उसे आखी दुनिया ने देखा। आप क्या समझते हैं कि ये नाटक समाप्त हो गया हैं। हमें तो ऐसा होता दिख नही रहा। कारण ये कि घर में जो खाई खुदी हुई है उसे पाटना असंभ वही नहीं, नामुमकिन भी है। ऊपरी तौर पर लगता है कि खाई ‘बूरीज रही है लेकिन हमें लग रहा है कि ऐसा नही होगा। न मतभेद समाप्त हुए ना मनभेद। यह तूफान से पहले वाली शांति है। अगर कोई यह कहे कि इस नाटक में बड़े बाड़े वाले जीते, तो सही नही है। अगर कोई यह कहे कि इस में छोटे बाड़े वाले हारेे, तो भी सही नही है। अगर कोई हारा तो वह है-जनता, जिस ने अपना विधायक चुना और वो बाड़े में जाकर बंद हो गया।


कई लोगों को बड़े और छोटे बाड़े पर ऊहापोह हो रही होगी। ऐसा होना स्वाभाविक है। बाड़ा तो बाड़ा है। क्या बड़ा और क्या छोटा। क्या गायों का बाड़ा और क्या बकरों का। पर यहां जिन बाड़ों की चर्चा हो रही है उनका खुलासा करना जरूरी नहीं। पूरे राज्य ने देखा-पूरे देश ने देखा कि कांगरेस के विधायकों को कहां-कहां कैद करके रखा गया। भले ही वो फाइव स्टार होटलों में रहे मगर ठप्पा तो ‘बाड़े का ही ठुका। राज्य की जनता के लिए बाड़ाबंदी काल बेहद दुखद रहा। इस दौरान नेतों का जो रूप देखने को मिला, घिनौना था। इस दौरान जो वक्तव्य-बयान सुनने के मिले, घटिया थे। बड़ा बाड़ा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का और छोटा बाड़ा पूर्व डीसीएम सचिन पायलट का। दोनों गुटों के बीच कथित मूंछ की लड़ाई। इस लड़ाई में दोनों की हार हुई। वो कैसे? वो ऐसे कि गहलोत ने सचिन को कांगेरस बदर करने के लिए पूरा जोर लगाया। यहां तक कि उन पर देशद्रोह की धारा लगी। यह बात दीगर है कि बाद में उसे वापस ले लिया गया। गहलोत ने सचिन को गद्दार कहा। निकम्मा कहा। नकारा कहा। उनका बस चलता तो सचिन को कान पकड़ के पार्टी से बाहर निकाल देते। वही सचिन अब फिर कांगरेस में पधार रहे हैं। बात करें सचिन की, तो इस नाटक में उनकी भी हार हुई है। वो कैसे? वो ऐसे कि वो गहलोत को सीएम पद से उतारना चाहते थे।

इस मांग को लेकर कांगरेस मे खुली बगावत हो गई। एक तरफ गहलोत का खेमा-दूसरी ओर सचिन का। भले ही सचिन इस दौरान ‘मुखबद किए रहे मगर अंदरखाने वो और उनके समर्थक विधायक गहलोत को सीएम की कुर्सी पर देखना नही चाहते थे। सचिन खेमे की हार इस लिए कि गहलोत का फिलहाल बाल भी बांका नही हुआ।
हारा कांगरेस आलाकमान भी। वो कैसे? वो ऐसे कि यदि ऐसा ही टोटका करना था तो इतनी देरी क्यूं की। ऐसा जंतर दो-चार दिन में ही हो जाता। खामखा देरी की। इससे राज्य को कितना नुकसान हुआ। ये सरकार बचाने में लगे हुए और वो टांग खिचाई में। बीच में पिसाई जनता की। इधर कोरोनाकाल। इधर बिजली के बिल कचूमर निकाल रहे। इधर अपराध बढ रहे। इधर जनता बेहाल। जनता के करोड़ों रूपए विधायकों की मौज-मस्ती में फुक गए। आलाकमान इस आग को टेम परे बुझा देता तो इतना नुकसान नही होता।


हथाईबाजों का सवाल ये कि क्या बड़ा बाड़ा गद्दार-निकम्मों और नकारों को दिल से गले लगा पाएगा? जवाब भी तैयार-शायद नहीं। कारण ये कि धड़ों में जो खाई पड़ गई वह ऊपरी तौर पे भले ही पटती दिखे, अंदर ही अंदर और चौड़ी होनी तय है। आगे क्या होगा-समय बताएगा। फिलहाल इस सुलह को तूफान से पहले की शांति कहा जा सकता है। कोई कहे या ना कहे उस की मरजी। मरजी शीर्षक मे खाली स्थान इसलिए छोड़ा ताकि आप उस की पूर्ति कर सकें कि वापसी गद्दार की हुई। वापसी निकम्मे की हुई या नकारे की।