नियमों का चीलम.. ची ‘लो..

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इसे कहते हैं कथनी और करनी में फरक। इसे कहते हैं चीलम.. ची ‘ लो..। इसे कहते हैं म्हारी.. म्हारी.. छाळिए ने दूदो दही पा ‘ऊं..। इसे कहते हैं हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और। इन सब को मिला के नारा बनाएं तो उछलेगा-‘जोश में होश खोएंगे..। कही से आवाज आएगी-‘नियम हमीं बनाएंगे-चिंदिया हमीं उड़ाएंगे। इस कहाई सुनाई के ऊपर एक बड़ा सा होर्डिंग और नीचे एक गठरी जिसे खोलें तो उसमें से कथनी-करनी.. छाळिएं.. हाथी दांत और नारे सब कुछ फुदकते नजर आएंगे। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। कई दफे हो चुका है।

अब कोई सवाल करें कि कितनी बार हो चुका है.. एक्यूरेट संख्या बताइये। इस पर अचकच होना लाजिमी है। हुआ है यह तो पता है, कितनी बार हुआ, यह किसी को पता नहीं। पता होता कि कब और कितनी बार का सवाल भविष्य में उछल सकता है तो भाईसेण उन सब का हिसाब-किताब रखते। बही तैयार-खाता तैयार। समय और स्थान का ब्यौरा भी। दावा है कि इन सारी तैयारियों के बावजूद सही संख्या का पता लगना असंभव ही नहीं, बल्कि नामुमकिन था।

इस का कारण ये कि कहीं कुछ हो जाए तो, हंगामे के रूप में सामने आ जाता है-कहीं ऐसी दरकन होती है कि किसी को कुछ पता ही नही चलता। बाजवक्त समाचार यहां से वहां पहुंचाने पर पहरे बिठा दिए जाते हैं। कुल जमा संख्या के फेर में ना पड़े तो भी ताल ठोक कर कहा जा सकता है कि ‘नियम हमीं बनाएंगे.. उनको तोडऩे का अधिकार भी हमारा। जिसे जो करना है, कर ले। कल ये तोड़भांग तुम करते थे-आज हमारी बारी है। कल तुम्हारा था-आज हमारा है। हमारा-तुम्हारा के चक्कर में भाईसेण भूल गए कि वो समय सादा और सिम्पल था। अभी कोरोनाकाल चल रहा है, थोड़ी सी ऊंच-नीच हो गई ना तो तांता लंबा खिंच जाएगा। पार्टी-दल वाले गए काढ़ा पीणे.. खुद घरवाले भी पास आने से पहले पैंतीस बार सोचेंगे।


हथाई के पहले पेरेग्राफ का गंभीरता से वाचन करने और बाद की विगत पढने पर समझने वाले समझ गए होंगे कि इशारा किस की तरफ है। कई को तो इशारे की भी जरूरत नहीं। वैसे भी हमने कोई नया सबक तो परोसा नहीं जिस पर गौर किया जाए। जो लिखा उसे हम बचपने से पढ़ रहे हैं। उसे सच्चाई में उतरता देख रहे हैं। रोज पढते हैं-रोज लिखते हैं-रोज देखते हैं। यह चक्र पुरातनकाल से चल रहा है मगर फरक कहीं नजर नही आया। संत-सयाने कहते हैं-सदा सत्य बोलो। संत-सुजान कहते है-माता-पिता की सेवा करो। बड़े-सयाने कहते है-नेकी के रास्ते पे चलो, बदी से बचो। गुरूजन कहते हैं-अपने कर्तव्यों का पालन करो। यदि हम उनकी इन शिक्षाओं को जीवन में उतार लेते तो-कथनी और करनी से लेकर हाथीदांत और चिंदिया हमी उड़ाएंगे का जिक्र करने की जरूरत ही नही पड़ती।


खुद हमें इस बात पर विश्वास नहीं होता कि करीब एक माह में चौथी बार हाथी के दांत देखने को मिल जाएंगे। हम खुद यह नहीं जानते थे कि जिन की फोटों के साथ-नसीहतें उकेरी गई हैं वो खुद और उनके मुनीम-गुमास्ते-‘नियम के चीलम.. ची’ लो करते दिखाई पड़ जाएंगे। इसके माने एक बार फिर इस बात की ताईद हो गई कि कानून-कायदे-नियम-नसीहतें उन लोगों पर लागू नहीं होती-जो सत्ता के नशे में मगरूर रहते हैं-जो कुरसी के नशे में मगनून रहते हैं। कानून हम-आप के लिए। कानून का डंडा मांगी लाल के लिए। जुरमाना भरेगा आम आदमी। ठुकेगा-पिटेगा मेंगोमैन। जिसके हाथ में लाठी-होगी वह सरे आम नियमों को हांकेगा और होर्डिंग पर लगी फोटो-देखती रहेगी। जब फोटो वाला चेहरा खुद उसमें शामिल हो जाए तो बात ही खल्लास।

अपने यहां चील-कौवों को बड़े-गुलगुले खिलाने की परंपरा रही है। अब तो खैर उसपे जंग लग गया वरना एक जमाने में लोग ‘तिपड़े पे चढ कर चीलम ची ‘ लो.. की लहरियों के साथ बड़े-गुलगुले आकाश की तरफ उछाल कर चीलों को न्यौता देते थे। चीलें भी थोड़ी देर के बाद दावत स्थल पर मंडराती नजर आती। हमने नियमों को गुलगुले उछालने से इसलिए जोड़ा कि वही होता देखा। इन दिनों कोरोनाकाल चल रहा है। राज्य के हर जिले-शहर में सीएम सर के फोटो लगे होर्डिंग्स नजर आ रहे हैं। उन पर कुछ नसीहतें-कुछ सलाहें उकेरी गई हैं। मसलन मास्क लगाइए। देह दूरी रखिए। समय-समय पर हाथ धोते रहिए। कोरोना से डरें नहीं-गाइड लाइन की पालना करें। आदि-इत्यादि।

हमें सच्चाई इससे परे नजर आई। पिछले दिनों राज्यसभा चुनावों के दौरान हुई विधायकों की बाड़ाबंदी के समय जनता ने इन नसीहतों का फलुदा होते देखा। सीएम गहलोत और डीसीएम रहे पायलट के बीच हुई रार के बाद पाळाबंदी के दौरान होटल में हम ने फिर वही मंजर देखा। गहलोत के नेतृत्व में बसों में राजभवन आए विधायकों को भी देखा। बसे ठसाठस और मास्क के पतियारे नहीं। चौथी बार नियमों की धज्जियां तब उड़ी जब कांगरेसजनों ने जिला मुख्यालयों पर धरने दिए। वहां भी सरकारी गाइड लाइन की चीलम.. ची’ लो.. होती दिखी। हो सकता है-दिल्ली कूच के दौरान भी चीलम.. ची लो.. देखने को मिल जाएं।