वित्त नहीं, चरित्र की प्रयत्नपूर्वक हो सुरक्षा : आचार्य

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महाश्रमण
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छापर में चातुर्मासार्थ विराजित महाश्रमण के प्रवचन

विशेष प्रतिनिधि, छापर (चूरू)। आचार्य महाश्रमण ने शुक्रवार को प्रवचन देते हुए कहा कि क्या एकान्त बाल मनुष्य चारों गतियों में जा सकता है? उत्तर दिया गया कि हां, एकान्त बाल मनुष्य चारों गतियों में जा सकता है। यहां एकान्त बाल मनुष्य का अर्थ कि प्रथम चार गुणस्थान वाला वह मनुष्य जिसमें मिथ्यात्वी और सम्यक्त्वी भी होते हैं। अविरत संयमी देवगति में भी जा सकते हैं तो असंयम की अवस्था में नरक, तिर्यंच अथवा मनुष्य के रूप में भी जा सकते हैं।

मनुष्य चारों गतियों में जा सकता है?

पुन: प्रश्न किया गया कि एकान्त पंडित मनुष्य भी क्या चारों गतियों में जा सकता है? उत्तर दिया गया कि एकान्त पंडित मनुष्य अर्थात् वह साधु जिसमें त्याग हो विरति हो संयम हो वह नरक, तिर्यंच और मनुष्य गति में नहीं, एकान्त देवगति को प्राप्त करता हे। इसी प्रकार बाल पंडित अर्थात् श्रावक आयुष्य बंध करता है तो वह भी देवगति को प्राप्त कर सकता है। श्रावक बाल पंडित होते हैं। मन में यह भावना भी होनी चाहिए कि वह दिन कब आए कि मैं भी अनगार बन जाऊं। साधु न भी बन पाएं तो जीवन में जितना त्याग, प्रत्याख्यान हो सके, करने का प्रयास करना चाहिए। बारहव्रती बने और उससे आगे के लिए सुमंगल साधना करने का प्रयास करें, ताकि आत्मा मोक्ष की दिशा में अग्रसर हो सके।

कोरा कार्यकर्ता होना ही अच्छी बात नहीं

आचार्य ने श्रावकों को विशेष प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि वित्त (धन) और वृत्त (चारित्र) दो शब्द होते हैं। आदमी धन की जितनी यत्नापूर्वक सुरक्षा करता है, उसके बदले आदमी अपने चारित्र की प्रयत्नपूर्वक सुरक्षा करे। धन तो आता-जाता रहता है, किन्तु चरित्र अच्छा बनाने का प्रयास होना चाहिए। श्रावकत्व जीवन में रहे, इसका प्रयास होना चाहिए। आदमी कभी पद पर रहे न रहे, किन्तु जीवन भर श्रावक अवश्य रह सकता है। मात्र कार्यकर्ता ही नहीं, श्रावक कार्यकर्ता बनने का प्रयास करना चाहिए। संस्था में किसी पद स्थित हो गए और श्रावकत्व नहीं है, तो फिर कमी की बात हो सकती है।

कोरा कार्यकर्ता होना ही अच्छी बात नहीं, श्रावक कार्यकर्ता बनने का प्रयास होना चाहिए। नशामुक्त जीवन हो, जीवन में त्याग हो, धर्म-साधना का क्रम भी चलता रहे तो अच्छी बात हो सकती है। वर्तमान जीवन अच्छा होने के साथ-साथ आत्मा मोक्ष की ओर भी गति कर सकती है। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री अष्टमाचार्य कालूगणी की जन्मभूमि पर नवाचार्य तुलसी द्वारा रचित ‘कालूयशोविलासÓ का सुमधुर संगान और आख्यान के क्रम को आगे बढ़ाते हुए उनके आचार्यकाल व उनके व्यक्तित्व आदि रोचक ढंग से वर्णन किया।

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