छप्पर फाड़ के

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वो छप्पर कब तक फटा रहेगा, यह कहना मुश्किल है। इतना जरूर कह सकते हैं कि अब तक जो सुनते आए हैं, वो सच साबित हो गया। वो मोती कब तक झोली में रहेंगे। यह भी भविष्य की गर्त में। हां, उस पर घड़ी गई पंक्तियां भी खरी उतर गई। कहीं ऐसा ना हो कि छप्पर और मोती के विरोध में प्रचारित बातों पर पड़ी धूल भी हट जाए। जिसने छप्पर फाड़ के दिया, वो छत फाड़ के ले भी सकता है। छप्पर भले ही फटा हो। छत फटेगी तब फटेगी। कुछ दिनों के करोड़पति तो बन ही गए। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।

छप्पर- छत-मोती और करोड़पति के गठजोड़ को लेकर भाईसेणों को हैरत हो रही है। अगर इन सब को अलग-अलग कोण से देखें तो ऐसा कुछ नजर नही आएगा जिस को लेकर अचंभा किया जाए। क्यूंकि सभी का हथलेवा जोड़ा गया है तो बात समझ के बाहर। कारण ये कि ना इन में कोई तार-ना कोई तम्य। छप्पर की प्रगति छत के रूप में देखी जा सकती है। इसका उलटा करें तो छत, छप्पर में बदल सकती है। कवि भी कहता है-‘समय रौ भरोसो कौनी, कद पलटी मार जावै..।

समय ने छप्पर की जगह महल खड़े कर दिए। समय ने मजबूत छतें धराशायी कर दी। मोती और करोड़पति का जोड़ कुछ जंचता है। इसमें भी शर्त ये कि मोती असली के हों। कोई ‘मीणिए लेकर अपने आप को शहंशाह समझने लग जाए तो बात गले नही उतरती। करोड़पति को भी ज्यादा इतराने की जरूरत नहीं। वो अगर इस बात का मुगालता पालते हो कि समय उनके कहे अनुसार चलता है, तो वो गलताफहमा में है। गलतफहमी तो फिर भी चट्टान जैसी होवे है और गलताफहमा पहाड़ से कम नहीं।

उनके आगे से ‘क निकलते ही पीछे क्या बचेगा-आप खुद बांच कर देख लें। बात कुल जमा समय के आस-पास घूमती नजर आती है। समय बड़ा बलवान को चरितार्थ करती दिखाई देती है। इसमें किसी को कुछ साबित करने की जरूरत ही नहीं। समय ने अच्छों-भलों को ‘भू पिला दिया। हम-आप की क्या बिसात। उस मंजर को याद कीजिए तब रामजी के राजतिलक की तैयारियां हो रही थी। रामजी अयोध्या नरेश बनने वाले थे, उसी समय स्टोरी में ऐसा घुमाव आया कि उन्हें सादा वस्त्रों और खड़ाऊ में वन की ओर प्रस्थान करना पड़ गया। समय ने भगवान राम को भी नही बख्शा और घमंडी इंसान ऐसे डोल रहा है मानों वक्त को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेगा। ऐसा समझने वाले निरे मूरख हैं। समय ऐसा ‘भचीड़ देता है कि बिलबिलाने का अवसर भी नही मिलता।

हमने सुना था कि भगवान देता है, तो छप्पर फाड़ के देता है। यह जुमला हम छुटपने से सुनते रहे हैं। आपने भी सुना होगा। इनने-उनने भी सुन रखा होगा। इस का मतलब यह नहीं कि भगवान ने आसमां से धन बरसाया हो और वो गरीबों की झौपडिय़ों का छपरा फाड़ के नीचे टपक गया हो। ऐसा होता तो छीणों और आरसीसी की छत वाले अछूते ना रहते। ऐसा तो हैं नहीं कि इस गली में अतिवृष्टि से हालात और उस गली में अकाल। हां, थोड़ा-बहुत अंतर जरूर हो सकता है कि पाली में झमाझम हो रही है और सोजत में छांटे पड़ के रह जाएं। छप्पर का इस्तेमाल सिर्फ कहावत की पूर्ति के लिए किया जाता है और जानने वाले जानते हैं कि कहावत के पीछे एक मजबूत लॉजिक जरूर होता है।

इसी प्रकार मोती और भीख को लेकर भी सुर साइकिल ‘धुंधाई जाती है। कहा जाता है ‘बिन मांगे मोती मिले.. मांगे मिले ना भीख..। संत-सयानों ने यह बात क्यूं कही और किस परिपेक्ष्य में कही, इसका तो पता नहीं। अलबत्ता सुनते जरूर आ रहे थे। कौन जानता था कि छप्पर भी फट जाएगा और मोती भी मिल जाएंगे। सवाल ये कि छप्पर कब तक फटा रहेगा और मोती कब तक झोली में रहेंगे। धन धणियों का नहीं तो छप्परदारों का होना भी संभव नहीं है। इसके पीछे गंभीर सवालों की श्रृंखला भी।

हवा बिहार के कटिहार से आई। वहां के आजमगढ़ प्रखंड के पस्तियां गांव के दो बच्चों के बैंक खाते में नौ सौ करोड़ रूपए आ गए। उनने ना कोई लॉटरी खेली ना कौन बनेगा करोड़पति मे भाग लिया। लिया भी होता और जीत भी गए होते तो इतनी रकम नहीं मिलती। जितनी घर बैठे मिल गई। इन बच्चों के खाते में स्कूल गणवेश के पैसे आते थे। इस बार इतनी रकम आ गई कि बैंक और बैंक कर्मी हिल गए। बच्चों के घरवालों के साथ पूरा प्रखंड हैरत में। इतना धन किस ने और क्यूं जमा करवाया। फिलहाल बैंक ने खाते फ्रीज कर धनागमन की जांच शुरू कर दी गई है।

हथाईबाजों का कहना है कि जांच होगी तब होगी। रपट आएगी तब आएगी। यह तो सरासर पोल हैं कि कोई किसी के खाते में पहाड़ जैसी रकम डाल दे और बैंक पूछताछ भी नही करे। यही रकम अगर किसी ने किसी बड़े नेते के खाते में डाल दी होती तो? विरोधी लोग उसका जीना मुहाल कर देते। उस गुप्तदानी से हमारी भी एक अरज कि इतनी तो नही, थोड़ी मेहरबानी हमारे सूखे पड़े खाते पर भी हो जाए..।

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