राजस्थान की रंग बिरंगी पगड़ी और साफा व्यापार पर मंदी की मार

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कोरोना के चलते 75 फीसदी कम हुआ कारोबार

आर्थिक संकट से गुजर रहे व्यापारी ओर कारीगर

विशेष संवाददाता/ कोपल हालन/पिंकी कड़वे/जयपुर। राजस्थान अपनी राजशाही विरासत के साथ किले और महलों के लिए ही नहीं बल्कि परंपारिक वेशभूषा और पहनावा के लिए भी पूरे विश्व में जाना जाता है। देशी-विदेशी पर्यटक राजस्थानी वेशभूषा देख इसे पहनने और खरीदने से खुद को रोक नहीं पाते। राजस्थानी वेशभूषा की हर ड्रेस अपने आप में खास है लेकिन, अगर इस पहनावे पर पगड़ी नहीं पहनी जाये तो यह वेशभूषा अधूरी सी लगती है। राजस्थानी पगड़ी जो राजस्थान और राजस्थानियों की सिर्फ पहचान ही नहींं बल्कि इसे पहनकर राजस्थानियों के शौर्य और राजसी शान की याद दिलाती है और गौरवान्तित भी महसूस करवाती है। लेकिन, इस समय पगड़ी और साफे का कारोबार अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है।

कोरोना वैश्विक महामारी ने इस कारोबार पर बहुत ही बुरा प्रभाव डाला है, हालत यह है कि यह कारोबार 75 फीसदी तक कम हो गया है, जिस वजह से व्यापारी काफी निराश हैं, जबकि कारीगर बेरोजगारी के चलते आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। पगड़ी ओर साफे की डिमांड शादीयों में अपने चरम पर होती है लेकिन पिछले साल मार्च में लगे लॉकडाउन ने कारीगरों की बनी-बनाई मेहनत पर पानी फेर दिया है जिससे 75 प्रतिशत तक का नुकसान मार्केट को उठाना पड़ा है। पीक सीजन में 1000-1500 की दैनिक मजदूरी करने वाले कारीगरों के परिवार बुरे हालात में जीवन यापन करने को मजबूर हैं। वहीं सरकार से भी इनको किसी भी तरह की आर्थिक सहायता नहीं मिल पा रही है। सरकार के उदासीन रवैये के चलते इनके हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।

व्यापारियों को 2021 से बंधी उम्मीदें
पगड़ी ओर साफा तैयार करने वाले जितेंद्र ने जलतेदीप संवाददाता से बातचीत के दौरान बताया कि पिछले साल कोरोना के चलते मार्च से लगाया गया लाकडाउन इस व्यापार पर कहर बनकर टूटा है। लॉकडाउन खुलने के बार भी यह व्यापार पटरी पर नहीं आया है। हालांकि, सरकार ने बंदिशें हटा दीं हैं लेकिन, व्यापार इस वक्त अब तक की सबसे बड़ी मंदी के दौर से गुजर रहा है। पहले व्यापारी एक दिन में 10 से 15 हजार रुपए तक का व्यापार कर लिया करते थे, लेकिन अब व्यापार में 75 प्रतिशत की तक की गिरावट आ चुकी है। हालांकि, नए साल में कारोबार उठने की उम्मीद है।

ऐसे ही चलता रहा तो भूखे मर जाएंगे
बातचीत में जितेंद्र ने आगे बताया कि राजस्थानी साफे और पगडिय़ों की डिमांड हमेशा बनी रहती है और हमें काम से फुरसत नहीं मिल पाती थी। हम खुला काम करके भी एक दिन में 1000 से 1500 तक की मजदूरी कर लिया करते थे। लेकिन, अब हालात यह हैं कि व्ष्यापार नहीं होने के चलते कारीगरों के पास भी काम नहीं हैं और हम घर बैठने को मजबूर हैं, हालात यह हैंं कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो हमारे परिवारों के भूखे मरने की नौबत आ जाएगी।

पर्यटक और शादियां नहीं होने से हुआ बड़ा नुकसान
साफे और पगडिय़ों का कारोबार वैसे तो पूरे बारह महीने ही चलता है, लेकिन, विशेष तौर पर सर्दियों के सीजन में आने वाले देसी-विदेशी पर्यटकों और शादियों के सीजन के चलते यह कारोबार अपने चरम पर होता है। लेकिन, कोरोना काल के कारण ना ही अब शहर में टूरिस्ट आ रहे हैं और ना ही शादयां हो रही हैं, जिसके चलते पीक सीजन में भी साफा बाजार में रौनक नहीं है। इस कारण व्यापारी जहां बड़ा नुकसान सह रहे हैं, वहीं कारीगर बेरोजगारी का जीवन जीने का मजबूर हैं।

शोर्य और पराक्रम का प्रतीक

इसकी खास बात यह है कि यहां हर समाज ,धर्म, जाती, वर्ग, समुदाय, के लिए पहले से ही रंगों के आधार पर पगडिय़ां निर्धारित की गई है और अगर बात करे राजपूती घरानों की तो पूरखों से चली आ रही केसरियां रंग की पगड़ी पहनना ये अपना सम्मान समझते है जो कि अपने शोर्य, पराक्रम, और वीरता की गाथा का बखान (वर्णन) करता है।

हर शासक ने पहनी पगड़ी

पगड़ी की अनोखी बात यहा भी है कि हमारे देश में चाहे हिन्दू शासक रहें हो या मुस्लिम शासक सबके सर पर इसने ताज बन कर राज किया है। यहा के लोग 1,000 से भी अधिक प्रकार से पगड़ी बांधते है और तो और कहा जाता है कि यहां हर 1 किमीं से पगड़ी बांधने का तरीका बदल जाता है। यह के लोग रंगीन कपड़ो के खासा शौक़ीन होते है। समय के साथ लोगों में परिवर्तन आया है पर अपनी आन-बान-शान को सिर पर रख अपनी परंपरा का ध्वज आज भी गर्व के साथ लहराते है जो लोगों को अकर्षित करता है और जिससे इसकी पहचान आज के दौर में भी कायम है।

क्यों पहनते है पगड़ी

राजस्थान में पगड़ी मान-स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता रहा है। यहा पर गरम मौसम की मार सबसे अधिक है जिसमें नौ महीनें लू की थपेड़ो और तेज धूप के कारण यहां काफी गरम तापमान रहता है जिससे बचनें के लिए पगड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। ये भी कहा जाता है कि जिस तरह शादीशुदा महिलाओं का ख़ुले सिर रखना अश़ुभ माना जाता है ठीक उसी प्रकार पुरूषों का भी अपने बड़े-बुर्जुगों के सामने खुले सिर जाना बड़ो का अपमान है। इसमें इस्तेमाल होने वाले कपड़े की लम्बाई पांच, सात, नौ मीटर की होती है और इसकी किमत 60 से शुरू होकर 400 तक की रहती है। इसमें इस्तेमाल होने वाले कपड़े का आयात सूरत, पाली, जोधपुर, बीकानेर से किया जाता है।

जातियों की पहचान भी करवाती पगड़ी

किसी व्यक्ति की पहचान यहा उसकी पगड़ी से होती है। दूर से पहचाना जा सकता है कि शख्स किस जाती से ताल्लुक़ात रखता है। राईका, रेबारी हमेशा लाल फूल के साफे को तवज़्जो देते है दूसरी तरफ हम अगर विश्नोई समाज की ओर रूख़ करे तो इन्होनें श्वेत रंग को काफ़ी महत्वपूर्ण माना है। कुमार, माली और व्यपारी की पहली पंसद लाल, गुलाबी और केसरियां रंग की होती है। इतिहास में देखा जाएं तो पचरंगी, लहरियां, किरमिची, सोने से बनी पगड़ीयों को राजाओं के शीश की शान माना जाता था। वहीं शोक प्रकट करने के लिए सफेद रंग का साफा धारण किया जाता था जिसका यहां के निवासी आज भी पालन करते है। वहीं नीली, ख़ाकी और महरून रंग की पगड़ी को सहनुभूती और सांत्वना देते वक्त पहना जाता है।

त्यौहारों पर विभिन्न रंगों की पगड़ी

इन पगड़ीयों के रंगों के आधार पर त्योहारों की भी पहचान की जा सकती है। खास समारोह, त्योहारों में पचरंगा, चुंदड़ी पगड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। लाल रंग के किनारे वाली काली पगड़ी दिवाली के समय, लाल-सफेद रंग की पगड़ी सावन में चटक केसरियां पगड़ी दहशहरे में, पीली पगड़ी बसंत पंचमी में पहनी जाती है।

कैसे बनी खास ओर आम की पसंद और पहचान

आज कल सोशल मिडिया ट्रेंड लोगों को इस कदर पागल कर देता है, जिससे हर जगह बस वहीं चीज घूमती हुई नजऱ आती है। इसी प्रकार जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के पहले स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले सें लोगों को संबोधित किया था तब उनकी वेशभूषा में शामिल सिर पर पहनी हुई उनकी पगड़ी ने काफी सुर्खियां बटोरी थी जिसे राजस्थान से बुलाए गए लोगों द्वारा पहनाया गया था, जिससे लोगों में इसको पहनने का जूनून और बढ़ गया। साथ ही धारावाहिक जैसे बालिका वघू, न आना इस देश लाडो के माध्यम से पगड़ी को आम लोगों में नई पहचान मिली जिससे इसका चलन सामान्य हो गया और शादीयों में पूरी बारात इसको अपनी वेशभूषा में शामिल कर राजस्थानी पहनावे का मजा उठाने लगी है। राजस्थान के कारीगरों को देश के अलग-अलग कोने से साफे बांधने के लिए बुलाया जाने लगा जिससे इसकी मागं अपने आप ही बढ़ती जा रही है।